भगवान् श्रीकृष्णके घरसे चलते समय उनके बन्धुओंकी स्त्रियोंके नेत्र उत्कण्ठावश उमड़ते हुए आँसुओंसे भर आये; परंतु इस भयसे कि कहीं यात्राके समय अशकुन न हो जाय, उन्होंने बड़ी कठिनाईसे उन्हें रोक लिया॥ १४॥✎ 7576
न्यरुन्धन्नुद्गलद्बाष्पमौत्कण्ठ्याद्देवकीसुते।
निर्यात्यगारान्नोऽभद्रमिति स्याद्बान्धवस्त्रियः॥ १४
भगवान् श्रीकृष्णके घरसे चलते समय उनके बन्धुओंकी स्त्रियोंके नेत्र उत्कण्ठावश उमड़ते हुए आँसुओंसे भर आये; परंतु इस भयसे कि कहीं यात्राके समय अशकुन न हो जाय, उन्होंने बड़ी कठिनाईसे उन्हें रोक लिया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.10.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 126) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/10/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)