श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्‍चयः।

अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया॥ २०

apratarkyādanirdeśyāditi keṣvapi niścayaḥ|

atrānurūpaṃ rājarṣe vimṛśa svamanīṣayā|| 20

अर्थ

किन्हीं-किन्हींका ऐसा भी निश्‍चय है कि दुःखका कारण न तो तर्कके द्वारा जाना जा सकता है और न वाणीके द्वारा बतलाया जा सकता है। राजर्षे! अब इनमें कौन-सा मत ठीक है, यह आप अपनी बुद्धिसे ही विचार लीजिये॥ २०॥

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