श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.15

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा

गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे।

द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा

दशत्वलं गायत विष्णुगाथाः॥ १५

taṃ mopayātaṃ pratiyantu viprā

gaṅgā ca devī dhṛtacittamīśe|

dvijopasṛṣṭaḥ kuhakastakṣako vā

daśatvalaṃ gāyata viṣṇugāthāḥ|| 15

अर्थ

ब्राह्मणो! अब मैंने अपने चित्तको भगवान्‌के चरणोंमें समर्पित कर दिया है। आपलोग और माँ गंगाजी शरणागत जानकर मुझपर अनुग्रह करें, ब्राह्मणकुमारके शापसे प्रेरित कोई दूसरा कपटसे तक्षकका रूप धरकर मुझे डस ले अथवा स्वयं तक्षक आकर डस ले; इसकी मुझे तनिक भी परवा नहीं है। आपलोग कृपा करके भगवान्‌की रसमयी लीलाओंका गायन करें॥ १५॥ मैं आप ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रणाम करके पुनः यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे कर्मवश चाहे जिस योनिमें जन्म लेना पड़े, भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरा अनुराग हो, उनके चरणाश्रित महात्माओंसे विशेष प्रीति हो और जगत‍्के समस्त प्राणियोंके प्रति मेरी एक-सी मैत्री रहे। ऐसा आप आशीर्वाद दीजिये॥ १६॥ ✎ 113

यह व्याख्या श्लोक 1.19.15 से 1.19.16 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #113 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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