श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.45

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः।

यस्य पालयतः क्षोणीं यूयं सत्राय दीक्षिताः॥ ४५

itthambhūtānubhāvo'yamabhimanyusuto nṛpaḥ|

yasya pālayataḥ kṣoṇīṃ yūyaṃ satrāya dīkṣitāḥ|| 45

अर्थ

अभिमन्युनन्दन राजा परीक्षित् वास्तवमें ऐसे ही प्रभावशाली हैं, जिनके शासनकालमें आपलोग इस दीर्घकालीन यज्ञके लिये दीक्षित हुए हैं*॥ ४५॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
कलिनिग्रहो नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    ४३ से ४५ तकके श्लोकोंमें महाराज परीक्षित‍्का वर्तमानके समान वर्णन किया गया है। ‘वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा’ (पा० सू०३। ३। १३१) इस पाणिनि-सूत्रके अनुसार वर्तमानके निकटवर्ती भूत और भविष्यके लिये भी वर्तमानका प्रयोग किया जा सकता है। जगद‍्गुरु श्रीवल्लभाचार्यजी महाराजने अपनी टीकामें लिखा है कि यद्यपि परीक्षित‍्की मृत्यु हो गयी थी, फिर भी उनकी कीर्ति और प्रभाव वर्तमानके समान ही विद्यमान थे। उनके प्रति अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्‍न करनेके लिये उनकी दूरी यहाँ मिटा दी गयी है। उन्हें भगवान्‌का सायुज्य प्राप्त हो गया था, इसलिये भी सूतजीको वे अपने सम्मुख ही दीख रहे हैं। न केवल उन्हींको, बल्कि सबको इस बातकी प्रतीति हो रही है। ‘आत्मा वै जायते पुत्रः’ इस श्रुतिके अनुसार जनमेजयके रूपमें भी वही राजसिंहासनपर बैठे हुए हैं। इन सब कारणोंसे वर्तमानके रूपमें उनका वर्णन भी कथाके रसको पुष्ट ही करता है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 168)

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