श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.88

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

मत्तो वरं भाववृताद् वृणुध्वं प्रीतः कथाकीर्तनतोऽस्मि साम्प्रतम्।

श्रुत्वेति तद्वाक्यमतिप्रसन्‍नाः प्रेमार्द्रचित्ता हरिमूचिरे ते॥ ८८

matto varaṃ bhāvavṛtād vṛṇudhvaṃ prītaḥ kathākīrtanato'smi sāmpratam|

śrutveti tadvākyamatiprasannāḥ premārdracittā harimūcire te|| 88

अर्थ

‘मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तनसे बहुत प्रसन्‍न हूँ, तुम्हारे भक्तिभावने इस समय मुझे अपने वशमें कर लिया है। अतः तुमलोग मुझसे वर माँगो’। भगवान्‌के ये वचन सुनकर सब लोग बड़े प्रसन्‍न हुए और प्रेमार्द्रचित्तसे भगवान्‌से कहने लगे॥ ८८॥✎ 20

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #20 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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