॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.5.22
सकृन्मेषः सकृद्धस्ती सकृच्च महिषोऽभवत्।
सकृदिन्द्रः सकृच्चाग्निः पुनश्च पुरुषोऽभवत्॥ २२
sakṛnmeṣaḥ sakṛddhastī sakṛcca mahiṣo'bhavat|
sakṛdindraḥ sakṛccāgniḥ punaśca puruṣo'bhavat|| 22
अर्थ
वह कभी भेड़ा, कभी हाथी, कभी भैंसा, कभी इन्द्र और कभी अग्निका रूप धारण करता। अन्तमें वह मनुष्यके आकारमें प्रकट हुआ॥ २२॥