एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे।
तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम्॥ १०३
etāṃ yo niyatatayā śṛṇoti bhaktyā yaścaināṃ kathayati śuddhavaiṣṇavāgre|
tau samyagvidhikaraṇātphalaṃ labhete yāthārthyānna hi bhuvane kimapyasādhyam|| 103
अर्थ
जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं—उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता॥ १०३॥
इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये श्रवणविधिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
॥ समाप्तमिदं श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम्॥
॥ हरिः ॐ तत्सत्॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥
एतां यो नियततया शृणोति भक्त्या यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे।
तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते याथार्थ्यान्न हि भुवने किमप्यसाध्यम्॥ १०३
जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं—उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता॥ १०३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.6.103 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 80) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/6/103/