श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.3

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

गां च धर्मदुघां दीनां भृशं शूद्रपदाहताम्।

विवत्सां साश्रुवदनां क्षामां२ यवसमिच्छतीम्॥ ३

gāṃ ca dharmadughāṃ dīnāṃ bhṛśaṃ śūdrapadāhatām|

vivatsāṃ sāśruvadanāṃ kṣāmāṃ yavasamicchatīm|| 3

अर्थ

धर्मोपयोगी दूध, घी आदि हविष्य पदार्थोंको देनेवाली वह गाय भी बार-बार शूद्रके पैरोंकी ठोकरें खाकर अत्यन्त दीन हो रही थी। एक तो वह स्वयं ही दुबली-पतली थी, दूसरे उसका बछड़ा भी उसके पास नहीं था। उसे भूख लगी हुई थी और उसकी आँखोंसे आँसू बहते जा रहे थे॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—कृशां।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 163)

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