श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

उद्धवः सात्यकिश्चैव व्यजने परमाद्भुते।

विकीर्यमाणः कुसुमै रेजे मधुपतिः पथि॥ १८

uddhavaḥ sātyakiścaiva vyajane paramādbhute|

vikīryamāṇaḥ kusumai reje madhupatiḥ pathi|| 18

अर्थ

उद्धव और सात्यकि बड़े विचित्र चँवर डुलाने लगे। मार्गमें भगवान् श्रीकृष्णपर चारों ओरसे पुष्पोंकी वर्षा हो रही थी। बड़ी ही मधुर झाँकी थी॥ १८॥✎ 77 78

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #77 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखती → को देखती
  • #78 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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