श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.42

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः।

सर्वमात्मन्यजुहवीद् ब्रह्मण्यात्मानमव्यये॥ ४२

tritve hutvātha pañcatvaṃ taccaikatve'juhonmuniḥ|

sarvamātmanyajuhavīd brahmaṇyātmānamavyaye|| 42

अर्थ

इस प्रकार शरीरको मृत्युरूप अनुभव करके उन्होंने उसे त्रिगुणमें मिला दिया, त्रिगुणको मूल प्रकृतिमें, सर्वकारणरूपा प्रकृतिको आत्मामें और आत्माको अविनाशी ब्रह्ममें विलीन कर दिया। उन्हें यह अनुभव होने लगा कि यह सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच ब्रह्मस्वरूप है॥ ४२॥

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