श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.2.9

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

श्रीकृष्णपत्‍न्य ऊचुः

यथा वयं कृष्णपत्‍न्यस्तथा त्वमपि शोभने।

वयं विरहदुःखार्तास्त्वं न कालिन्दि तद् वद॥ ९

yathā vayaṃ kṛṣṇapatnyastathā tvamapi śobhane|

vayaṃ virahaduḥkhārtāstvaṃ na kālindi tad vada|| 9

अर्थ

श्रीकृष्णकी रानियोंने कहा—बहिन कालिन्दी! जैसे हम सब श्रीकृष्णकी धर्मपत्‍नी हैं, वैसे ही तुम भी तो हो। हम तो उनकी विरहाग्‍निमें जली जा रही हैं, उनके वियोग-दुःखसे हमारा हृदय व्यथित हो रहा है; किन्तु तुम्हारी यह स्थिति नहीं है, तुम प्रसन्‍न हो। इसका क्या कारण है? कल्याणी! कुछ बताओ तो सही॥ ९॥

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