श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

ताः पुत्रमङ्कमारोप्य स्नेहस्नुतपयोधराः।

हर्षविह्वलितात्मानः सिषिचुर्नेत्रजैर्जलैः॥ २९

tāḥ putramaṅkamāropya snehasnutapayodharāḥ|

harṣavihvalitātmānaḥ siṣicurnetrajairjalaiḥ|| 29

अर्थ

भगवान् सबसे पहले अपने माता-पिताके महलमें गये। वहाँ उन्होंने बड़े आनन्दसे देवकी आदि सातों माताओंको चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया और माताओंने उन्हें अपने हृदयसे लगाकर गोदमें बैठा लिया। स्नेहके कारण उनके स्तनोंसे दूधकी धारा बहने लगी, उनका हृदय हर्षसे विह्वल हो गया और वे आनन्दके आँसुओंसे उनका अभिषेक करने लगीं॥ २८-२९॥

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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