श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.13

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

आख्याहि वृष भद्रं वः साधूनामकृतागसाम्।

आत्मवैरूप्यकर्तारं पार्थानां कीर्तिदूषणम्॥ १३

ākhyāhi vṛṣa bhadraṃ vaḥ sādhūnāmakṛtāgasām|

ātmavairūpyakartāraṃ pārthānāṃ kīrtidūṣaṇam|| 13

अर्थ

वृषभ! आपका कल्याण हो। बताइये, आप-जैसे निरपराध साधुओंका अंग-भंग करके किस दुष्टने पाण्डवोंकी कीर्तिमें कलंक लगाया है?॥ १३॥

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