॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक PRE.1.48
उत्पन्ना द्रविडे साहं वृद्धिं कर्णाटके गता।
क्वचित्क्वचिन्महाराष्ट्रे गुर्जरे जीर्णतां गता॥ ४८
utpannā draviḍe sāhaṃ vṛddhiṃ karṇāṭake gatā|
kvacitkvacinmahārāṣṭre gurjare jīrṇatāṃ gatā|| 48
अर्थ
मैं द्रविड़ देशमें उत्पन्न हुई, कर्णाटकमें बढ़ी, कहीं-कहीं महाराष्ट्रमें सम्मानित हुई; किन्तु गुजरातमें मुझको बुढ़ापेने आ घेरा॥ ४८॥