श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.41

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे च तम्।

मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वे ह्यजोहवीत्॥ ४१

vācaṃ juhāva manasi tatprāṇa itare ca tam|

mṛtyāvapānaṃ sotsargaṃ taṃ pañcatve hyajohavīt|| 41

अर्थ

उन्होंने दृढ़ भावनासे वाणीको मनमें, मनको प्राणमें, प्राणको अपानमें और अपानको उसकी क्रियाके साथ मृत्युमें तथा मृत्युको पंचभूतमय शरीरमें लीन कर लिया ॥ ४१॥

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