श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.3.58

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अतः सत्सु दयां कृत्वा भक्तवत्सल मा व्रज।

भक्तार्थं सगुणो जातो निराकारोऽपि चिन्मयः॥ ५८

ataḥ satsu dayāṃ kṛtvā bhaktavatsala mā vraja|

bhaktārthaṃ saguṇo jāto nirākāro'pi cinmayaḥ|| 58

अर्थ

इसलिये भक्तवत्सल! आप साधुओंपर कृपा करके यहाँसे मत जाइये। भगवन्! आपने निराकार और चिन्मात्र होकर भी भक्तोंके लिये ही तो यह सगुण रूप धारण किया है॥ ५८॥✎ 12

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #12 शब्दोंके बीचका स्थान: ५५॥अब → ५५॥ अब

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