श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नित्यं निरीक्षमाणानां यदपि द्वारकौकसाम्।

नैव तृप्यन्ति हि दृशः श्रियो धामाङ्गमच्युतम्॥ २५ ✎ 1872

nityaṃ nirīkṣamāṇānāṃ yadapi dvārakaukasām|

naiva tṛpyanti hi dṛśaḥ śriyo dhāmāṅgamacyutam|| 25

अर्थ

भगवान्‌का वक्षःस्थल मूर्तिमान् सौन्दर्यलक्ष्मीका निवासस्थान है। उनका मुखारविन्द नेत्रोंके द्वारा पान करनेके लिये सौन्दर्य-सुधासे भरा हुआ पात्र है। उनकी भुजाएँ लोकपालोंको भी शक्ति देनेवाली हैं। उनके चरणकमल भक्त परमहंसोंके आश्रय हैं। उनके अंग-अंग शोभाके धाम हैं। भगवान्‌की इस छविको द्वारकावासी नित्य-निरन्तर निहारते रहते हैं, फिर भी उनकी आँखें एक क्षणके लिये भी तृप्त नहीं होतीं॥ २५-२६॥✎ 82

यह अर्थ श्लोक 25–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #82 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1872 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): श्रियोधामा → श्रियो धामा

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