श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक PRE.1.73

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (पद्मपुराण) · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कामक्रोधमहालोभतृष्णाव्याकुलचेतसः।

तेऽपि तिष्ठन्ति तपसि तपःसारस्ततो गतः॥ ७३

kāmakrodhamahālobhatṛṣṇāvyākulacetasaḥ|

te'pi tiṣṭhanti tapasi tapaḥsārastato gataḥ|| 73

अर्थ

जिनका चित्त निरन्तर काम, क्रोध, महान् लोभ और तृष्णासे तपता रहता है वे भी तपस्याका ढोंग करने लगे हैं, इसलिये तपका भी सार निकल गया॥ ७३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें