श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.3

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कालस्य च गतिं रौद्रां विपर्यस्तर्तुधर्मिणः४।

पापीयसीं नृणां वार्तां क्रोधलोभानृतात्मनाम्॥ ३

kālasya ca gatiṃ raudrāṃ viparyastartudharmiṇaḥ|

pāpīyasīṃ nṛṇāṃ vārtāṃ krodhalobhānṛtātmanām|| 3

अर्थ

उन्होंने देखा, कालकी गति बड़ी विकट हो गयी है। जिस समय जो ऋतु होनी चाहिये, उस समय वह नहीं होती और उनकी क्रियाएँ भी उलटी ही होती हैं। लोग बड़े क्रोधी, लोभी और असत्यपरायण हो गये हैं। अपने जीवन-निर्वाहके लिये लोग पापपूर्ण व्यापार करने लगे हैं॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—धर्मणः।

    (मुद्रित पृष्ठ 146)

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