‘मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तनसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे भक्तिभावने इस समय मुझे अपने वशमें कर लिया है। अतः तुमलोग मुझसे वर माँगो’। भगवान्के ये वचन सुनकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए और प्रेमार्द्रचित्तसे भगवान्से कहने लगे॥ ८८॥✎ 20
मत्तो वरं भाववृताद् वृणुध्वं प्रीतः कथाकीर्तनतोऽस्मि साम्प्रतम्।
श्रुत्वेति तद्वाक्यमतिप्रसन्नाः प्रेमार्द्रचित्ता हरिमूचिरे ते॥ ८८
‘मैं तुम्हारी इस कथा और कीर्तनसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारे भक्तिभावने इस समय मुझे अपने वशमें कर लिया है। अतः तुमलोग मुझसे वर माँगो’। भगवान्के ये वचन सुनकर सब लोग बड़े प्रसन्न हुए और प्रेमार्द्रचित्तसे भगवान्से कहने लगे॥ ८८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.88 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 78) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/88/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)