{"id":"9.9","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 9","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ नवमोऽध्यायः","topics":["भगीरथ-चरित्र और गंगावतरण"],"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.9.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[44,51]},"verses":[{"id":"9.9.1","number":1,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/1/","page":45,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अंशुमांश्‍च तपस्तेपे गंगानयनकाम्यया।","कालं महान्तं नाशक्‍नोत् ततः कालेन संस्थितः॥ १"],"iast":["aṃśumāṃśca tapastepe gaṃgānayanakāmyayā|","kālaṃ mahāntaṃ nāśaknot tataḥ kālena saṃsthitaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अंशुमान्‍ने गंगाजीको लानेकी कामनासे बहुत वर्षोंतक घोर तपस्या की; परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली, समय आनेपर उनकी मृत्यु हो गयी॥ १॥"},{"id":"9.9.2","number":2,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/2/","page":45,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दिलीपस्तत्सुतस्तद्वदशक्तः कालमेयिवान्।","भगीरथस्तस्य पुत्रस्तेपे स सुमहत् तपः॥ २"],"iast":["dilīpastatsutastadvadaśaktaḥ kālameyivān|","bhagīrathastasya putrastepe sa sumahat tapaḥ|| 2"],"meaning":"अंशुमान्के पुत्र दिलीपने भी वैसी ही तपस्या की; परन्तु वे भी असफल ही रहे, समयपर उनकी भी मृत्यु हो गयी। दिलीपके पुत्र थे भगीरथ। उन्होंने बहुत बड़ी तपस्या की॥ २॥"},{"id":"9.9.3","number":3,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/3/","page":45,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दर्शयामास तं देवी प्रसन्‍ना वरदास्मि ते।","इत्युक्तः स्वमभिप्रायं शशंसावनतो नृपः॥ ३"],"iast":["darśayāmāsa taṃ devī prasannā varadāsmi te|","ityuktaḥ svamabhiprāyaṃ śaśaṃsāvanato nṛpaḥ|| 3"],"meaning":"उनकी तपस्यासे प्रसन्‍न होकर भगवती गंगाने उन्हें दर्शन दिया और कहा कि—‘मैं तुम्हें वर देनेके लिये आयी हूँ।’ उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने बड़ी नम्रतासे अपना अभिप्राय प्रकट किया कि ‘आप मर्त्यलोकमें चलिये’॥ ३॥"},{"id":"9.9.4","number":4,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/4/","page":45,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कोऽपि धारयिता वेगं पतन्त्या मे महीतले।","अन्यथा भूतलं भित्त्वा नृप यास्ये रसातलम्॥ ४"],"iast":["ko'pi dhārayitā vegaṃ patantyā me mahītale|","anyathā bhūtalaṃ bhittvā nṛpa yāsye rasātalam|| 4"],"meaning":"[गंगाजीने कहा—] ‘जिस समय मैं स्वर्गसे पृथ्वीतलपर गिरूँ उस समय मेरे वेगको कोई धारण करनेवाला होना चाहिये। भगीरथ! ऐसा न होनेपर मैं पृथ्वीको फोड़कर रसातलमें चली जाऊँगी॥ ४॥"},{"id":"9.9.5","number":5,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/5/","page":45,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["किं चाहं न भुवं यास्ये नरा मय्यामृजन्त्यघम्।","मृजामि तदघं कुत्र राजंस्तत्र विचिन्त्यताम्॥ ५"],"iast":["kiṃ cāhaṃ na bhuvaṃ yāsye narā mayyāmṛjantyagham|","mṛjāmi tadaghaṃ kutra rājaṃstatra vicintyatām|| 5"],"meaning":"इसके अतिरिक्त इस कारणसे भी मैं पृथ्वीपर नहीं जाऊँगी कि लोग मुझमें अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पापको कहाँ धोऊँगी। भगीरथ! इस विषयमें तुम स्वयं विचार कर लो’॥ ५॥"},{"id":"9.9.6","number":6,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/6/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।","हरन्त्यघं तेऽङ्गसंगात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः॥ ६"],"iast":["sādhavo nyāsinaḥ śāntā brahmiṣṭhā lokapāvanāḥ|","harantyaghaṃ te'ṅgasaṃgāt teṣvāste hyaghabhiddhariḥ|| 6"],"meaning":"भगीरथने कहा—‘माता! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं—वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं॥ ६॥"},{"id":"9.9.7","number":7,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/7/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["धारयिष्यति ते वेगं रुद्रस्त्वात्मा शरीरिणाम्।","यस्मिन्‍नोतमिदं प्रोतं विश्‍वं शाटीव तन्तुषु॥ ७"],"iast":["dhārayiṣyati te vegaṃ rudrastvātmā śarīriṇām|","yasminnotamidaṃ protaṃ viśvaṃ śāṭīva tantuṣu|| 7"],"meaning":"समस्त प्राणियोंके आत्मा रुद्रदेव तुम्हारा वेग धारण कर लेंगे। क्योंकि जैसे साड़ी सूतोंमें ओत-प्रोत है, वैसे ही यह सारा विश्‍व भगवान् रुद्रमें ही ओत-प्रोत है’॥ ७॥"},{"id":"9.9.8","number":8,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/8/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वा स नृपो देवं तपसातोषयच्छिवम्।","कालेनाल्पीयसा राजंस्तस्येशः समतुष्यत॥ ८"],"iast":["ityuktvā sa nṛpo devaṃ tapasātoṣayacchivam|","kālenālpīyasā rājaṃstasyeśaḥ samatuṣyata|| 8"],"meaning":"परीक्षित्! गंगाजीसे इस प्रकार कहकर राजा भगीरथने तपस्याके द्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्‍न किया। थोड़े ही दिनोंमें महादेवजी उनपर प्रसन्‍न हो गये॥ ८॥"},{"id":"9.9.9","number":9,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/9/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["तथेति राज्ञाभिहितं सर्वलोकहितः शिवः।","दधारावहितो गंगां पादपूतजलां हरेः॥ ९"],"iast":["tatheti rājñābhihitaṃ sarvalokahitaḥ śivaḥ|","dadhārāvahito gaṃgāṃ pādapūtajalāṃ hareḥ|| 9"],"meaning":"भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण विश्‍वके हितैषी हैं, राजाकी बात उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर स्वीकार कर ली। फिर शिवजीने सावधान होकर गंगाजीको अपने सिरपर धारण किया। क्यों न हो, भगवान्‌के चरणोंका सम्पर्क होनेके कारण गंगाजीका जल परम पवित्र जो है॥ ९॥"},{"id":"9.9.10","number":10,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/10/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["भगीरथः स राजर्षिर्निन्ये भुवनपावनीम्।","यत्र स्वपितृणां देहा भस्मीभूताः स्म शेरते॥ १०"],"iast":["bhagīrathaḥ sa rājarṣirninye bhuvanapāvanīm|","yatra svapitṛṇāṃ dehā bhasmībhūtāḥ sma śerate|| 10"],"meaning":"इसके बाद राजर्षि भगीरथ त्रिभुवनपावनी गंगाजीको वहाँ ले गये जहाँ उनके पितरोंके शरीर राखके ढेर बने पड़े थे॥ १०॥"},{"id":"9.9.11","number":11,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/11/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["रथेन वायुवेगेन प्रयान्तमनुधावती।","देशान् पुनन्ती निर्दग्धानासिंचत् सगरात्मजान्॥ ११"],"iast":["rathena vāyuvegena prayāntamanudhāvatī|","deśān punantī nirdagdhānāsiṃcat sagarātmajān|| 11"],"meaning":"वे वायुके समान वेगसे चलनेवाले रथपर सवार होकर आगे-आगे चल रहे थे और उनके पीछे-पीछे मार्गमें पड़नेवाले देशोंको पवित्र करती हुई गंगाजी दौड़ रही थीं। इस प्रकार गंगासागर-संगमपर पहुँचकर उन्होंने सगरके जले हुए पुत्रोंको अपने जलमें डुबा दिया॥ ११॥"},{"id":"9.9.12","number":12,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/12/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["यज्जलस्पर्शमात्रेण ब्रह्मदण्डहता अपि।","सगरात्मजा दिवं जग्मुः केवलं देहभस्मभिः॥ १२"],"iast":["yajjalasparśamātreṇa brahmadaṇḍahatā api|","sagarātmajā divaṃ jagmuḥ kevalaṃ dehabhasmabhiḥ|| 12"],"meaning":"यद्यपि सगरके पुत्र ब्राह्मणके तिरस्कारके कारण भस्म हो गये थे, इसलिये उनके उद्धारका कोई उपाय न था—फिर भी केवल शरीरकी राखके साथ गंगाजलका स्पर्श हो जानेसे ही वे स्वर्गमें चले गये॥ १२॥"},{"id":"9.9.13","number":13,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/13/","page":46,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["भस्मीभूतांगसंगेन स्वर्याताः सगरात्मजाः।","किं पुनः श्रद्धया देवीं ये सेवन्ते धृतव्रताः॥ १३"],"iast":["bhasmībhūtāṃgasaṃgena svaryātāḥ sagarātmajāḥ|","kiṃ punaḥ śraddhayā devīṃ ye sevante dhṛtavratāḥ|| 13"],"meaning":"परीक्षित्! जब गंगाजलसे शरीरकी राखका स्पर्श हो जानेसे सगरके पुत्रोंको स्वर्गकी प्राप्ति हो गयी तब जो लोग श्रद्धाके साथ नियम लेकर श्रीगंगाजीका सेवन करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ १३॥"},{"id":"9.9.14","number":14,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/14/","page":47,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["न ह्येतत् परमाश्‍चर्यं स्वर्धुन्या यदिहोदितम्।","अनन्तचरणाम्भोजप्रसूताया भवच्छिदः॥ १४"],"iast":["na hyetat paramāścaryaṃ svardhunyā yadihoditam|","anantacaraṇāmbhojaprasūtāyā bhavacchidaḥ|| 14"],"meaning":"मैंने गंगाजीकी महिमाके सम्बन्धमें जो कुछ कहा है, उसमें आश्‍चर्यकी कोई बात नहीं है। क्योंकि गंगाजी भगवान्‌के उन चरणकमलोंसे निकली हैं, जिनका श्रद्धाके साथ चिन्तन करके बड़े-बड़े मुनि निर्मल हो जाते हैं और तीनों गुणोंके कठिन बन्धनको काटकर तुरन्त भगवत्स्वरूप बन जाते हैं। फिर गंगाजी संसारका बन्धन काट दें, इसमें कौन बड़ी बात है॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"9.9.15","number":15,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/15/","page":47,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["संनिवेश्य मनो यस्मिञ्छ्रद्धया मुनयोऽमलाः।","त्रैगुण्यं दुस्त्यजं हित्वा सद्यो यातास्तदात्मताम्॥ १५"],"iast":["saṃniveśya mano yasmiñchraddhayā munayo'malāḥ|","traiguṇyaṃ dustyajaṃ hitvā sadyo yātāstadātmatām|| 15"],"meaning":"मैंने गंगाजीकी महिमाके सम्बन्धमें जो कुछ कहा है, उसमें आश्‍चर्यकी कोई बात नहीं है। क्योंकि गंगाजी भगवान्‌के उन चरणकमलोंसे निकली हैं, जिनका श्रद्धाके साथ चिन्तन करके बड़े-बड़े मुनि निर्मल हो जाते हैं और तीनों गुणोंके कठिन बन्धनको काटकर तुरन्त भगवत्स्वरूप बन जाते हैं। फिर गंगाजी संसारका बन्धन काट दें, इसमें कौन बड़ी बात है॥ १४-१५॥","meaning_covers":[14,15]},{"id":"9.9.16","number":16,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/16/","page":47,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["श्रुतो भगीरथाज्जज्ञे तस्य नाभोऽपरोऽभवत्।","सिन्धुद्वीपस्ततस्तस्मादयुतायुस्ततोऽभवत्॥ १६"],"iast":["śruto bhagīrathājjajñe tasya nābho'paro'bhavat|","sindhudvīpastatastasmādayutāyustato'bhavat|| 16"],"meaning":"भगीरथका पुत्र था श्रुत, श्रुतका नाभ। यह नाभ पूर्वोक्त नाभसे भिन्‍न है। नाभका पुत्र था सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीपका अयुतायु। अयुतायुके पुत्रका नाम था ऋतुपर्ण। वह नलका मित्र था। उसने नलको पासा फेंकनेकी विद्याका रहस्य बतलाया था और बदलेमें उससे अश्‍व-विद्या सीखी थी। ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम हुआ॥ १६-१७॥","meaning_covers":[16,17]},{"id":"9.9.17","number":17,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/17/","page":47,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["ऋतुपर्णो नलसखो योऽश्‍वविद्यामयान्‍नलात्।","दत्त्वाक्षहृदयं चास्मै सर्वकामस्तु तत्सुतः॥ १७"],"iast":["ṛtuparṇo nalasakho yo'śvavidyāmayānnalāt|","dattvākṣahṛdayaṃ cāsmai sarvakāmastu tatsutaḥ|| 17"],"meaning":"भगीरथका पुत्र था श्रुत, श्रुतका नाभ। यह नाभ पूर्वोक्त नाभसे भिन्‍न है। नाभका पुत्र था सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीपका अयुतायु। अयुतायुके पुत्रका नाम था ऋतुपर्ण। वह नलका मित्र था। उसने नलको पासा फेंकनेकी विद्याका रहस्य बतलाया था और बदलेमें उससे अश्‍व-विद्या सीखी थी। ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम हुआ॥ १६-१७॥","meaning_covers":[16,17]},{"id":"9.9.18","number":18,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/18/","page":47,"speaker":"भगीरथ उवाच","sanskrit":["ततः सुदासस्तत्पुत्रो मदयन्तीपतिर्नृप।","आहुर्मित्रसहं यं वै कल्माषाङ्‌घ्रिमुत क्‍वचित्।","वसिष्ठशापाद् रक्षोऽभूदनपत्यः स्वकर्मणा॥ १८"],"iast":["tataḥ sudāsastatputro madayantīpatirnṛpa|","āhurmitrasahaṃ yaṃ vai kalmāṣāṅghrimuta kvacit|","vasiṣṭhaśāpād rakṣo'bhūdanapatyaḥ svakarmaṇā|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! सर्वकामके पुत्रका नाम था सुदास। सुदासके पुत्रका नाम था सौदास और सौदासकी पत्‍नीका नाम था मदयन्ती। सौदासको ही कोई-कोई मित्रसह कहते हैं और कहीं-कहीं उसे कल्माषपाद भी कहा गया है। वह वसिष्ठके शापसे राक्षस हो गया था और फिर अपने कर्मोंके कारण सन्तानहीन हुआ॥ १८॥"},{"id":"9.9.19","number":19,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/19/","page":47,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["किं निमित्तो गुरोः शापः सौदासस्य महात्मनः।","एतद् वेदितुमिच्छामः कथ्यतां न रहो यदि॥ १९"],"iast":["kiṃ nimitto guroḥ śāpaḥ saudāsasya mahātmanaḥ|","etad veditumicchāmaḥ kathyatāṃ na raho yadi|| 19"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! हम यह जानना चाहते हैं कि महात्मा सौदासको गुरु वसिष्ठजीने शाप क्यों दिया। यदि कोई गोपनीय बात न हो तो कृपया बतलाइये॥ १९॥"},{"id":"9.9.20","number":20,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/20/","page":47,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सौदासो मृगयां कञ्चिच्चरन् रक्षो जघान ह।","मुमोच भ्रातरं सोऽथ गतः प्रतिचिकीर्षया॥ २०"],"iast":["saudāso mṛgayāṃ kañciccaran rakṣo jaghāna ha|","mumoca bhrātaraṃ so'tha gataḥ praticikīrṣayā|| 20"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार राजा सौदास शिकार खेलने गये हुए थे। वहाँ उन्होंने किसी राक्षसको मार डाला और उसके भाईको छोड़ दिया। उसने राजाके इस कामको अन्याय समझा और उनसे भाईकी मृत्युका बदला लेनेके लिये वह रसोइयेका रूप धारण करके उनके घर गया। जब एक दिन भोजन करनेके लिये गुरु वसिष्ठजी राजाके यहाँ आये, तब उसने मनुष्यका मांस राँधकर उन्हें परस दिया॥ २०-२१॥","meaning_covers":[20,21]},{"id":"9.9.21","number":21,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/21/","page":47,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स चिन्तयन्‍नघं राज्ञः सूदरूपधरो गृहे।","गुरवे भोक्तुकामाय पक्त्वा निन्ये नरामिषम्॥ २१"],"iast":["sa cintayannaghaṃ rājñaḥ sūdarūpadharo gṛhe|","gurave bhoktukāmāya paktvā ninye narāmiṣam|| 21"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार राजा सौदास शिकार खेलने गये हुए थे। वहाँ उन्होंने किसी राक्षसको मार डाला और उसके भाईको छोड़ दिया। उसने राजाके इस कामको अन्याय समझा और उनसे भाईकी मृत्युका बदला लेनेके लिये वह रसोइयेका रूप धारण करके उनके घर गया। जब एक दिन भोजन करनेके लिये गुरु वसिष्ठजी राजाके यहाँ आये, तब उसने मनुष्यका मांस राँधकर उन्हें परस दिया॥ २०-२१॥","meaning_covers":[20,21]},{"id":"9.9.22","number":22,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/22/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["परिवेक्ष्यमाणं भगवान् विलोक्याभक्ष्यमंजसा।","राजानमशपत् क्रुद्धो रक्षो ह्येवं भविष्यसि॥ २२"],"iast":["parivekṣyamāṇaṃ bhagavān vilokyābhakṣyamaṃjasā|","rājānamaśapat kruddho rakṣo hyevaṃ bhaviṣyasi|| 22"],"meaning":"जब सर्वसमर्थ वसिष्ठजीने देखा कि परोसी जानेवाली वस्तु तो नितान्त अभक्ष्य है, तब उन्होंने क्रोधित होकर राजाको शाप दिया कि ‘जा, इस कामसे तू राक्षस हो जायगा’॥ २२॥"},{"id":"9.9.23","number":23,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/23/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["रक्षःकृतं तद् विदित्वा चक्रे द्वादशवार्षिकम्।","सोऽप्यपोऽञ्जलिनाऽऽदाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः॥ २३"],"iast":["rakṣaḥkṛtaṃ tad viditvā cakre dvādaśavārṣikam|","so'pyapo'ñjalinā''dāya guruṃ śaptuṃ samudyataḥ|| 23"],"meaning":"जब उन्हें यह बात मालूम हुई कि यह काम तो राक्षसका है—राजाका नहीं, तब उन्होंने उस शापको केवल बारह वर्षके लिये कर दिया। उस समय राजा सौदास भी अपनी अंजलिमें जल लेकर गुरु वसिष्ठको शाप देनेके लिये उद्यत हुए॥ २३॥"},{"id":"9.9.24","number":24,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/24/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वारितो मदयन्त्यापो रुशतीः पादयोर्जहौ।","दिशः खमवनीं सर्वं पश्यंजीवमयं नृपः॥ २४"],"iast":["vārito madayantyāpo ruśatīḥ pādayorjahau|","diśaḥ khamavanīṃ sarvaṃ paśyaṃjīvamayaṃ nṛpaḥ|| 24"],"meaning":"परन्तु उनकी पत्‍नी मदयन्तीने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। इसपर सौदासने विचार किया कि ‘दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी—सब-के-सब तो जीवमय ही हैं। तब यह तीक्ष्ण जल कहाँ छोड़ूँ?’ अन्तमें उन्होंने उस जलको अपने पैरोंपर डाल लिया। [इसीसे उनका नाम ‘मित्रसह’ हुआ]॥ २४॥"},{"id":"9.9.25","number":25,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/25/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राक्षसं भावमापन्‍नः पादे कल्माषतां गतः।","व्यवायकाले ददृशे वनौकोदम्पती द्विजौ॥ २५"],"iast":["rākṣasaṃ bhāvamāpannaḥ pāde kalmāṣatāṃ gataḥ|","vyavāyakāle dadṛśe vanaukodampatī dvijau|| 25"],"meaning":"उस जलसे उनके पैर काले पड़ गये थे, इसलिये उनका नाम ‘कल्माषपाद’ भी हुआ। अब वे राक्षस हो चुके थे। एक दिन राक्षस बने हुए राजा कल्माषपादने एक वनवासी ब्राह्मण-दम्पतिको सहवासके समय देख लिया॥ २५॥"},{"id":"9.9.26","number":26,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/26/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्षुधार्तो जगृहे विप्रं तत्पत्‍न्याहाकृतार्थवत्।","न भवान् राक्षसः साक्षादिक्ष्वाकूणां महारथः॥ २६"],"iast":["kṣudhārto jagṛhe vipraṃ tatpatnyāhākṛtārthavat|","na bhavān rākṣasaḥ sākṣādikṣvākūṇāṃ mahārathaḥ|| 26"],"meaning":"कल्माषपादको भूख तो लगी ही थी, उसने ब्राह्मणको पकड़ लिया। ब्राह्मण-पत्‍नीकी कामना अभी पूर्ण नहीं हुई थी। उसने कहा—‘राजन्! आप राक्षस नहीं हैं। आप महारानी मदयन्तीके पति और इक्ष्वाकुवंशके वीर महारथी हैं। आपको ऐसा अधर्म नहीं करना चाहिये। मुझे सन्तानकी कामना है और इस ब्राह्मणकी भी कामनाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई हैं इसलिये आप मुझे मेरा यह ब्राह्मण पति दे दीजिये॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"9.9.27","number":27,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/27/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मदयन्त्याः पतिर्वीर नाधर्मं कर्तुमर्हसि।","देहि मेऽपत्यकामाया अकृतार्थं पतिं द्विजम्॥ २७"],"iast":["madayantyāḥ patirvīra nādharmaṃ kartumarhasi|","dehi me'patyakāmāyā akṛtārthaṃ patiṃ dvijam|| 27"],"meaning":"कल्माषपादको भूख तो लगी ही थी, उसने ब्राह्मणको पकड़ लिया। ब्राह्मण-पत्‍नीकी कामना अभी पूर्ण नहीं हुई थी। उसने कहा—‘राजन्! आप राक्षस नहीं हैं। आप महारानी मदयन्तीके पति और इक्ष्वाकुवंशके वीर महारथी हैं। आपको ऐसा अधर्म नहीं करना चाहिये। मुझे सन्तानकी कामना है और इस ब्राह्मणकी भी कामनाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई हैं इसलिये आप मुझे मेरा यह ब्राह्मण पति दे दीजिये॥ २६-२७॥","meaning_covers":[26,27]},{"id":"9.9.28","number":28,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/28/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देहोऽयं मानुषो राजन् पुरुषस्याखिलार्थदः।","तस्मादस्य वधो वीर सर्वार्थवध उच्यते॥ २८"],"iast":["deho'yaṃ mānuṣo rājan puruṣasyākhilārthadaḥ|","tasmādasya vadho vīra sarvārthavadha ucyate|| 28"],"meaning":"राजन्! यह मनुष्य-शरीर जीवको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाला है। इसलिये वीर! इस शरीरको नष्ट कर देना सभी पुरुषार्थोंकी हत्या कही जाती है॥ २८॥"},{"id":"9.9.29","number":29,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/29/","page":48,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एष हि ब्राह्मणो विद्वांस्तपःशीलगुणान्वितः।","आरिराधयिषुर्ब्रह्म महापुरुषसंज्ञितम्।","सर्वभूतात्मभावेन भूतेष्वन्तर्हितं गुणैः॥ २९"],"iast":["eṣa hi brāhmaṇo vidvāṃstapaḥśīlaguṇānvitaḥ|","ārirādhayiṣurbrahma mahāpuruṣasaṃjñitam|","sarvabhūtātmabhāvena bhūteṣvantarhitaṃ guṇaiḥ|| 29"],"meaning":"फिर यह ब्राह्मण तो विद्वान् है। तपस्या, शील और बड़े-बड़े गुणोंसे सम्पन्‍न है। यह उन पुरुषोत्तम परब्रह्मकी समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें आराधना करना चाहता है, जो समस्त पदार्थोंमें विद्यमान रहते हुए भी उनके पृथक्-पृथक् गुणोंसे छिपे हुए हैं॥ २९॥"},{"id":"9.9.30","number":30,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/30/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽयं ब्रह्मर्षिवर्यस्ते राजर्षिप्रवराद् विभो।","कथमर्हति धर्मज्ञ वधं पितुरिवात्मजः॥ ३०"],"iast":["so'yaṃ brahmarṣivaryaste rājarṣipravarād vibho|","kathamarhati dharmajña vadhaṃ piturivātmajaḥ|| 30"],"meaning":"राजन्! आप शक्तिशाली हैं। आप धर्मका मर्म भलीभाँति जानते हैं। जैसे पिताके हाथों पुत्रकी मृत्यु उचित नहीं, वैसे ही आप-जैसे श्रेष्ठ राजर्षिके हाथों मेरे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि पतिका वध किसी प्रकार उचित नहीं है॥ ३०॥"},{"id":"9.9.31","number":31,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/31/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य साधोरपापस्य भ्रूणस्य ब्रह्मवादिनः।","कथं वधं यथा बभ्रोर्मन्यते सन्मतो भवान्॥ ३१"],"iast":["tasya sādhorapāpasya bhrūṇasya brahmavādinaḥ|","kathaṃ vadhaṃ yathā babhrormanyate sanmato bhavān|| 31"],"meaning":"आपका साधु-समाजमें बड़ा सम्मान है। भला आप मेरे परोपकारी, निरपराध, श्रोत्रिय एवं ब्रह्मवादी पतिका वध कैसे ठीक समझ रहे हैं? ये तो गौके समान निरीह हैं॥ ३१॥"},{"id":"9.9.32","number":32,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/32/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यद्ययं क्रियते भक्षस्तर्हि मां खाद पूर्वतः।","न जीविष्ये विना येन क्षणं च मृतकं यथा॥ ३२"],"iast":["yadyayaṃ kriyate bhakṣastarhi māṃ khāda pūrvataḥ|","na jīviṣye vinā yena kṣaṇaṃ ca mṛtakaṃ yathā|| 32"],"meaning":"फिर भी यदि आप इन्हें खा ही डालना चाहते हैं, तो पहले मुझे खा डालिये। क्योंकि अपने पतिके बिना मैं मुर्देके समान हो जाऊँगी और एक क्षण भी जीवित न रह सकूँगी’॥ ३२॥"},{"id":"9.9.33","number":33,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/33/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं करुणभाषिण्या विलपन्त्या अनाथवत्।","व्याघ्रः पशुमिवाखादत् सौदासः शापमोहितः॥ ३३"],"iast":["evaṃ karuṇabhāṣiṇyā vilapantyā anāthavat|","vyāghraḥ paśumivākhādat saudāsaḥ śāpamohitaḥ|| 33"],"meaning":"ब्राह्मणपत्‍नी बड़ी ही करुणापूर्ण वाणीमें इस प्रकार कहकर अनाथकी भाँति रोने लगी। परन्तु सौदासने शापसे मोहित होनेके कारण उसकी प्रार्थनापर कुछ भी ध्यान न दिया और वह उस ब्राह्मणको वैसे ही खा गया, जैसे बाघ किसी पशुको खा जाय॥ ३३॥"},{"id":"9.9.34","number":34,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/34/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ब्राह्मणी वीक्ष्य दिधिषुं पुरुषादेन भक्षितम्।","शोचन्त्यात्मानमुर्वीशमशपत् कुपिता सती॥ ३४"],"iast":["brāhmaṇī vīkṣya didhiṣuṃ puruṣādena bhakṣitam|","śocantyātmānamurvīśamaśapat kupitā satī|| 34"],"meaning":"जब ब्राह्मणीने देखा कि राक्षसने मेरे गर्भाधानके लिये उद्यत पतिको खा लिया, तब उसे बड़ा शोक हुआ। सती ब्राह्मणीने क्रोध करके राजाको शाप दे दिया॥ ३४॥"},{"id":"9.9.35","number":35,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/35/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्मान्मे भक्षितः पाप कामार्तायाः पतिस्त्वया।","तवापि मृत्युराधानादकृतप्रज्ञ दर्शितः॥ ३५"],"iast":["yasmānme bhakṣitaḥ pāpa kāmārtāyāḥ patistvayā|","tavāpi mṛtyurādhānādakṛtaprajña darśitaḥ|| 35"],"meaning":"‘रे पापी! मैं अभी कामसे पीड़ित हो रही थी। ऐसी अवस्थामें तूने मेरे पतिको खा डाला है। इसलिये मूर्ख! जब तू स्त्रीसे सहवास करना चाहेगा, तभी तेरी मृत्यु हो जायगी, यह बात मैं तुझे सुझाये देती हूँ’॥ ३५॥"},{"id":"9.9.36","number":36,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/36/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं मित्रसहं शप्त्वा पतिलोकपरायणा।","तदस्थीनि समिद्धेऽ‌ग्‍नौ प्रास्य भर्तुर्गतिं गता॥ ३६"],"iast":["evaṃ mitrasahaṃ śaptvā patilokaparāyaṇā|","tadasthīni samiddhe'gnau prāsya bharturgatiṃ gatā|| 36"],"meaning":"इस प्रकार मित्रसहको शाप देकर ब्राह्मणी अपने पतिकी अस्थियोंको धधकती हुई चितामें डालकर स्वयं भी सती हो गयी और उसने वही गति प्राप्त की, जो उसके पतिदेवको मिली थी। क्यों न हो, वह अपने पतिको छोड़कर और किसी लोकमें जाना भी तो नहीं चाहती थी॥ ३६॥"},{"id":"9.9.37","number":37,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/37/","page":49,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विशापो द्वादशाब्दान्ते मैथुनाय समुद्यतः।","विज्ञाय ब्राह्मणीशापं महिष्या स निवारितः॥ ३७"],"iast":["viśāpo dvādaśābdānte maithunāya samudyataḥ|","vijñāya brāhmaṇīśāpaṃ mahiṣyā sa nivāritaḥ|| 37"],"meaning":"बारह वर्ष बीतनेपर राजा सौदास शापसे मुक्त हो गये। जब वे सहवासके लिये अपनी पत्‍नीके पास गये, तब उसने इन्हें रोक दिया। क्योंकि उसे उस ब्राह्मणीके शापका पता था॥ ३७॥"},{"id":"9.9.38","number":38,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/38/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत ऊर्ध्वं स तत्याज स्त्रीसुखं कर्मणाप्रजाः।","वसिष्ठस्तदनुज्ञातो मदयन्त्यां प्रजामधात्॥ ३८"],"iast":["tata ūrdhvaṃ sa tatyāja strīsukhaṃ karmaṇāprajāḥ|","vasiṣṭhastadanujñāto madayantyāṃ prajāmadhāt|| 38"],"meaning":"इसके बाद उन्होंने स्त्री-सुखका बिलकुल परित्याग ही कर दिया। इस प्रकार अपने कर्मके फलस्वरूप वे सन्तानहीन हो गये। तब वसिष्ठजीने उनके कहनेसे मदयन्तीको गर्भाधान कराया॥ ३८॥"},{"id":"9.9.39","number":39,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/39/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा वै सप्त समा गर्भमबिभ्रन्‍न व्यजायत।","जघ्नेऽश्मनोदरं तस्याः सोऽश्मकस्तेन कथ्यते॥ ३९"],"iast":["sā vai sapta samā garbhamabibhranna vyajāyata|","jaghne'śmanodaraṃ tasyāḥ so'śmakastena kathyate|| 39"],"meaning":"मदयन्ती सात वर्षतक गर्भ धारण किये रही, परन्तु बच्चा पैदा नहीं हुआ। तब वसिष्ठजीने पत्थरसे उसके पेटपर आघात किया। इससे जो बालक हुआ, वह अश्म (पत्थर) की चोटसे पैदा होनेके कारण ‘अश्मक’ कहलाया॥ ३९॥"},{"id":"9.9.40","number":40,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/40/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अश्मकान्मूलको जज्ञे यः स्त्रीभिः परिरक्षितः।","नारीकवच इत्युक्तो निःक्षत्रे मूलकोऽभवत्॥ ४०"],"iast":["aśmakānmūlako jajñe yaḥ strībhiḥ parirakṣitaḥ|","nārīkavaca ityukto niḥkṣatre mūlako'bhavat|| 40"],"meaning":"अश्मकसे मूलकका जन्म हुआ। जब परशुरामजी पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर रहे थे, तब स्त्रियोंने उसे छिपाकर रख लिया था। इसीसे उसका एक नाम ‘नारीकवच’ भी हुआ। उसे मूलक इसलिये कहते हैं कि वह पृथ्वीके क्षत्रियहीन हो जानेपर उस वंशका मूल (प्रवर्तक) बना॥ ४०॥"},{"id":"9.9.41","number":41,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/41/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो दशरथस्तस्मात् पुत्र ऐडविडस्ततः।","राजा विश्‍वसहो यस्य खट्वांगश्‍चक्रवर्त्यभूत्॥ ४१"],"iast":["tato daśarathastasmāt putra aiḍaviḍastataḥ|","rājā viśvasaho yasya khaṭvāṃgaścakravartyabhūt|| 41"],"meaning":"मूलकके पुत्र हुए दशरथ, दशरथके ऐडविड और ऐडविडके राजा विश्‍वसह। विश्‍वसहके पुत्र ही चक्रवर्ती सम्राट् खट्वांग हुए॥ ४१॥"},{"id":"9.9.42","number":42,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/42/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यो देवैरर्थितो दैत्यानवधीद् युधि दुर्जयः।","मुहूर्तमायुर्ज्ञात्वैत्य स्वपुरं संदधे मनः॥ ४२"],"iast":["yo devairarthito daityānavadhīd yudhi durjayaḥ|","muhūrtamāyurjñātvaitya svapuraṃ saṃdadhe manaḥ|| 42"],"meaning":"युद्धमें उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे दैत्योंका वध किया था। जब उन्हें देवताओंसे यह मालूम हुआ कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी बाकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये और अपने मनको उन्होंने भगवान्‌में लगा दिया॥ ४२॥"},{"id":"9.9.43","number":43,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/43/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न मे ब्रह्मकुलात् प्राणाः कुलदैवान्‍न चात्मजाः।","न श्रियो न मही राज्यं न दाराश्‍चातिवल्लभाः॥ ४३"],"iast":["na me brahmakulāt prāṇāḥ kuladaivānna cātmajāḥ|","na śriyo na mahī rājyaṃ na dārāścātivallabhāḥ|| 43"],"meaning":"वे मन-ही-मन सोचने लगे कि ‘मेरे कुलके इष्ट देवता हैं ब्राह्मण! उनसे बढ़कर मेरा प्रेम अपने प्राणोंपर भी नहीं है। पत्‍नी, पुत्र, लक्ष्मी, राज्य और पृथ्वी भी मुझे उतने प्यारे नहीं लगते॥ ४३॥"},{"id":"9.9.44","number":44,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/44/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["न बाल्येऽपि मतिर्मह्यमधर्मे रमते क्‍वचित्।","नापश्यमुत्तमश्‍लोकादन्यत् किंचन वस्त्वहम्॥ ४४"],"iast":["na bālye'pi matirmahyamadharme ramate kvacit|","nāpaśyamuttamaślokādanyat kiṃcana vastvaham|| 44"],"meaning":"मेरा मन बचपनमें भी कभी अधर्मकी ओर नहीं गया। मैंने पवित्रकीर्ति भगवान्‌के अतिरिक्त और कोई भी वस्तु कहीं नहीं देखी॥ ४४॥"},{"id":"9.9.45","number":45,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/45/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["देवैः कामवरो दत्तो मह्यं त्रिभुवनेश्‍वरैः।","न वृणे तमहं कामं भूतभावनभावनः॥ ४५"],"iast":["devaiḥ kāmavaro datto mahyaṃ tribhuvaneśvaraiḥ|","na vṛṇe tamahaṃ kāmaṃ bhūtabhāvanabhāvanaḥ|| 45"],"meaning":"तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंने मुझे मुँहमाँगा वर देनेको कहा। परन्तु मैंने उन भोगोंकी लालसा बिलकुल नहीं की। क्योंकि समस्त प्राणियोंके जीवनदाता श्रीहरिकी भावनामें ही मैं म‌ग्‍न हो रहा था॥ ४५॥"},{"id":"9.9.46","number":46,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/46/","page":50,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ये विक्षिप्तेन्द्रियधियो देवास्ते स्वहृदि स्थितम्।","न विन्दन्ति प्रियं शश्‍वदात्मानं किमुतापरे॥ ४६"],"iast":["ye vikṣiptendriyadhiyo devāste svahṛdi sthitam|","na vindanti priyaṃ śaśvadātmānaṃ kimutāpare|| 46"],"meaning":"जिन देवताओंकी इन्द्रियाँ और मन विषयोंमें भटक रहे हैं, वे सत्त्वगुणप्रधान होनेपर भी अपने हृदयमें विराजमान, सदा-सर्वदा प्रियतमके रूपमें रहनेवाले अपने आत्मस्वरूप भगवान्‌को नहीं जानते। फिर भला जो रजोगुणी और तमोगुणी हैं, वे तो जान ही कैसे सकते हैं॥ ४६॥"},{"id":"9.9.47","number":47,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/47/","page":51,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथेशमायारचितेषु संगं","गुणेषु गन्धर्वपुरोपमेषु।","रूढं प्रकृत्याऽऽत्मनि विश्‍वकर्तु-","र्भावेन हित्वा तमहं प्रपद्ये॥ ४७"],"iast":["atheśamāyāraciteṣu saṃgaṃ","guṇeṣu gandharvapuropameṣu|","rūḍhaṃ prakṛtyā''tmani viśvakartu-","rbhāvena hitvā tamahaṃ prapadye|| 47"],"meaning":"इसलिये अब इन विषयोंमें मैं नहीं रमता। ये तो मायाके खेल हैं। आकाशमें झूठ-मूठ प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरोंसे बढ़कर इनकी सत्ता नहीं है। ये तो अज्ञानवश चित्तपर चढ़ गये थे। संसारके सच्चे रचयिता भगवान्‌की भावनामें लीन होकर मैं विषयोंको छोड़ रहा हूँ और केवल उन्हींकी शरण ले रहा हूँ॥ ४७॥"},{"id":"9.9.48","number":48,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/48/","page":51,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति व्यवसितो बुद्ध्या नारायणगृहीतया।","हित्वान्यभावमज्ञानं ततः स्वं भावमाश्रितः॥ ४८"],"iast":["iti vyavasito buddhyā nārāyaṇagṛhītayā|","hitvānyabhāvamajñānaṃ tataḥ svaṃ bhāvamāśritaḥ|| 48"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌ने राजा खट्वांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वे अन्त समयमें ऐसा निश्‍चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये॥ ४८॥"},{"id":"9.9.49","number":49,"url":"https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/9/9/49/","page":51,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यत् तद् ब्रह्म परं सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितम्।","भगवान् वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वताः॥ ४९"],"iast":["yat tad brahma paraṃ sūkṣmamaśūnyaṃ śūnyakalpitam|","bhagavān vāsudeveti yaṃ gṛṇanti hi sātvatāḥ|| 49"],"meaning":"वह स्वरूप साक्षात् परब्रह्म है। वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, शून्यके समान ही है। परन्तु वह शून्य नहीं, परम सत्य है। भक्तजन उसी वस्तुको ‘भगवान् वासुदेव’ इस नामसे वर्णन करते हैं॥ ४९॥"}],"text":[{"b":25357,"kind":"adhyaya_heading","page":45,"text":"अथ नवमोऽध्यायः"},{"b":25358,"kind":"topic_heading","page":45,"text":"भगीरथ-चरित्र और गंगावतरण"},{"b":25359,"kind":"topic_heading","page":44,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25360,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.1"],"text":"अंशुमांश्‍च तपस्तेपे गंगानयनकाम्यया।"},{"b":25361,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.1"],"text":"कालं महान्तं नाशक्‍नोत् ततः कालेन संस्थितः॥ १"},{"b":25362,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.2"],"text":"दिलीपस्तत्सुतस्तद्वदशक्तः कालमेयिवान्।"},{"b":25363,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.2"],"text":"भगीरथस्तस्य पुत्रस्तेपे स सुमहत् तपः॥ २"},{"b":25364,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.3"],"text":"दर्शयामास तं देवी प्रसन्‍ना वरदास्मि ते।"},{"b":25365,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.3"],"text":"इत्युक्तः स्वमभिप्रायं शशंसावनतो नृपः॥ ३"},{"b":25366,"kind":"hindi_commentary","page":45,"explains":["9.9.1","9.9.2","9.9.3"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अंशुमान्‍ने गंगाजीको लानेकी कामनासे बहुत वर्षोंतक घोर तपस्या की; परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली, समय आनेपर उनकी मृत्यु हो गयी॥ १॥ अंशुमान्के पुत्र दिलीपने भी वैसी ही तपस्या की; परन्तु वे भी असफल ही रहे, समयपर उनकी भी मृत्यु हो गयी। दिलीपके पुत्र थे भगीरथ। उन्होंने बहुत बड़ी तपस्या की॥ २॥ उनकी तपस्यासे प्रसन्‍न होकर भगवती गंगाने उन्हें दर्शन दिया और कहा कि—‘मैं तुम्हें वर देनेके लिये आयी हूँ।’ उनके ऐसा कहनेपर राजा भगीरथने बड़ी नम्रतासे अपना अभिप्राय प्रकट किया कि ‘आप मर्त्यलोकमें चलिये’॥ ३॥"},{"b":25368,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.4"],"text":"कोऽपि धारयिता वेगं पतन्त्या मे महीतले।"},{"b":25369,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.4"],"text":"अन्यथा भूतलं भित्त्वा नृप यास्ये रसातलम्॥ ४"},{"b":25370,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.5"],"text":"किं चाहं न भुवं यास्ये नरा मय्यामृजन्त्यघम्।"},{"b":25371,"kind":"sanskrit_shloka","page":45,"verses":["9.9.5"],"text":"मृजामि तदघं कुत्र राजंस्तत्र विचिन्त्यताम्॥ ५"},{"b":25372,"kind":"hindi_commentary","page":45,"explains":["9.9.4","9.9.5"],"text":"[गंगाजीने कहा—] ‘जिस समय मैं स्वर्गसे पृथ्वीतलपर गिरूँ उस समय मेरे वेगको कोई धारण करनेवाला होना चाहिये। भगीरथ! ऐसा न होनेपर मैं पृथ्वीको फोड़कर रसातलमें चली जाऊँगी॥ ४॥ इसके अतिरिक्त इस कारणसे भी मैं पृथ्वीपर नहीं जाऊँगी कि लोग मुझमें अपने पाप धोयेंगे। फिर मैं उस पापको कहाँ धोऊँगी। भगीरथ! इस विषयमें तुम स्वयं विचार कर लो’॥ ५॥"},{"b":25373,"kind":"topic_heading","page":46,"text":"भगीरथ उवाच"},{"b":25374,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.6"],"text":"साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।"},{"b":25375,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.6"],"text":"हरन्त्यघं तेऽङ्गसंगात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः॥ ६"},{"b":25376,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.7"],"text":"धारयिष्यति ते वेगं रुद्रस्त्वात्मा शरीरिणाम्।"},{"b":25377,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.7"],"text":"यस्मिन्‍नोतमिदं प्रोतं विश्‍वं शाटीव तन्तुषु॥ ७"},{"b":25378,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.8"],"text":"इत्युक्त्वा स नृपो देवं तपसातोषयच्छिवम्।"},{"b":25379,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.8"],"text":"कालेनाल्पीयसा राजंस्तस्येशः समतुष्यत॥ ८"},{"b":25380,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.9"],"text":"तथेति राज्ञाभिहितं सर्वलोकहितः शिवः।"},{"b":25381,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.9"],"text":"दधारावहितो गंगां पादपूतजलां हरेः॥ ९"},{"b":25382,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.10"],"text":"भगीरथः स राजर्षिर्निन्ये भुवनपावनीम्।"},{"b":25383,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.10"],"text":"यत्र स्वपितृणां देहा भस्मीभूताः स्म शेरते॥ १०"},{"b":25384,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.11"],"text":"रथेन वायुवेगेन प्रयान्तमनुधावती।"},{"b":25385,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.11"],"text":"देशान् पुनन्ती निर्दग्धानासिंचत् सगरात्मजान्॥ ११"},{"b":25386,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.12"],"text":"यज्जलस्पर्शमात्रेण ब्रह्मदण्डहता अपि।"},{"b":25387,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.12"],"text":"सगरात्मजा दिवं जग्मुः केवलं देहभस्मभिः॥ १२"},{"b":25388,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.13"],"text":"भस्मीभूतांगसंगेन स्वर्याताः सगरात्मजाः।"},{"b":25389,"kind":"sanskrit_shloka","page":46,"verses":["9.9.13"],"text":"किं पुनः श्रद्धया देवीं ये सेवन्ते धृतव्रताः॥ १३"},{"b":25390,"kind":"hindi_commentary","page":46,"explains":["9.9.6","9.9.7","9.9.8","9.9.9","9.9.10","9.9.11","9.9.12","9.9.13"],"text":"भगीरथने कहा—‘माता! जिन्होंने लोक-परलोक, धन-सम्पत्ति और स्त्री-पुत्रकी कामनाका संन्यास कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी सज्जन हैं—वे अपने अंगस्पर्शसे तुम्हारे पापोंको नष्ट कर देंगे। क्योंकि उनके हृदयमें अघरूप अघासुरको मारनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं॥ ६॥ समस्त प्राणियोंके आत्मा रुद्रदेव तुम्हारा वेग धारण कर लेंगे। क्योंकि जैसे साड़ी सूतोंमें ओत-प्रोत है, वैसे ही यह सारा विश्‍व भगवान् रुद्रमें ही ओत-प्रोत है’॥ ७॥ परीक्षित्! गंगाजीसे इस प्रकार कहकर राजा भगीरथने तपस्याके द्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्‍न किया। थोड़े ही दिनोंमें महादेवजी उनपर प्रसन्‍न हो गये॥ ८॥ भगवान् शंकर तो सम्पूर्ण विश्‍वके हितैषी हैं, राजाकी बात उन्होंने ‘तथास्तु’ कहकर स्वीकार कर ली। फिर शिवजीने सावधान होकर गंगाजीको अपने सिरपर धारण किया। क्यों न हो, भगवान्‌के चरणोंका सम्पर्क होनेके कारण गंगाजीका जल परम पवित्र जो है॥ ९॥ इसके बाद राजर्षि भगीरथ त्रिभुवनपावनी गंगाजीको वहाँ ले गये जहाँ उनके पितरोंके शरीर राखके ढेर बने पड़े थे॥ १०॥ वे वायुके समान वेगसे चलनेवाले रथपर सवार होकर आगे-आगे चल रहे थे और उनके पीछे-पीछे मार्गमें पड़नेवाले देशोंको पवित्र करती हुई गंगाजी दौड़ रही थीं। इस प्रकार गंगासागर-संगमपर पहुँचकर उन्होंने सगरके जले हुए पुत्रोंको अपने जलमें डुबा दिया॥ ११॥ यद्यपि सगरके पुत्र ब्राह्मणके तिरस्कारके कारण भस्म हो गये थे, इसलिये उनके उद्धारका कोई उपाय न था—फिर भी केवल शरीरकी राखके साथ गंगाजलका स्पर्श हो जानेसे ही वे स्वर्गमें चले गये॥ १२॥ परीक्षित्! जब गंगाजलसे शरीरकी राखका स्पर्श हो जानेसे सगरके पुत्रोंको स्वर्गकी प्राप्ति हो गयी तब जो लोग श्रद्धाके साथ नियम लेकर श्रीगंगाजीका सेवन करते हैं, उनके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ १३॥"},{"b":25391,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.14"],"text":"न ह्येतत् परमाश्‍चर्यं स्वर्धुन्या यदिहोदितम्।"},{"b":25392,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.14"],"text":"अनन्तचरणाम्भोजप्रसूताया भवच्छिदः॥ १४"},{"b":25393,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.15"],"text":"संनिवेश्य मनो यस्मिञ्छ्रद्धया मुनयोऽमलाः।"},{"b":25394,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.15"],"text":"त्रैगुण्यं दुस्त्यजं हित्वा सद्यो यातास्तदात्मताम्॥ १५"},{"b":25395,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"explains":["9.9.14","9.9.15"],"text":"मैंने गंगाजीकी महिमाके सम्बन्धमें जो कुछ कहा है, उसमें आश्‍चर्यकी कोई बात नहीं है। क्योंकि गंगाजी भगवान्‌के उन चरणकमलोंसे निकली हैं, जिनका श्रद्धाके साथ चिन्तन करके बड़े-बड़े मुनि निर्मल हो जाते हैं और तीनों गुणोंके कठिन बन्धनको काटकर तुरन्त भगवत्स्वरूप बन जाते हैं। फिर गंगाजी संसारका बन्धन काट दें, इसमें कौन बड़ी बात है॥ १४-१५॥"},{"b":25396,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.16"],"text":"श्रुतो भगीरथाज्जज्ञे तस्य नाभोऽपरोऽभवत्।"},{"b":25397,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.16"],"text":"सिन्धुद्वीपस्ततस्तस्मादयुतायुस्ततोऽभवत्॥ १६"},{"b":25398,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.17"],"text":"ऋतुपर्णो नलसखो योऽश्‍वविद्यामयान्‍नलात्।"},{"b":25399,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.17"],"text":"दत्त्वाक्षहृदयं चास्मै सर्वकामस्तु तत्सुतः॥ १७"},{"b":25400,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.18"],"text":"ततः सुदासस्तत्पुत्रो मदयन्तीपतिर्नृप।"},{"b":25401,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.18"],"text":"आहुर्मित्रसहं यं वै कल्माषाङ्‌घ्रिमुत क्‍वचित्।"},{"b":25402,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.18"],"text":"वसिष्ठशापाद् रक्षोऽभूदनपत्यः स्वकर्मणा॥ १८"},{"b":25403,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"explains":["9.9.16","9.9.17","9.9.18"],"text":"भगीरथका पुत्र था श्रुत, श्रुतका नाभ। यह नाभ पूर्वोक्त नाभसे भिन्‍न है। नाभका पुत्र था सिन्धुद्वीप और सिन्धुद्वीपका अयुतायु। अयुतायुके पुत्रका नाम था ऋतुपर्ण। वह नलका मित्र था। उसने नलको पासा फेंकनेकी विद्याका रहस्य बतलाया था और बदलेमें उससे अश्‍व-विद्या सीखी थी। ऋतुपर्णका पुत्र सर्वकाम हुआ॥ १६-१७॥ परीक्षित्! सर्वकामके पुत्रका नाम था सुदास। सुदासके पुत्रका नाम था सौदास और सौदासकी पत्‍नीका नाम था मदयन्ती। सौदासको ही कोई-कोई मित्रसह कहते हैं और कहीं-कहीं उसे कल्माषपाद भी कहा गया है। वह वसिष्ठके शापसे राक्षस हो गया था और फिर अपने कर्मोंके कारण सन्तानहीन हुआ॥ १८॥"},{"b":25404,"kind":"topic_heading","page":47,"text":"राजोवाच"},{"b":25405,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.19"],"text":"किं निमित्तो गुरोः शापः सौदासस्य महात्मनः।"},{"b":25406,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.19"],"text":"एतद् वेदितुमिच्छामः कथ्यतां न रहो यदि॥ १९"},{"b":25407,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"explains":["9.9.19"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! हम यह जानना चाहते हैं कि महात्मा सौदासको गुरु वसिष्ठजीने शाप क्यों दिया। यदि कोई गोपनीय बात न हो तो कृपया बतलाइये॥ १९॥"},{"b":25408,"kind":"topic_heading","page":47,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25409,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.20"],"text":"सौदासो मृगयां कञ्चिच्चरन् रक्षो जघान ह।"},{"b":25410,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.20"],"text":"मुमोच भ्रातरं सोऽथ गतः प्रतिचिकीर्षया॥ २०"},{"b":25411,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.21"],"text":"स चिन्तयन्‍नघं राज्ञः सूदरूपधरो गृहे।"},{"b":25412,"kind":"sanskrit_shloka","page":47,"verses":["9.9.21"],"text":"गुरवे भोक्तुकामाय पक्त्वा निन्ये नरामिषम्॥ २१"},{"b":25413,"kind":"hindi_commentary","page":47,"explains":["9.9.20","9.9.21"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! एक बार राजा सौदास शिकार खेलने गये हुए थे। वहाँ उन्होंने किसी राक्षसको मार डाला और उसके भाईको छोड़ दिया। उसने राजाके इस कामको अन्याय समझा और उनसे भाईकी मृत्युका बदला लेनेके लिये वह रसोइयेका रूप धारण करके उनके घर गया। जब एक दिन भोजन करनेके लिये गुरु वसिष्ठजी राजाके यहाँ आये, तब उसने मनुष्यका मांस राँधकर उन्हें परस दिया॥ २०-२१॥"},{"b":25414,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.22"],"text":"परिवेक्ष्यमाणं भगवान् विलोक्याभक्ष्यमंजसा।"},{"b":25415,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.22"],"text":"राजानमशपत् क्रुद्धो रक्षो ह्येवं भविष्यसि॥ २२"},{"b":25416,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.23"],"text":"रक्षःकृतं तद् विदित्वा चक्रे द्वादशवार्षिकम्।"},{"b":25417,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.23"],"text":"सोऽप्यपोऽञ्जलिनाऽऽदाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः॥ २३"},{"b":25418,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.24"],"text":"वारितो मदयन्त्यापो रुशतीः पादयोर्जहौ।"},{"b":25419,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.24"],"text":"दिशः खमवनीं सर्वं पश्यंजीवमयं नृपः॥ २४"},{"b":25420,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.25"],"text":"राक्षसं भावमापन्‍नः पादे कल्माषतां गतः।"},{"b":25421,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.25"],"text":"व्यवायकाले ददृशे वनौकोदम्पती द्विजौ॥ २५"},{"b":25422,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.26"],"text":"क्षुधार्तो जगृहे विप्रं तत्पत्‍न्याहाकृतार्थवत्।"},{"b":25423,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.26"],"text":"न भवान् राक्षसः साक्षादिक्ष्वाकूणां महारथः॥ २६"},{"b":25424,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.27"],"text":"मदयन्त्याः पतिर्वीर नाधर्मं कर्तुमर्हसि।"},{"b":25425,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.27"],"text":"देहि मेऽपत्यकामाया अकृतार्थं पतिं द्विजम्॥ २७"},{"b":25426,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.28"],"text":"देहोऽयं मानुषो राजन् पुरुषस्याखिलार्थदः।"},{"b":25427,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.28"],"text":"तस्मादस्य वधो वीर सर्वार्थवध उच्यते॥ २८"},{"b":25428,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.29"],"text":"एष हि ब्राह्मणो विद्वांस्तपःशीलगुणान्वितः।"},{"b":25429,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.29"],"text":"आरिराधयिषुर्ब्रह्म महापुरुषसंज्ञितम्।"},{"b":25430,"kind":"sanskrit_shloka","page":48,"verses":["9.9.29"],"text":"सर्वभूतात्मभावेन भूतेष्वन्तर्हितं गुणैः॥ २९"},{"b":25431,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.30"],"text":"सोऽयं ब्रह्मर्षिवर्यस्ते राजर्षिप्रवराद् विभो।"},{"b":25432,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.30"],"text":"कथमर्हति धर्मज्ञ वधं पितुरिवात्मजः॥ ३०"},{"b":25433,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.31"],"text":"तस्य साधोरपापस्य भ्रूणस्य ब्रह्मवादिनः।"},{"b":25434,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.31"],"text":"कथं वधं यथा बभ्रोर्मन्यते सन्मतो भवान्॥ ३१"},{"b":25435,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.32"],"text":"यद्ययं क्रियते भक्षस्तर्हि मां खाद पूर्वतः।"},{"b":25436,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.32"],"text":"न जीविष्ये विना येन क्षणं च मृतकं यथा॥ ३२"},{"b":25437,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.33"],"text":"एवं करुणभाषिण्या विलपन्त्या अनाथवत्।"},{"b":25438,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.33"],"text":"व्याघ्रः पशुमिवाखादत् सौदासः शापमोहितः॥ ३३"},{"b":25439,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.34"],"text":"ब्राह्मणी वीक्ष्य दिधिषुं पुरुषादेन भक्षितम्।"},{"b":25440,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.34"],"text":"शोचन्त्यात्मानमुर्वीशमशपत् कुपिता सती॥ ३४"},{"b":25441,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.35"],"text":"यस्मान्मे भक्षितः पाप कामार्तायाः पतिस्त्वया।"},{"b":25442,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.35"],"text":"तवापि मृत्युराधानादकृतप्रज्ञ दर्शितः॥ ३५"},{"b":25443,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.36"],"text":"एवं मित्रसहं शप्त्वा पतिलोकपरायणा।"},{"b":25444,"kind":"hindi_commentary","page":49,"verses":["9.9.36"],"text":"तदस्थीनि समिद्धेऽ‌ग्‍नौ प्रास्य भर्तुर्गतिं गता॥ ३६"},{"b":25445,"kind":"hindi_translation","page":47,"explains":["9.9.22","9.9.23","9.9.24","9.9.25","9.9.26","9.9.27","9.9.28","9.9.29","9.9.30","9.9.31","9.9.32","9.9.33","9.9.34","9.9.35","9.9.36"],"text":"जब सर्वसमर्थ वसिष्ठजीने देखा कि परोसी जानेवाली वस्तु तो नितान्त अभक्ष्य है, तब उन्होंने क्रोधित होकर राजाको शाप दिया कि ‘जा, इस कामसे तू राक्षस हो जायगा’॥ २२॥ जब उन्हें यह बात मालूम हुई कि यह काम तो राक्षसका है—राजाका नहीं, तब उन्होंने उस शापको केवल बारह वर्षके लिये कर दिया। उस समय राजा सौदास भी अपनी अंजलिमें जल लेकर गुरु वसिष्ठको शाप देनेके लिये उद्यत हुए॥ २३॥ परन्तु उनकी पत्‍नी मदयन्तीने उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया। इसपर सौदासने विचार किया कि ‘दिशाएँ, आकाश और पृथ्वी—सब-के-सब तो जीवमय ही हैं। तब यह तीक्ष्ण जल कहाँ छोड़ूँ?’ अन्तमें उन्होंने उस जलको अपने पैरोंपर डाल लिया। [इसीसे उनका नाम ‘मित्रसह’ हुआ]॥ २४॥ उस जलसे उनके पैर काले पड़ गये थे, इसलिये उनका नाम ‘कल्माषपाद’ भी हुआ। अब वे राक्षस हो चुके थे। एक दिन राक्षस बने हुए राजा कल्माषपादने एक वनवासी ब्राह्मण-दम्पतिको सहवासके समय देख लिया॥ २५॥ कल्माषपादको भूख तो लगी ही थी, उसने ब्राह्मणको पकड़ लिया। ब्राह्मण-पत्‍नीकी कामना अभी पूर्ण नहीं हुई थी। उसने कहा—‘राजन्! आप राक्षस नहीं हैं। आप महारानी मदयन्तीके पति और इक्ष्वाकुवंशके वीर महारथी हैं। आपको ऐसा अधर्म नहीं करना चाहिये। मुझे सन्तानकी कामना है और इस ब्राह्मणकी भी कामनाएँ अभी पूर्ण नहीं हुई हैं इसलिये आप मुझे मेरा यह ब्राह्मण पति दे दीजिये॥ २६-२७॥ राजन्! यह मनुष्य-शरीर जीवको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी प्राप्ति करानेवाला है। इसलिये वीर! इस शरीरको नष्ट कर देना सभी पुरुषार्थोंकी हत्या कही जाती है॥ २८॥ फिर यह ब्राह्मण तो विद्वान् है। तपस्या, शील और बड़े-बड़े गुणोंसे सम्पन्‍न है। यह उन पुरुषोत्तम परब्रह्मकी समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें आराधना करना चाहता है, जो समस्त पदार्थोंमें विद्यमान रहते हुए भी उनके पृथक्-पृथक् गुणोंसे छिपे हुए हैं॥ २९॥ राजन्! आप शक्तिशाली हैं। आप धर्मका मर्म भलीभाँति जानते हैं। जैसे पिताके हाथों पुत्रकी मृत्यु उचित नहीं, वैसे ही आप-जैसे श्रेष्ठ राजर्षिके हाथों मेरे श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि पतिका वध किसी प्रकार उचित नहीं है॥ ३०॥ आपका साधु-समाजमें बड़ा सम्मान है। भला आप मेरे परोपकारी, निरपराध, श्रोत्रिय एवं ब्रह्मवादी पतिका वध कैसे ठीक समझ रहे हैं? ये तो गौके समान निरीह हैं॥ ३१॥ फिर भी यदि आप इन्हें खा ही डालना चाहते हैं, तो पहले मुझे खा डालिये। क्योंकि अपने पतिके बिना मैं मुर्देके समान हो जाऊँगी और एक क्षण भी जीवित न रह सकूँगी’॥ ३२॥ ब्राह्मणपत्‍नी बड़ी ही करुणापूर्ण वाणीमें इस प्रकार कहकर अनाथकी भाँति रोने लगी। परन्तु सौदासने शापसे मोहित होनेके कारण उसकी प्रार्थनापर कुछ भी ध्यान न दिया और वह उस ब्राह्मणको वैसे ही खा गया, जैसे बाघ किसी पशुको खा जाय॥ ३३॥ जब ब्राह्मणीने देखा कि राक्षसने मेरे गर्भाधानके लिये उद्यत पतिको खा लिया, तब उसे बड़ा शोक हुआ। सती ब्राह्मणीने क्रोध करके राजाको शाप दे दिया॥ ३४॥ ‘रे पापी! मैं अभी कामसे पीड़ित हो रही थी। ऐसी अवस्थामें तूने मेरे पतिको खा डाला है। इसलिये मूर्ख! जब तू स्त्रीसे सहवास करना चाहेगा, तभी तेरी मृत्यु हो जायगी, यह बात मैं तुझे सुझाये देती हूँ’॥ ३५॥ इस प्रकार मित्रसहको शाप देकर ब्राह्मणी अपने पतिकी अस्थियोंको धधकती हुई चितामें डालकर स्वयं भी सती हो गयी और उसने वही गति प्राप्त की, जो उसके पतिदेवको मिली थी। क्यों न हो, वह अपने पतिको छोड़कर और किसी लोकमें जाना भी तो नहीं चाहती थी॥ ३६॥"},{"b":25446,"kind":"sanskrit_shloka","page":49,"verses":["9.9.37"],"text":"विशापो द्वादशाब्दान्ते मैथुनाय समुद्यतः।"},{"b":25447,"kind":"hindi_commentary","page":49,"verses":["9.9.37"],"text":"विज्ञाय ब्राह्मणीशापं महिष्या स निवारितः॥ ३७"},{"b":25448,"kind":"hindi_commentary","page":50,"verses":["9.9.38"],"text":"तत ऊर्ध्वं स तत्याज स्त्रीसुखं कर्मणाप्रजाः।"},{"b":25449,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.38"],"text":"वसिष्ठस्तदनुज्ञातो मदयन्त्यां प्रजामधात्॥ ३८"},{"b":25450,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.39"],"text":"सा वै सप्त समा गर्भमबिभ्रन्‍न व्यजायत।"},{"b":25451,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.39"],"text":"जघ्नेऽश्मनोदरं तस्याः सोऽश्मकस्तेन कथ्यते॥ ३९"},{"b":25452,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.40"],"text":"अश्मकान्मूलको जज्ञे यः स्त्रीभिः परिरक्षितः।"},{"b":25453,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.40"],"text":"नारीकवच इत्युक्तो निःक्षत्रे मूलकोऽभवत्॥ ४०"},{"b":25454,"kind":"hindi_commentary","page":50,"verses":["9.9.41"],"text":"ततो दशरथस्तस्मात् पुत्र ऐडविडस्ततः।"},{"b":25455,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.41"],"text":"राजा विश्‍वसहो यस्य खट्वांगश्‍चक्रवर्त्यभूत्॥ ४१"},{"b":25456,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.42"],"text":"यो देवैरर्थितो दैत्यानवधीद् युधि दुर्जयः।"},{"b":25457,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.42"],"text":"मुहूर्तमायुर्ज्ञात्वैत्य स्वपुरं संदधे मनः॥ ४२"},{"b":25458,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.43"],"text":"न मे ब्रह्मकुलात् प्राणाः कुलदैवान्‍न चात्मजाः।"},{"b":25459,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.43"],"text":"न श्रियो न मही राज्यं न दाराश्‍चातिवल्लभाः॥ ४३"},{"b":25460,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.44"],"text":"न बाल्येऽपि मतिर्मह्यमधर्मे रमते क्‍वचित्।"},{"b":25461,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.44"],"text":"नापश्यमुत्तमश्‍लोकादन्यत् किंचन वस्त्वहम्॥ ४४"},{"b":25462,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.45"],"text":"देवैः कामवरो दत्तो मह्यं त्रिभुवनेश्‍वरैः।"},{"b":25463,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.45"],"text":"न वृणे तमहं कामं भूतभावनभावनः॥ ४५"},{"b":25464,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.46"],"text":"ये विक्षिप्तेन्द्रियधियो देवास्ते स्वहृदि स्थितम्।"},{"b":25465,"kind":"sanskrit_shloka","page":50,"verses":["9.9.46"],"text":"न विन्दन्ति प्रियं शश्‍वदात्मानं किमुतापरे॥ ४६"},{"b":25466,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.47"],"text":"अथेशमायारचितेषु संगं"},{"b":25467,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.47"],"text":"गुणेषु गन्धर्वपुरोपमेषु।"},{"b":25468,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.47"],"text":"रूढं प्रकृत्याऽऽत्मनि विश्‍वकर्तु-"},{"b":25469,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.47"],"text":"र्भावेन हित्वा तमहं प्रपद्ये॥ ४७"},{"b":25470,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.48"],"text":"इति व्यवसितो बुद्ध्या नारायणगृहीतया।"},{"b":25471,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.48"],"text":"हित्वान्यभावमज्ञानं ततः स्वं भावमाश्रितः॥ ४८"},{"b":25472,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.49"],"text":"यत् तद् ब्रह्म परं सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितम्।"},{"b":25473,"kind":"sanskrit_shloka","page":51,"verses":["9.9.49"],"text":"भगवान् वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वताः॥ ४९"},{"b":25474,"kind":"hindi_translation","page":49,"explains":["9.9.37","9.9.38","9.9.39","9.9.40","9.9.41","9.9.42","9.9.43","9.9.44","9.9.45","9.9.46","9.9.47","9.9.48","9.9.49"],"text":"बारह वर्ष बीतनेपर राजा सौदास शापसे मुक्त हो गये। जब वे सहवासके लिये अपनी पत्‍नीके पास गये, तब उसने इन्हें रोक दिया। क्योंकि उसे उस ब्राह्मणीके शापका पता था॥ ३७॥ इसके बाद उन्होंने स्त्री-सुखका बिलकुल परित्याग ही कर दिया। इस प्रकार अपने कर्मके फलस्वरूप वे सन्तानहीन हो गये। तब वसिष्ठजीने उनके कहनेसे मदयन्तीको गर्भाधान कराया॥ ३८॥ मदयन्ती सात वर्षतक गर्भ धारण किये रही, परन्तु बच्चा पैदा नहीं हुआ। तब वसिष्ठजीने पत्थरसे उसके पेटपर आघात किया। इससे जो बालक हुआ, वह अश्म (पत्थर) की चोटसे पैदा होनेके कारण ‘अश्मक’ कहलाया॥ ३९॥ अश्मकसे मूलकका जन्म हुआ। जब परशुरामजी पृथ्वीको क्षत्रियहीन कर रहे थे, तब स्त्रियोंने उसे छिपाकर रख लिया था। इसीसे उसका एक नाम ‘नारीकवच’ भी हुआ। उसे मूलक इसलिये कहते हैं कि वह पृथ्वीके क्षत्रियहीन हो जानेपर उस वंशका मूल (प्रवर्तक) बना॥ ४०॥ मूलकके पुत्र हुए दशरथ, दशरथके ऐडविड और ऐडविडके राजा विश्‍वसह। विश्‍वसहके पुत्र ही चक्रवर्ती सम्राट् खट्वांग हुए॥ ४१॥ युद्धमें उन्हें कोई जीत नहीं सकता था। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे दैत्योंका वध किया था। जब उन्हें देवताओंसे यह मालूम हुआ कि अब मेरी आयु केवल दो ही घड़ी बाकी है, तब वे अपनी राजधानी लौट आये और अपने मनको उन्होंने भगवान्‌में लगा दिया॥ ४२॥ वे मन-ही-मन सोचने लगे कि ‘मेरे कुलके इष्ट देवता हैं ब्राह्मण! उनसे बढ़कर मेरा प्रेम अपने प्राणोंपर भी नहीं है। पत्‍नी, पुत्र, लक्ष्मी, राज्य और पृथ्वी भी मुझे उतने प्यारे नहीं लगते॥ ४३॥ मेरा मन बचपनमें भी कभी अधर्मकी ओर नहीं गया। मैंने पवित्रकीर्ति भगवान्‌के अतिरिक्त और कोई भी वस्तु कहीं नहीं देखी॥ ४४॥ तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंने मुझे मुँहमाँगा वर देनेको कहा। परन्तु मैंने उन भोगोंकी लालसा बिलकुल नहीं की। क्योंकि समस्त प्राणियोंके जीवनदाता श्रीहरिकी भावनामें ही मैं म‌ग्‍न हो रहा था॥ ४५॥ जिन देवताओंकी इन्द्रियाँ और मन विषयोंमें भटक रहे हैं, वे सत्त्वगुणप्रधान होनेपर भी अपने हृदयमें विराजमान, सदा-सर्वदा प्रियतमके रूपमें रहनेवाले अपने आत्मस्वरूप भगवान्‌को नहीं जानते। फिर भला जो रजोगुणी और तमोगुणी हैं, वे तो जान ही कैसे सकते हैं॥ ४६॥ इसलिये अब इन विषयोंमें मैं नहीं रमता। ये तो मायाके खेल हैं। आकाशमें झूठ-मूठ प्रतीत होनेवाले गन्धर्वनगरोंसे बढ़कर इनकी सत्ता नहीं है। ये तो अज्ञानवश चित्तपर चढ़ गये थे। संसारके सच्चे रचयिता भगवान्‌की भावनामें लीन होकर मैं विषयोंको छोड़ रहा हूँ और केवल उन्हींकी शरण ले रहा हूँ॥ ४७॥ परीक्षित्! भगवान्‌ने राजा खट्वांगकी बुद्धिको पहलेसे ही अपनी ओर आकर्षित कर रखा था। इसीसे वे अन्त समयमें ऐसा निश्‍चय कर सके। अब उन्होंने शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमें जो अज्ञानमूलक आत्मभाव था, उसका परित्याग कर दिया और अपने वास्तविक आत्मस्वरूपमें स्थित हो गये॥ ४८॥ वह स्वरूप साक्षात् परब्रह्म है। वह सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, शून्यके समान ही है। परन्तु वह शून्य नहीं, परम सत्य है। भक्तजन उसी वस्तुको ‘भगवान् वासुदेव’ इस नामसे वर्णन करते हैं॥ ४९॥"},{"b":25475,"kind":"hindi_translation","page":51,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सूर्यवंशानुवर्णने नवमोऽध्यायः॥ ९॥"}],"notes":[{"id":"v2:69","mark":"१","page":46,"after_verse":"9.9.8","text":"शश्‍चानुतु०।"},{"id":"v2:70","mark":"२","page":46,"after_verse":"9.9.10","text":"रथोऽथ 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