श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.4.17

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

आत्मदेवः पुरे तस्मिन् सर्ववेदविशारदः।

श्रौतस्मार्तेषु निष्णातो द्वितीय इव भास्करः॥ १७

ātmadevaḥ pure tasmin sarvavedaviśāradaḥ|

śrautasmārteṣu niṣṇāto dvitīya iva bhāskaraḥ|| 17

अर्थ

उस नगरमें समस्त वेदोंका विशेषज्ञ और श्रौत-स्मार्त कर्मोंमें निपुण एक आत्मदेव नामक ब्राह्मण रहता था, वह साक्षात् दूसरे सूर्यके समान तेजस्वी था॥ १७॥

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