॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.19
शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि-
ष्वैक्याद्वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः।
सख्युः सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं
सेहे महान्महितया कुमतेरघं मे॥ १९
śayyāsanāṭanavikatthanabhojanādi-
ṣvaikyādvayasya ṛtavāniti vipralabdhaḥ|
sakhyuḥ sakheva pitṛvattanayasya sarvaṃ
sehe mahānmahitayā kumateraghaṃ me|| 19
अर्थ
सोने, बैठने, टहलने और अपने सम्बन्धमें बड़ी-बड़ी बातें करने तथा भोजन आदि करनेमें हम प्रायः एक साथ रहा करते थे। किसी-किसी दिन मैं व्यंग्यसे उन्हें कह बैठता, ‘मित्र! तुम तो बड़े सत्यवादी हो!’ उस समय भी वे महापुरुष अपनी महानुभावताके कारण, जैसे मित्र अपने मित्रका और पिता अपने पुत्रका अपराध सह लेता है उसी प्रकार, मुझ दुर्बुद्धिके अपराधोंको सह लिया करते थे॥ १९॥✎ 99 100