श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.42

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

आसमाप्ति सकामेन कर्त्तव्यो हि विधिः स्वयम्।

स्नातो नित्यक्रियां कृत्वा प्राश्य पादोदकं हरेः॥ ४२

āsamāpti sakāmena karttavyo hi vidhiḥ svayam|

snāto nityakriyāṃ kṛtvā prāśya pādodakaṃ hareḥ|| 42

अर्थ

सकाम पुरुषको कथाकी समाप्तिके दिनतक स्वयं सावधानीके साथ सभी विधियोंका पालन करना चाहिये। (भागवत-कथाके श्रोता और वक्ता दोनोंके ही पालन करनेयोग्य विधि यह है—) प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करके अपना नित्यकर्म पूरा कर ले। फिर भगवान्‌का चरणामृत पीकर पूजाके सामानसे श्रीमद्भागवतकी पुस्तक और गुरुदेव (व्यास) का पूजन करे। इसके पश्‍चात् अत्यन्त प्रसन्‍नतापूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा स्वयं कहे अथवा सुने॥ ४२-४३॥✎ 1793

यह अर्थ श्लोक 42–43 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1793 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रसन्‍नता-पूर्वक → प्रसन्‍नतापूर्वक

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