श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अहो बत स्वर्यशसस्तिरस्करी कुशस्थली पुण्ययशस्करी भुवः।

पश्यन्ति नित्यं यदनुग्रहेषितं३ स्मितावलोकं स्वपतिं स्म यत्प्रजाः॥ २७

aho bata svaryaśasastiraskarī kuśasthalī puṇyayaśaskarī bhuvaḥ|

paśyanti nityaṃ yadanugraheṣitaṃ smitāvalokaṃ svapatiṃ sma yatprajāḥ|| 27

अर्थ

बड़े हर्षकी बात है कि द्वारकाने स्वर्गके यशका तिरस्कार करके पृथ्वीके पवित्र यशको बढ़ाया है। क्यों न हो, वहाँकी प्रजा अपने स्वामी भगवान् श्रीकृष्णको जो बड़े प्रेमसे मन्द-मन्द मुसकराते हुए उन्हें कृपादृष्टिसे देखते हैं, निरन्तर निहारती रहती हैं॥ २७॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—यदनुग्रहोषितं स्मिता०।

    (मुद्रित पृष्ठ 128)

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