॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.16.22
किं क्षत्रबन्धून् कलिनोपसृष्टान्
राष्ट्राणि वा तैरवरोपितानि।
इतस्ततो वाशनपानवासः-
स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम्॥ २२
kiṃ kṣatrabandhūn kalinopasṛṣṭān
rāṣṭrāṇi vā tairavaropitāni|
itastato vāśanapānavāsaḥ-
snānavyavāyonmukhajīvalokam|| 22
अर्थ
आजके नाममात्रके राजा तो सोलहों आने कलियुगी हो गये हैं, उन्होंने बड़े-बड़े देशोंको भी उजाड़ डाला है। क्या तुम उन राजाओं या देशोंके लिये शोक कर रही हो? आजकी जनता खान-पान, वस्त्र, स्नान और स्त्री-सहवास आदिमें शास्त्रीय नियमोंका पालन न करके स्वेच्छाचार कर रही है; क्या इसके लिये तुम दुःखी हो?॥ २२॥