श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.18

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

सर्वं श्रुतमुपादत्ते सारासारान्धधीर्वृषः।

स्वादुद्राक्षां खलिं चापि निर्विशेषं यथा वृषः॥ १८

sarvaṃ śrutamupādatte sārāsārāndhadhīrvṛṣaḥ|

svādudrākṣāṃ khaliṃ cāpi nirviśeṣaṃ yathā vṛṣaḥ|| 18

अर्थ

‘वृष’ कहते हैं बैलको। उसके सामने मीठे-मीठे अंगूर हो या कड़वी खली, दोनोंको वह एक-सा ही मानकर खाता है। उसी प्रकार जो सुनी हुई सभी बातें ग्रहण करता है, पर सार और असार वस्तुका विचार करनेमें उसकी बुद्धि अंधी—असमर्थ होती है, ऐसा श्रोता ‘वृष’ कहलाता है॥ १८॥

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