श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सूत उवाच

अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ।

द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्‍चतुर्विधः॥ ३८

abhyarthitastadā tasmai sthānāni kalaye dadau|

dyūtaṃ pānaṃ striyaḥ sūnā yatrādharmaścaturvidhaḥ|| 38

अर्थ

सूतजी कहते हैं—कलियुगकी प्रार्थना स्वीकार करके राजा परीक्षित‍्ने उसे चार स्थान दिये—द्यूत, मद्यपान, स्त्री-संग और हिंसा। इन स्थानोंमें क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता—ये चार प्रकारके अधर्म निवास करते हैं ॥ ३८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें