श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.40

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अमूनि पञ्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभवः कलिः।

औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत् तन्‍निदेशकृत्॥ ४०

amūni pañca sthānāni hyadharmaprabhavaḥ kaliḥ|

auttareyeṇa dattāni nyavasat tannideśakṛt|| 40

अर्थ

परीक्षित‍्के दिये हुए इन्हीं पाँच स्थानोंमें अधर्मका मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओंका पालन करता हुआ निवास करने लगा ॥ ४०॥✎ 1284

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1284 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ४० → ४०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें