॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.12.9
श्रीमद्दीर्घचतुर्बाहुं तप्तकाञ्चनकुण्डलम्।
क्षतजा१क्षं गदापाणिमात्मनः सर्वतोदिशम्।
परिभ्रमन्तमुल्काभां भ्रामयन्तं गदां मुहुः॥ ९
śrīmaddīrghacaturbāhuṃ taptakāñcanakuṇḍalam|
kṣatajākṣaṃ gadāpāṇimātmanaḥ sarvatodiśam|
paribhramantamulkābhāṃ bhrāmayantaṃ gadāṃ muhuḥ|| 9
अर्थ
वह देखनेमें तो अँगूठेभरका है, परन्तु उसका स्वरूप बहुत ही निर्मल है। अत्यन्त सुन्दर श्याम शरीर है, बिजलीके समान चमकता हुआ पीताम्बर धारण किये हुए है, सिरपर सोनेका मुकुट झिलमिला रहा है। उस निर्विकार पुरुषके बड़ी ही सुन्दर लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं। कानोंमें तपाये हुए स्वर्णके सुन्दर कुण्डल हैं, आँखोंमें लालिमा है, हाथमें लूकेके समान जलती हुई गदा लेकर उसे बार-बार घुमाता जा रहा है और स्वयं शिशुके चारों ओर घूम रहा है॥ ८-९॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—शङ्खचक्रगदा०।