उन्होंने दृढ़ भावनासे वाणीको मनमें, मनको प्राणमें, प्राणको अपानमें और अपानको उसकी क्रियाके साथ मृत्युमें तथा मृत्युको पंचभूतमय शरीरमें लीन कर लिया ॥ ४१॥
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे च तम्।
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वे ह्यजोहवीत्॥ ४१
उन्होंने दृढ़ भावनासे वाणीको मनमें, मनको प्राणमें, प्राणको अपानमें और अपानको उसकी क्रियाके साथ मृत्युमें तथा मृत्युको पंचभूतमय शरीरमें लीन कर लिया ॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 156) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/15/41/