हिंसाका उसे व्यसन-सा हो गया था। हर समय वह अस्त्र-शस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दीन-दुःखियोंको व्यर्थ तंग करता। चाण्डालोंसे उसका विशेष प्रेम था; बस, हाथमें फंदा लिये कुत्तोंकी टोलीके साथ शिकारकी टोहमें घूमता रहता॥ ६९॥
हिंसकः शस्त्रधारी च दीनान्धानां प्रपीडकः।
चाण्डालाभिरतो नित्यं पाशहस्तः श्वसंगतः॥ ६९
हिंसाका उसे व्यसन-सा हो गया था। हर समय वह अस्त्र-शस्त्र धारण किये रहता और बेचारे अंधे और दीन-दुःखियोंको व्यर्थ तंग करता। चाण्डालोंसे उसका विशेष प्रेम था; बस, हाथमें फंदा लिये कुत्तोंकी टोलीके साथ शिकारकी टोहमें घूमता रहता॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण PRE.4.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 60) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/padma/4/69/