श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इति६ लङ्घितमर्यादं तक्षकः सप्तमेऽहनि।

दङ्क्ष्यति स्म कुलाङ्गारं चोदितो मे ततद्रुहम्७॥ ३७

iti laṅghitamaryādaṃ takṣakaḥ saptame'hani|

daṅkṣyati sma kulāṅgāraṃ codito me tatadruham|| 37

अर्थ

‘कुलांगार परीक्षित‍्ने मेरे पिताका अपमान करके मर्यादाका उल्लंघन किया है, इसलिये मेरी प्रेरणासे आजके सातवें दिन उसे तक्षक सर्प डस लेगा’॥ ३७॥

टिप्पणियाँ

  1. ६

    प्रा० पा०—अतो।

    (मुद्रित पृष्ठ 172)
  2. ७

    प्रा० पा०—पितृद्रुहम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 172)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें