श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.67

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स्नानशौचक्रियाहीनो दुर्भक्षी क्रोधवर्धितः।

दुष्परिग्रहकर्ता च शवहस्तेन भोजनम्॥ ६७

snānaśaucakriyāhīno durbhakṣī krodhavardhitaḥ|

duṣparigrahakartā ca śavahastena bhojanam|| 67

अर्थ

स्नान-शौचादि ब्राह्मणोचित आचारोंका उसमें नाम भी न था और न खान-पानका ही कोई परहेज था। क्रोध उसमें बहुत बढ़ा-चढ़ा था। वह बुरी-बुरी वस्तुओंका संग्रह किया करता था। मुर्देके हाथसे छुआया हुआ अन्‍न भी खा लेता था॥ ६७॥

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