श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यत्पादशुश्रूषणमुख्यकर्मणा सत्यादयो द‍्व्यष्टसहस्रयोषितः।

निर्जित्य संख्ये त्रिदशांस्तदाशिषो हरन्ति वज्रायुधवल्लभोचिताः॥ ३७

yatpādaśuśrūṣaṇamukhyakarmaṇā satyādayo dvyaṣṭasahasrayoṣitaḥ|

nirjitya saṃkhye tridaśāṃstadāśiṣo haranti vajrāyudhavallabhocitāḥ|| 37

अर्थ

सत्यभामा आदि सोलह हजार रानियाँ प्रधानरूपसे उनके चरणकमलोंकी सेवामें ही रत रहकर उनके द्वारा युद्धमें इन्द्रादि देवताओंको भी हराकर इन्द्राणीके भोगयोग्य तथा उन्हींकी अभीष्ट पारिजातादि वस्तुओंका उपभोग करती हैं॥ ३७॥

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