श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.60

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

इत्युद्धववचः श्रुत्वा प्रभासेऽचिन्तयद्धरिः।

भक्तावलम्बनार्थाय किं विधेयं मयेति च॥ ६०

ityuddhavavacaḥ śrutvā prabhāse'cintayaddhariḥ|

bhaktāvalambanārthāya kiṃ vidheyaṃ mayeti ca|| 60

अर्थ

प्रभासक्षेत्रमें उद्धवजीके ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये॥ ६०॥✎ 2180

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2180 छूटा या अधिक पाठ: → प्रभासक्षेत्रमें उद्धवजीके ये वचन सुनकर भगवान् सोचने लगे कि भक्तोंके अवलम्बके लिये मुझे क्या व्यवस्था करनी चाहिये॥ ६०॥ शौनकजी! तब भगवान्‌ने अपनी सारी शक्ति भागवतमें रख दी; वे अन्तर्धान होकर इस भागवतसमुद्रमें प्रवेश कर गये॥ ६१॥ इसलिये यह भगवान्‌की साक्षात् शब्दमयी मूर्ति है। इसके सेवन, श्रवण, पाठ अथवा दर्शनसे ही मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं॥ ६२॥ इसीसे इसका सप्ताहश्रवण सबसे बढ़कर माना गया है और कलियुगमें तो अन्य सब साधनोंको छोड़कर यही प्रधान धर्म बताया गया है॥ ६३॥ कलिकालमें यही ऐसा धर्म है, जो दुःख, दरिद्रता, दुर्भाग्य और पापोंकी सफाई कर देता है तथा काम-क्रोधादि शत्रुओंपर विजय दिलाता है॥ ६४॥ अन्यथा, भगवान्‌की इस मायासे पीछा छुड़ाना देवताओंके लिये भी कठिन है, मनुष्य तो इसे छोड़ ही कैसे सकते हैं। अतः इससे छूटनेके लिये भी सप्ताहश्रवणका विधान किया गया है॥ ६५॥

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