परीक्षित्के दिये हुए इन्हीं पाँच स्थानोंमें अधर्मका मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओंका पालन करता हुआ निवास करने लगा ॥ ४०॥✎ 1284
अमूनि पञ्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभवः कलिः।
औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत् तन्निदेशकृत्॥ ४०
परीक्षित्के दिये हुए इन्हीं पाँच स्थानोंमें अधर्मका मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओंका पालन करता हुआ निवास करने लगा ॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 167) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)