श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

सूत उवाच

एवं धर्मे प्रवदति स सम्राड् द्विजसत्तम।

समाहितेन मनसा विखेदः पर्यचष्ट तम्॥ २१

evaṃ dharme pravadati sa samrāḍ dvijasattama|

samāhitena manasā vikhedaḥ paryacaṣṭa tam|| 21

अर्थ

सूतजी कहते हैं—ऋषिश्रेष्ठ शौनकजी! धर्मका यह प्रवचन सुनकर सम्राट् परीक्षित् बहुत प्रसन्‍न हुए, उनका खेद मिट गया। उन्होंने शान्तचित्त होकर उनसे कहा—॥ २१॥

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