श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.6.103

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एतां यो नियततया शृणोति भक्‍त्या यश्चैनां कथयति शुद्धवैष्णवाग्रे।

तौ सम्यग्विधिकरणात्फलं लभेते याथार्थ्यान्‍न हि भुवने किमप्यसाध्यम्॥ १०३

etāṃ yo niyatatayā śṛṇoti bhaktyā yaścaināṃ kathayati śuddhavaiṣṇavāgre|

tau samyagvidhikaraṇātphalaṃ labhete yāthārthyānna hi bhuvane kimapyasādhyam|| 103

अर्थ

जो पुरुष नियमपूर्वक इस कथाका भक्तिभावसे श्रवण करता है और जो शुद्धान्तःकरण भगवद्भक्तोंके सामने इसे सुनाता है, वे दोनों ही विधिका पूरा-पूरा पालन करनेके कारण इसका यथार्थ फल पाते हैं—उनके लिये त्रिलोकीमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता॥ १०३॥

इति श्रीपद्मपुराणे उत्तरखण्डे श्रीमद्भागवतमाहात्म्ये श्रवणविधिकथनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

॥ समाप्तमिदं श्रीमद्भागवतमाहात्म्यम्॥

॥ हरिः ॐ तत्सत्॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें