श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान्।

इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः॥ २७

athodīcīṃ diśaṃ yātu svairajñātagatirbhavān|

ito'rvākprāyaśaḥ kālaḥ puṃsāṃ guṇavikarṣaṇaḥ|| 27

अर्थ

इसके आगे जो समय आनेवाला है, वह प्रायः मनुष्योंके गुणोंको घटानेवाला होगा; इसलिये आप अपने कुटुम्बियोंसे छिपकर उत्तराखण्डमें चले जाइये’॥ २७॥✎ 89 90

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #89 शब्दोंके बीचका स्थान: कोधारणकर → को धारणकर
  • #90 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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