श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

सोऽहं नृपेन्द्र रहितः पुरुषोत्तमेन

सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्यः।

अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन्

गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि॥ २०

so'haṃ nṛpendra rahitaḥ puruṣottamena

sakhyā priyeṇa suhṛdā hṛdayena śūnyaḥ|

adhvanyurukramaparigrahamaṅga rakṣan

gopairasadbhirabaleva vinirjito'smi|| 20

अर्थ

महाराज! जो मेरे सखा, प्रिय मित्र—नहीं-नहीं मेरे हृदय ही थे, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान्‌से मैं रहित हो गया हूँ। भगवान्‌की पत्नियोंको द्वारकासे अपने साथ ला रहा था, परंतु मार्गमें दुष्ट गोपोंने मुझे एक अबलाकी भाँति हरा दिया और मैं उनकी रक्षा नहीं कर सका॥ २०॥✎ 99 100

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #99 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #100 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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