॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.2.53
कुमारा ऊचुः
मा चिन्तां कुरु देवर्षे हर्षं चित्ते समावह।
उपायः सुखसाध्योऽत्र वर्तते पूर्व एव हि॥ ५३
mā cintāṃ kuru devarṣe harṣaṃ citte samāvaha|
upāyaḥ sukhasādhyo'tra vartate pūrva eva hi|| 53
अर्थ
सनकादिने कहा—देवर्षे! आप चिन्ता न करें, मनमें प्रसन्न हों; उनके उद्धारका एक सरल उपाय पहलेसे ही विद्यमान है॥ ५३॥ नारदजी! आप धन्य हैं। आप विरक्तोंके शिरोमणि हैं। श्रीकृष्ण-दासोंके शाश्वत पथ-प्रदर्शक एवं भक्तियोगके भास्कर हैं॥ ५४॥ आप भक्तिके लिये जो उद्योग कर रहे हैं, यह आपके लिये कोई आश्चर्यकी बात नहीं समझनी चाहिये। भगवान्के भक्तके लिये तो भक्तिकी सम्यक् स्थापना करना सदा उचित ही है॥ ५५॥ ऋषियोंने संसारमें अनेकों मार्ग प्रकट किये हैं; किंतु वे सभी कष्टसाध्य हैं और परिणाममें प्रायः स्वर्गकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं॥ ५६॥ अभीतक भगवान्की प्राप्ति करानेवाला मार्ग तो गुप्त ही रहा है। उसका उपदेश करनेवाला पुरुष प्रायः भाग्यसे ही मिलता है॥ ५७॥ आपको आकाशवाणीने जिस सत्कर्मका संकेत किया है, उसे हम बतलाते हैं; आप प्रसन्न और समाहितचित्त होकर सुनिये॥ ५८॥ ✎ 11