इसके बाद वह बालक अपने आश्रमपर आया और अपने पिताके गलेमें साँप देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ तथा वह ढाड़ मारकर रोने लगा ॥ ३८॥
ततोऽभ्येत्याश्रमं बालो गले सर्पकलेवरम्।
पितरं वीक्ष्य दुःखार्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह॥ ३८
इसके बाद वह बालक अपने आश्रमपर आया और अपने पिताके गलेमें साँप देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ तथा वह ढाड़ मारकर रोने लगा ॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 173) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/38/