॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.6.65
शक्तौ पलत्रयमितं स्वर्णसिंहं विधाय च।
तत्रास्य पुस्तकं स्थाप्यं लिखितं ललिताक्षरम्॥ ६५
śaktau palatrayamitaṃ svarṇasiṃhaṃ vidhāya ca|
tatrāsya pustakaṃ sthāpyaṃ likhitaṃ lalitākṣaram|| 65
अर्थ
सामर्थ्य हो तो तीन तोले सोनेका एक सिंहासन बनवाये, उसपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखी हुई श्रीमद्भागवतकी पोथी रखकर उसकी आवाहनादि विविध उपचारोंसे पूजा करे और फिर जितेन्द्रिय आचार्यको—उसका वस्त्र, आभूषण एवं गन्धादिसे पूजनकर—दक्षिणाके सहित समर्पण कर दे॥ ६५-६६॥