॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.15
शब्दं नानिमिषो जातु करोत्यास्वादयन् रसम्।
श्रोता स्निग्धो भवेन्मीनो मीनः क्षीरनिधौ यथा॥ १५
śabdaṃ nānimiṣo jātu karotyāsvādayan rasam|
śrotā snigdho bhavenmīno mīnaḥ kṣīranidhau yathā|| 15
अर्थ
जैसे क्षीरसागरमें मछली मौन रहकर अपलक आँखोंसे देखती हुई सदा दुग्ध पान करती रहती है, उसी प्रकार जो कथा सुनते समय निर्निमेष नयनोंसे देखता हुआ मुँहसे कभी एक शब्द भी नहीं निकालता और निरन्तर कथारसका ही आस्वादन करता रहता है, वह प्रेमी श्रोता ‘मीन’ कहा गया है॥ १५॥