श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि-

ष्वैक्याद्वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः।

सख्युः सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं

सेहे महान्महितया कुमतेरघं मे॥ १९

śayyāsanāṭanavikatthanabhojanādi-

ṣvaikyādvayasya ṛtavāniti vipralabdhaḥ|

sakhyuḥ sakheva pitṛvattanayasya sarvaṃ

sehe mahānmahitayā kumateraghaṃ me|| 19

अर्थ

सोने, बैठने, टहलने और अपने सम्बन्धमें बड़ी-बड़ी बातें करने तथा भोजन आदि करनेमें हम प्रायः एक साथ रहा करते थे। किसी-किसी दिन मैं व्यंग्यसे उन्हें कह बैठता, ‘मित्र! तुम तो बड़े सत्यवादी हो!’ उस समय भी वे महापुरुष अपनी महानुभावताके कारण, जैसे मित्र अपने मित्रका और पिता अपने पुत्रका अपराध सह लेता है उसी प्रकार, मुझ दुर्बुद्धिके अपराधोंको सह लिया करते थे॥ १९॥✎ 99 100

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #99 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #100 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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