श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

सितातपत्रं जग्राह मुक्तादामविभूषितम्।

रत्नदण्डं गुडाकेशः प्रियः प्रियतमस्य ह॥ १७

sitātapatraṃ jagrāha muktādāmavibhūṣitam|

ratnadaṇḍaṃ guḍākeśaḥ priyaḥ priyatamasya ha|| 17

अर्थ

उस समय भगवान्‌के प्रिय सखा घुँघराले बालोंवाले अर्जुनने अपने प्रियतम श्रीकृष्णका वह श्वेत छत्र, जिसमें मोतियोंकी झालर लटक रही थी और जिसका डंडा रत्नोंका बना हुआ था, अपने हाथमें ले लिया॥ १७॥✎ 77 78

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #77 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखती → को देखती
  • #78 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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