॥ श्रीहरिः ॥
पप्रच्छ रथमारूढः कार्तस्वरपरिच्छदम्।
मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुकः॥ ४
papraccha rathamārūḍhaḥ kārtasvaraparicchadam|
meghagambhīrayā vācā samāropitakārmukaḥ|| 4
अर्थ
स्वर्णजटित रथपर चढ़े हुए राजा परीक्षित्ने अपना धनुष चढ़ाकर मेघके समान गम्भीर वाणीसे उसको ललकारा॥ ४॥
पप्रच्छ रथमारूढः कार्तस्वरपरिच्छदम्।
मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुकः॥ ४
स्वर्णजटित रथपर चढ़े हुए राजा परीक्षित्ने अपना धनुष चढ़ाकर मेघके समान गम्भीर वाणीसे उसको ललकारा॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 163) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/4/