{"id":"9.3","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 3","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ तृतीयोऽध्यायः","topics":["महर्षि च्यवन और सुकन्याका चरित्र, राजा शर्यातिका वंश"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[14,18]},"verses":[{"id":"9.3.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/1/","page":14,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शर्यातिर्मानवो राजा ब्रह्मिष्ठः स बभूव ह।","यो वा अंगिरसां सत्रे द्वितीयमह ऊचिवान्॥ १"],"iast":["śaryātirmānavo rājā brahmiṣṭhaḥ sa babhūva ha|","yo vā aṃgirasāṃ satre dvitīyamaha ūcivān|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मनुपुत्र राजा शर्याति वेदोंका निष्ठावान् विद्वान् था। उसने अंगिरागोत्रके ऋषियोंके यज्ञमें दूसरे दिनका कर्म बतलाया था॥ १॥"},{"id":"9.3.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/2/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुकन्या नाम तस्यासीत् कन्या कमललोचना।","तया सार्धं वनगतो ह्यगमच्च्यवनाश्रमम्॥ २"],"iast":["sukanyā nāma tasyāsīt kanyā kamalalocanā|","tayā sārdhaṃ vanagato hyagamaccyavanāśramam|| 2"],"meaning":"उसकी एक कमललोचना कन्या थी। उसका नाम था सुकन्या। एक दिन राजा शर्याति अपनी कन्याके साथ वनमें घूमते-घूमते च्यवन ऋषिके आश्रमपर जा पहुँचे॥ २॥"},{"id":"9.3.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/3/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा सखीभिः परिवृता विचिन्वत्यङ्‌घ्रिपान् वने।","वल्मीकरन्ध्रे ददृशे खद्योते इव ज्योतिषी॥ ३"],"iast":["sā sakhībhiḥ parivṛtā vicinvatyaṅghripān vane|","valmīkarandhre dadṛśe khadyote iva jyotiṣī|| 3"],"meaning":"सुकन्या अपनी सखियोंके साथ वनमें घूम-घूमकर वृक्षोंका सौन्दर्य देख रही थी। उसने एक स्थानपर देखा कि बाँबी (दीमकोंकी एकत्रित की हुई मिट्टी)-के छेदमेंसे जुगनूकी तरह दो ज्योतियाँ दीख रही हैं॥ ३॥"},{"id":"9.3.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/4/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते दैवचोदिता बाला ज्योतिषी कण्टकेन वै।","अविध्यन्मुग्धभावेन सुस्रावासृक् ततो बहु॥ ४"],"iast":["te daivacoditā bālā jyotiṣī kaṇṭakena vai|","avidhyanmugdhabhāvena susrāvāsṛk tato bahu|| 4"],"meaning":"दैवकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्याने बालसुलभ चपलतासे एक काँटेके द्वारा उन ज्योतियोंको बेध दिया। इससे उनमेंसे बहुत-सा खून बह चला॥ ४॥"},{"id":"9.3.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/5/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शकृन्मूत्रनिरोधोऽभूत् सैनिकानां च तत्क्षणात्।","राजर्षिस्तमुपालक्ष्य पुरुषान् विस्मितोऽब्रवीत्॥ ५"],"iast":["śakṛnmūtranirodho'bhūt sainikānāṃ ca tatkṣaṇāt|","rājarṣistamupālakṣya puruṣān vismito'bravīt|| 5"],"meaning":"उसी समय राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल-मूत्र रुक गया। राजर्षि शर्यातिको यह देखकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ, उन्होंने अपने सैनिकोंसे कहा॥ ५॥"},{"id":"9.3.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/6/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम्।","व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम्॥ ६"],"iast":["apyabhadraṃ na yuṣmābhirbhārgavasya viceṣṭitam|","vyaktaṃ kenāpi nastasya kṛtamāśramadūṣaṇam|| 6"],"meaning":"‘अरे, तुमलोगोंने कहीं महर्षि च्यवनजीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी-न-किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है’॥ ६॥"},{"id":"9.3.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/7/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुकन्या प्राह पितरं भीता किञ्चित् कृतं मया।","द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्‍ने कण्टकेन वै॥ ७"],"iast":["sukanyā prāha pitaraṃ bhītā kiñcit kṛtaṃ mayā|","dve jyotiṣī ajānantyā nirbhinne kaṇṭakena vai|| 7"],"meaning":"तब सुकन्याने अपने पितासे डरते-डरते कहा कि ‘पिताजी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजानमें दो ज्योतियोंको काँटेसे छेद दिया है’॥ ७॥"},{"id":"9.3.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/8/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुहितुस्तद् वचः श्रुत्वा शर्यातिर्जातसाध्वसः।","मुनिं प्रसादयामास वल्मीकान्तर्हितं शनैः॥ ८"],"iast":["duhitustad vacaḥ śrutvā śaryātirjātasādhvasaḥ|","muniṃ prasādayāmāsa valmīkāntarhitaṃ śanaiḥ|| 8"],"meaning":"अपनी कन्याकी यह बात सुनकर शर्याति घबरा गये। उन्होंने धीरे-धीरे स्तुति करके बाँबीमें छिपे हुए च्यवन मुनिको प्रसन्‍न किया॥ ८॥"},{"id":"9.3.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/9/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदभिप्रायमाज्ञाय प्रादाद् दुहितरं मुनेः।","कृच्छ्रान्मुक्तस्तमामन्त्र्य पुरं प्रायात् समाहितः॥ ९"],"iast":["tadabhiprāyamājñāya prādād duhitaraṃ muneḥ|","kṛcchrānmuktastamāmantrya puraṃ prāyāt samāhitaḥ|| 9"],"meaning":"तदनन्तर च्यवन मुनिका अभिप्राय जानकर उन्होंने अपनी कन्या उन्हें समर्पित कर दी और इस संकटसे छूटकर बड़ी सावधानीसे उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानीमें चले आये॥ ९॥"},{"id":"9.3.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/10/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम्।","प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभिः॥ १०"],"iast":["sukanyā cyavanaṃ prāpya patiṃ paramakopanam|","prīṇayāmāsa cittajñā apramattānuvṛttibhiḥ|| 10"],"meaning":"इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्‍न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी॥ १०॥"},{"id":"9.3.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/11/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ।","तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्‍वरौ॥ ११"],"iast":["kasyacit tvatha kālasya nāsatyāvāśramāgatau|","tau pūjayitvā provāca vayo me dattamīśvarau|| 11"],"meaning":"कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर दोनों अश्‍विनीकुमार आये। च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा-अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं। मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपानके अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञमें सोमरसका भाग दूँगा’॥ ११-१२॥","meaning_covers":[11,12]},{"id":"9.3.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/12/","page":15,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ग्रहं ग्रहीष्ये सोमस्य यज्ञे वामप्यसोमपोः।","क्रियतां मे वयो रूपं प्रमदानां यदीप्सितम्॥ १२"],"iast":["grahaṃ grahīṣye somasya yajñe vāmapyasomapoḥ|","kriyatāṃ me vayo rūpaṃ pramadānāṃ yadīpsitam|| 12"],"meaning":"कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर दोनों अश्‍विनीकुमार आये। च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा-अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं। मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपानके अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञमें सोमरसका भाग दूँगा’॥ ११-१२॥","meaning_covers":[11,12]},{"id":"9.3.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/13/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बाढमित्यूचतुर्विप्रमभिनन्द्य भिषक्तमौ।","निमज्जतां भवानस्मिन् ह्रदे सिद्धविनिर्मिते॥ १३"],"iast":["bāḍhamityūcaturvipramabhinandya bhiṣaktamau|","nimajjatāṃ bhavānasmin hrade siddhavinirmite|| 13"],"meaning":"वैद्यशिरोमणि अश्‍विनीकुमारोंने महर्षि च्यवनका अभिनन्दन करके कहा, ‘ठीक है।’ और इसके बाद उनसे कहा कि ‘यह सिद्धोंके द्वारा बनाया हुआ कुण्ड है, आप इसमें स्नान कीजिये’॥ १३॥"},{"id":"9.3.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/14/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्त्वा जरया ग्रस्तदेहो धमनिसन्ततः।","ह्रदं प्रवेशितोऽश्‍विभ्यां वलीपलितविप्रियः॥ १४"],"iast":["ityuktvā jarayā grastadeho dhamanisantataḥ|","hradaṃ praveśito'śvibhyāṃ valīpalitavipriyaḥ|| 14"],"meaning":"च्यवन मुनिके शरीरको बुढ़ापेने घेर रखा था। सब ओर नसें दीख रही थीं, झुर्रियाँ पड़ जाने एवं बाल पक जानेके कारण वे देखनेमें बहुत भद्दे लगते थे। अश्‍विनीकुमारोंने उन्हें अपने साथ लेकर कुण्डमें प्रवेश किया॥ १४॥"},{"id":"9.3.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/15/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरुषास्त्रय उत्तस्थुरपीच्या वनिताप्रियाः।","पद्मस्रजः कुण्डलिनस्तुल्यरूपाः सुवाससः॥ १५"],"iast":["puruṣāstraya uttasthurapīcyā vanitāpriyāḥ|","padmasrajaḥ kuṇḍalinastulyarūpāḥ suvāsasaḥ|| 15"],"meaning":"उसी समय कुण्डसे तीन पुरुष बाहर निकले। वे तीनों ही कमलोंकी माला, कुण्डल और सुन्दर वस्त्र पहने एक-से मालूम होते थे। वे बड़े ही सुन्दर एवं स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाले थे॥ १५॥"},{"id":"9.3.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/16/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तान् निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान् सूर्यवर्चसः।","अजानती पतिं साध्वी अश्‍विनौ शरणं ययौ॥ १६"],"iast":["tān nirīkṣya varārohā sarūpān sūryavarcasaḥ|","ajānatī patiṃ sādhvī aśvinau śaraṇaṃ yayau|| 16"],"meaning":"परम साध्वी सुन्दरी सुकन्याने जब देखा कि ये तीनों ही एक आकृतिके तथा सूर्यके समान तेजस्वी हैं, तब अपने पतिको न पहचानकर उसने अश्‍विनीकुमारोंकी शरण ली॥ १६॥"},{"id":"9.3.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/17/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दर्शयित्वा पतिं तस्यै पातिव्रत्येन तोषितौ।","ऋषिमामन्त्र्य ययतुर्विमानेन त्रिविष्टपम्॥ १७"],"iast":["darśayitvā patiṃ tasyai pātivratyena toṣitau|","ṛṣimāmantrya yayaturvimānena triviṣṭapam|| 17"],"meaning":"उसके पातिव्रत्यसे अश्‍विनीकुमार बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उसके पतिको बतला दिया और फिर च्यवन मुनिसे आज्ञा लेकर विमानके द्वारा वे स्वर्गको चले गये॥ १७॥"},{"id":"9.3.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/18/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यक्ष्यमाणोऽथ शर्यातिश्‍च्यवनस्याश्रमं गतः।","ददर्श दुहितुः पार्श्‍वे पुरुषं सूर्यवर्चसम्॥ १८"],"iast":["yakṣyamāṇo'tha śaryātiścyavanasyāśramaṃ gataḥ|","dadarśa duhituḥ pārśve puruṣaṃ sūryavarcasam|| 18"],"meaning":"कुछ समयके बाद यज्ञ करनेकी इच्छासे राजा शर्याति च्यवन मुनिके आश्रमपर आये। वहाँ उन्होंने देखा कि उनकी कन्या सुकन्याके पास एक सूर्यके समान तेजस्वी पुरुष बैठा हुआ है॥ १८॥"},{"id":"9.3.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/19/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राजा दुहितरं प्राह कृतपादाभिवन्दनाम्।","आशिषश्‍चाप्रयुंजानो नातिप्रीतमना इव॥ १९"],"iast":["rājā duhitaraṃ prāha kṛtapādābhivandanām|","āśiṣaścāprayuṃjāno nātiprītamanā iva|| 19"],"meaning":"सुकन्याने उनके चरणोंकी वन्दना की। शर्यातिने उसे आशीर्वाद नहीं दिया और कुछ अप्रसन्‍न-से होकर बोले॥ १९॥"},{"id":"9.3.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/20/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया","प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनिः।","यत् त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं","विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम्॥ २०"],"iast":["cikīrṣitaṃ te kimidaṃ patistvayā","pralambhito lokanamaskṛto muniḥ|","yat tvaṃ jarāgrastamasatyasammataṃ","vihāya jāraṃ bhajase'mumadhvagam|| 20"],"meaning":"‘दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है॥ २०॥"},{"id":"9.3.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/21/","page":16,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कथं मतिस्तेऽवगतान्यथा सतां","कुलप्रसूते कुलदूषणं त्विदम्।","बिभर्षि जारं यदपत्रपा कुलं","पितुश्‍च भर्तुश्‍च नयस्यधस्तमः॥ २१"],"iast":["kathaṃ matiste'vagatānyathā satāṃ","kulaprasūte kuladūṣaṇaṃ tvidam|","bibharṣi jāraṃ yadapatrapā kulaṃ","pituśca bhartuśca nayasyadhastamaḥ|| 21"],"meaning":"तेरा जन्म तो बड़े ऊँचे कुलमें हुआ था। यह उलटी बुद्धि तुझे कैसे प्राप्त हुई? तेरा यह व्यवहार तो कुलमें कलंक लगानेवाला है। अरे राम-राम! तू निर्लज्ज होकर जार पुरुषकी सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने पिता और पति दोनोंके वंशको घोर नरकमें ले जा रही है’॥ २१॥"},{"id":"9.3.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/22/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं ब्रुवाणं पितरं स्मयमाना शुचिस्मिता।","उवाच तात जामाता तवैष भृगुनन्दनः॥ २२"],"iast":["evaṃ bruvāṇaṃ pitaraṃ smayamānā śucismitā|","uvāca tāta jāmātā tavaiṣa bhṛgunandanaḥ|| 22"],"meaning":"राजा शर्यातिके इस प्रकार कहनेपर पवित्र मुसकानवाली सुकन्याने मुसकराकर कहा—‘पिताजी! ये आपके जामाता स्वयं भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ही हैं’॥ २२॥"},{"id":"9.3.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/23/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["शशंस पित्रे तत् सर्वं वयोरूपाभिलम्भनम्।","विस्मितः परमप्रीतस्तनयां परिषस्वजे॥ २३"],"iast":["śaśaṃsa pitre tat sarvaṃ vayorūpābhilambhanam|","vismitaḥ paramaprītastanayāṃ pariṣasvaje|| 23"],"meaning":"इसके बाद उसने अपने पितासे महर्षि च्यवनके यौवन और सौन्दर्यकी प्राप्तिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वह सब सुनकर राजा शर्याति अत्यन्त विस्मित हुए। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपनी पुत्रीको गलेसे लगा लिया॥ २३॥"},{"id":"9.3.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/24/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोमेन याजयन् वीरं ग्रहं सोमस्य चाग्रहीत्।","असोमपोरप्यश्‍विनोश्‍च्यवनः स्वेन तेजसा॥ २४"],"iast":["somena yājayan vīraṃ grahaṃ somasya cāgrahīt|","asomaporapyaśvinoścyavanaḥ svena tejasā|| 24"],"meaning":"महर्षि च्यवनने वीर शर्यातिसे सोमयज्ञका अनुष्ठान करवाया और सोमपानके अधिकारी न होनेपर भी अपने प्रभावसे अश्‍विनीकुमारोंको सोमपान कराया॥ २४॥"},{"id":"9.3.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/25/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हन्तुं तमाददे वज्रं सद्योमन्युरमर्षितः।","सवज्रं स्तम्भयामास भुजमिन्द्रस्य भार्गवः॥ २५"],"iast":["hantuṃ tamādade vajraṃ sadyomanyuramarṣitaḥ|","savajraṃ stambhayāmāsa bhujamindrasya bhārgavaḥ|| 25"],"meaning":"इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढ़कर शर्यातिको मारनेके लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया॥ २५॥"},{"id":"9.3.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/26/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्वजानंस्ततः सर्वे ग्रहं सोमस्य चाश्‍विनोः।","भिषजाविति यत् पूर्वं सोमाहुत्या बहिष्कृतौ॥ २६"],"iast":["anvajānaṃstataḥ sarve grahaṃ somasya cāśvinoḥ|","bhiṣajāviti yat pūrvaṃ somāhutyā bahiṣkṛtau|| 26"],"meaning":"तब सब देवताओंने अश्‍विनीकुमारोंको सोमका भाग देना स्वीकार कर लिया। उन लोगोंने वैद्य होनेके कारण पहले अश्‍विनीकुमारोंका सोमपानसे बहिष्कार कर रखा था॥ २६॥"},{"id":"9.3.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/27/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उत्तानबर्हिरानर्तो भूरिषेण इति त्रयः।","शर्यातेरभवन् पुत्रा आनर्ताद् रेवतोऽभवत्॥ २७"],"iast":["uttānabarhirānarto bhūriṣeṇa iti trayaḥ|","śaryāterabhavan putrā ānartād revato'bhavat|| 27"],"meaning":"परीक्षित्! शर्यातिके तीन पुत्र थे—उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। आनर्तसे रेवत हुए॥ २७॥"},{"id":"9.3.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/28/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सोऽन्तःसमुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम्।","आस्थितोऽभुङ्क्त विषयानानर्तादीनरिन्दम॥ २८"],"iast":["so'ntaḥsamudre nagarīṃ vinirmāya kuśasthalīm|","āsthito'bhuṅkta viṣayānānartādīnarindama|| 28"],"meaning":"महाराज! रेवतने समुद्रके भीतर कुशस्थली नामकी एक नगरी बसायी थी। उसीमें रहकर वे आनर्त आदि देशोंका राज्य करते थे॥ २८॥"},{"id":"9.3.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/29/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुद्मिज्येष्ठमुत्तमम्।","ककुद्मी रेवतीं कन्यां स्वामादाय विभुं गतः॥ २९"],"iast":["tasya putraśataṃ jajñe kakudmijyeṣṭhamuttamam|","kakudmī revatīṃ kanyāṃ svāmādāya vibhuṃ gataḥ|| 29"],"meaning":"उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे ककुद्मी। ककुद्मी अपनी कन्या रेवतीको लेकर उसके लिये वर पूछनेके उद्देश्यसे ब्रह्माजीके पास गये। उस समय ब्रह्मलोकका रास्ता ऐसे लोगोंके लिये बेरोक-टोक था। ब्रह्मलोकमें गाने-बजानेकी धूम मची हुई थी। बातचीतके लिये अवसर न मिलनेके कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये॥ २९-३०॥","meaning_covers":[29,30]},{"id":"9.3.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/30/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कन्यावरं परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकमपावृतम्।","आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितोऽलब्धक्षणः क्षणम्॥ ३०"],"iast":["kanyāvaraṃ paripraṣṭuṃ brahmalokamapāvṛtam|","āvartamāne gāndharve sthito'labdhakṣaṇaḥ kṣaṇam|| 30"],"meaning":"उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे ककुद्मी। ककुद्मी अपनी कन्या रेवतीको लेकर उसके लिये वर पूछनेके उद्देश्यसे ब्रह्माजीके पास गये। उस समय ब्रह्मलोकका रास्ता ऐसे लोगोंके लिये बेरोक-टोक था। ब्रह्मलोकमें गाने-बजानेकी धूम मची हुई थी। बातचीतके लिये अवसर न मिलनेके कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये॥ २९-३०॥","meaning_covers":[29,30]},{"id":"9.3.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/31/","page":17,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदन्त आद्यमानम्य स्वाभिप्रायं न्यवेदयत्।","तच्छ्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा प्रहस्य तमुवाच ह॥ ३१"],"iast":["tadanta ādyamānamya svābhiprāyaṃ nyavedayat|","tacchrutvā bhagavān brahmā prahasya tamuvāca ha|| 31"],"meaning":"उत्सवके अन्तमें ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने अपना अभिप्राय निवेदन किया। उनकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने हँसकर उनसे कहा—॥ ३१॥"},{"id":"9.3.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/32/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो राजन् निरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृताः।","तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणां गोत्राणि च न शृण्महे॥ ३२"],"iast":["aho rājan niruddhāste kālena hṛdi ye kṛtāḥ|","tatputrapautranaptṝṇāṃ gotrāṇi ca na śṛṇmahe|| 32"],"meaning":"‘महाराज! तुमने अपने मनमें जिन लोगोंके विषयमें सोच रखा था, वे सब तो कालके गालमें चले गये। अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियोंकी तो बात ही क्या है, गोत्रोंके नाम भी नहीं सुनायी पड़ते॥ ३२॥"},{"id":"9.3.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/33/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कालोऽभियातस्त्रिणवचतुर्युगविकल्पितः ।","तद् गच्छ देवदेवांशो बलदेवो महाबलः॥ ३३"],"iast":["kālo'bhiyātastriṇavacaturyugavikalpitaḥ |","tad gaccha devadevāṃśo baladevo mahābalaḥ|| 33"],"meaning":"इस बीचमें सत्ताईस चतुर्युगीका समय बीत चुका है। इसलिये तुम जाओ। इस समय भगवान् नारायणके अंशावतार महाबली बलदेवजी पृथ्वीपर विद्यमान हैं॥ ३३॥"},{"id":"9.3.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/34/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कन्यारत्‍नमिदं राजन् नररत्‍नाय देहि भोः।","भुवो भारावताराय भगवान् भूतभावनः॥ ३४"],"iast":["kanyāratnamidaṃ rājan nararatnāya dehi bhoḥ|","bhuvo bhārāvatārāya bhagavān bhūtabhāvanaḥ|| 34"],"meaning":"राजन्! उन्हीं नररत्‍नको यह कन्यारत्‍न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम, लीला आदिका श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है—वे ही प्राणियोंके जीवनसर्वस्व भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने अंशसे अवतीर्ण हुए हैं।’ राजा ककुद्मीने ब्रह्माजीका यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणोंकी वन्दना की और अपने नगरमें चले आये। उनके वंशजोंने यक्षोंके भयसे वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे॥ ३४-३५॥","meaning_covers":[34,35]},{"id":"9.3.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/35/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अवतीर्णो निजांशेन पुण्यश्रवणकीर्तनः।","इत्यादिष्टोऽभिवन्द्याजं नृपः स्वपुरमागतः।","त्यक्तं पुण्यजनत्रासाद् भ्रातृभिर्दिक्ष्ववस्थितैः॥ ३५"],"iast":["avatīrṇo nijāṃśena puṇyaśravaṇakīrtanaḥ|","ityādiṣṭo'bhivandyājaṃ nṛpaḥ svapuramāgataḥ|","tyaktaṃ puṇyajanatrāsād bhrātṛbhirdikṣvavasthitaiḥ|| 35"],"meaning":"राजन्! उन्हीं नररत्‍नको यह कन्यारत्‍न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम, लीला आदिका श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है—वे ही प्राणियोंके जीवनसर्वस्व भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने अंशसे अवतीर्ण हुए हैं।’ राजा ककुद्मीने ब्रह्माजीका यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणोंकी वन्दना की और अपने नगरमें चले आये। उनके वंशजोंने यक्षोंके भयसे वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे॥ ३४-३५॥","meaning_covers":[34,35]},{"id":"9.3.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/36/","page":18,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुतां दत्त्वानवद्यांगीं बलाय बलशालिने।","बदर्याख्यं गतो राजा तप्तुं नारायणाश्रमम्॥ ३६"],"iast":["sutāṃ dattvānavadyāṃgīṃ balāya balaśāline|","badaryākhyaṃ gato rājā taptuṃ nārāyaṇāśramam|| 36"],"meaning":"राजा ककुद्मीने अपनी सर्वांगसुन्दरी पुत्री परम बलशाली बलरामजीको सौंप दी और स्वयं तपस्या करनेके लिये भगवान् नर-नारायणके आश्रम बदरीवनकी ओर चल दिये॥ ३६॥"}],"text":[{"b":24651,"kind":"adhyaya_heading","page":14,"text":"अथ तृतीयोऽध्यायः"},{"b":24652,"kind":"topic_heading","page":14,"text":"महर्षि च्यवन और सुकन्याका चरित्र, राजा शर्यातिका वंश"},{"b":24653,"kind":"hindi_commentary","page":14,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":24654,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.3.1"],"text":"शर्यातिर्मानवो राजा ब्रह्मिष्ठः स बभूव ह।"},{"b":24655,"kind":"sanskrit_shloka","page":14,"verses":["9.3.1"],"text":"यो वा अंगिरसां सत्रे द्वितीयमह ऊचिवान्॥ १"},{"b":24656,"kind":"hindi_commentary","page":14,"explains":["9.3.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मनुपुत्र राजा शर्याति वेदोंका निष्ठावान् विद्वान् था। उसने अंगिरागोत्रके ऋषियोंके यज्ञमें दूसरे दिनका कर्म बतलाया था॥ १॥"},{"b":24657,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.2"],"text":"सुकन्या नाम तस्यासीत् कन्या कमललोचना।"},{"b":24658,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.2"],"text":"तया सार्धं वनगतो ह्यगमच्च्यवनाश्रमम्॥ २"},{"b":24659,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.3"],"text":"सा सखीभिः परिवृता विचिन्वत्यङ्‌घ्रिपान् वने।"},{"b":24660,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.3"],"text":"वल्मीकरन्ध्रे ददृशे खद्योते इव ज्योतिषी॥ ३"},{"b":24661,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.4"],"text":"ते दैवचोदिता बाला ज्योतिषी कण्टकेन वै।"},{"b":24662,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.4"],"text":"अविध्यन्मुग्धभावेन सुस्रावासृक् ततो बहु॥ ४"},{"b":24663,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.5"],"text":"शकृन्मूत्रनिरोधोऽभूत् सैनिकानां च तत्क्षणात्।"},{"b":24664,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.5"],"text":"राजर्षिस्तमुपालक्ष्य पुरुषान् विस्मितोऽब्रवीत्॥ ५"},{"b":24665,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.6"],"text":"अप्यभद्रं न युष्माभिर्भार्गवस्य विचेष्टितम्।"},{"b":24666,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.6"],"text":"व्यक्तं केनापि नस्तस्य कृतमाश्रमदूषणम्॥ ६"},{"b":24667,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.7"],"text":"सुकन्या प्राह पितरं भीता किञ्चित् कृतं मया।"},{"b":24668,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.7"],"text":"द्वे ज्योतिषी अजानन्त्या निर्भिन्‍ने कण्टकेन वै॥ ७"},{"b":24669,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.8"],"text":"दुहितुस्तद् वचः श्रुत्वा शर्यातिर्जातसाध्वसः।"},{"b":24670,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.8"],"text":"मुनिं प्रसादयामास वल्मीकान्तर्हितं शनैः॥ ८"},{"b":24671,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.9"],"text":"तदभिप्रायमाज्ञाय प्रादाद् दुहितरं मुनेः।"},{"b":24672,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.9"],"text":"कृच्छ्रान्मुक्तस्तमामन्त्र्य पुरं प्रायात् समाहितः॥ ९"},{"b":24673,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.10"],"text":"सुकन्या च्यवनं प्राप्य पतिं परमकोपनम्।"},{"b":24674,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.10"],"text":"प्रीणयामास चित्तज्ञा अप्रमत्तानुवृत्तिभिः॥ १०"},{"b":24675,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.11"],"text":"कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ।"},{"b":24676,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.11"],"text":"तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्‍वरौ॥ ११"},{"b":24677,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.12"],"text":"ग्रहं ग्रहीष्ये सोमस्य यज्ञे वामप्यसोमपोः।"},{"b":24678,"kind":"sanskrit_shloka","page":15,"verses":["9.3.12"],"text":"क्रियतां मे वयो रूपं प्रमदानां यदीप्सितम्॥ १२"},{"b":24679,"kind":"hindi_commentary","page":14,"explains":["9.3.2","9.3.3","9.3.4","9.3.5","9.3.6","9.3.7","9.3.8","9.3.9","9.3.10","9.3.11","9.3.12"],"text":"उसकी एक कमललोचना कन्या थी। उसका नाम था सुकन्या। एक दिन राजा शर्याति अपनी कन्याके साथ वनमें घूमते-घूमते च्यवन ऋषिके आश्रमपर जा पहुँचे॥ २॥ सुकन्या अपनी सखियोंके साथ वनमें घूम-घूमकर वृक्षोंका सौन्दर्य देख रही थी। उसने एक स्थानपर देखा कि बाँबी (दीमकोंकी एकत्रित की हुई मिट्टी)-के छेदमेंसे जुगनूकी तरह दो ज्योतियाँ दीख रही हैं॥ ३॥ दैवकी कुछ ऐसी ही प्रेरणा थी, सुकन्याने बालसुलभ चपलतासे एक काँटेके द्वारा उन ज्योतियोंको बेध दिया। इससे उनमेंसे बहुत-सा खून बह चला॥ ४॥ उसी समय राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल-मूत्र रुक गया। राजर्षि शर्यातिको यह देखकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ, उन्होंने अपने सैनिकोंसे कहा॥ ५॥ ‘अरे, तुमलोगोंने कहीं महर्षि च्यवनजीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार तो नहीं कर दिया? मुझे तो यह स्पष्ट जान पड़ता है कि हमलोगोंमेंसे किसी-न-किसीने उनके आश्रममें कोई अनर्थ किया है’॥ ६॥ तब सुकन्याने अपने पितासे डरते-डरते कहा कि ‘पिताजी! मैंने कुछ अपराध अवश्य किया है। मैंने अनजानमें दो ज्योतियोंको काँटेसे छेद दिया है’॥ ७॥ अपनी कन्याकी यह बात सुनकर शर्याति घबरा गये। उन्होंने धीरे-धीरे स्तुति करके बाँबीमें छिपे हुए च्यवन मुनिको प्रसन्‍न किया॥ ८॥ तदनन्तर च्यवन मुनिका अभिप्राय जानकर उन्होंने अपनी कन्या उन्हें समर्पित कर दी और इस संकटसे छूटकर बड़ी सावधानीसे उनकी अनुमति लेकर वे अपनी राजधानीमें चले आये॥ ९॥ इधर सुकन्या परम क्रोधी च्यवन मुनिको अपने पतिके रूपमें प्राप्त करके बड़ी सावधानीसे उनकी सेवा करती हुई उन्हें प्रसन्‍न करने लगी। वह उनकी मनोवृत्तिको जानकर उसके अनुसार ही बर्ताव करती थी॥ १०॥ कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर दोनों अश्‍विनीकुमार आये। च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा-अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं। मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपानके अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञमें सोमरसका भाग दूँगा’॥ ११-१२॥"},{"b":24680,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.13"],"text":"बाढमित्यूचतुर्विप्रमभिनन्द्य भिषक्तमौ।"},{"b":24681,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.13"],"text":"निमज्जतां भवानस्मिन् ह्रदे सिद्धविनिर्मिते॥ १३"},{"b":24682,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.14"],"text":"इत्युक्त्वा जरया ग्रस्तदेहो धमनिसन्ततः।"},{"b":24683,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.14"],"text":"ह्रदं प्रवेशितोऽश्‍विभ्यां वलीपलितविप्रियः॥ १४"},{"b":24684,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.15"],"text":"पुरुषास्त्रय उत्तस्थुरपीच्या वनिताप्रियाः।"},{"b":24685,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.15"],"text":"पद्मस्रजः कुण्डलिनस्तुल्यरूपाः सुवाससः॥ १५"},{"b":24686,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.16"],"text":"तान् निरीक्ष्य वरारोहा सरूपान् सूर्यवर्चसः।"},{"b":24687,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.16"],"text":"अजानती पतिं साध्वी अश्‍विनौ शरणं ययौ॥ १६"},{"b":24688,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.17"],"text":"दर्शयित्वा पतिं तस्यै पातिव्रत्येन तोषितौ।"},{"b":24689,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.17"],"text":"ऋषिमामन्त्र्य ययतुर्विमानेन त्रिविष्टपम्॥ १७"},{"b":24690,"kind":"hindi_translation","page":16,"explains":["9.3.13","9.3.14","9.3.15","9.3.16","9.3.17"],"text":"वैद्यशिरोमणि अश्‍विनीकुमारोंने महर्षि च्यवनका अभिनन्दन करके कहा, ‘ठीक है।’ और इसके बाद उनसे कहा कि ‘यह सिद्धोंके द्वारा बनाया हुआ कुण्ड है, आप इसमें स्नान कीजिये’॥ १३॥ च्यवन मुनिके शरीरको बुढ़ापेने घेर रखा था। सब ओर नसें दीख रही थीं, झुर्रियाँ पड़ जाने एवं बाल पक जानेके कारण वे देखनेमें बहुत भद्दे लगते थे। अश्‍विनीकुमारोंने उन्हें अपने साथ लेकर कुण्डमें प्रवेश किया॥ १४॥ उसी समय कुण्डसे तीन पुरुष बाहर निकले। वे तीनों ही कमलोंकी माला, कुण्डल और सुन्दर वस्त्र पहने एक-से मालूम होते थे। वे बड़े ही सुन्दर एवं स्त्रियोंको प्रिय लगनेवाले थे॥ १५॥ परम साध्वी सुन्दरी सुकन्याने जब देखा कि ये तीनों ही एक आकृतिके तथा सूर्यके समान तेजस्वी हैं, तब अपने पतिको न पहचानकर उसने अश्‍विनीकुमारोंकी शरण ली॥ १६॥ उसके पातिव्रत्यसे अश्‍विनीकुमार बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उसके पतिको बतला दिया और फिर च्यवन मुनिसे आज्ञा लेकर विमानके द्वारा वे स्वर्गको चले गये॥ १७॥"},{"b":24691,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.18"],"text":"यक्ष्यमाणोऽथ शर्यातिश्‍च्यवनस्याश्रमं गतः।"},{"b":24692,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.18"],"text":"ददर्श दुहितुः पार्श्‍वे पुरुषं सूर्यवर्चसम्॥ १८"},{"b":24693,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.19"],"text":"राजा दुहितरं प्राह कृतपादाभिवन्दनाम्।"},{"b":24694,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.19"],"text":"आशिषश्‍चाप्रयुंजानो नातिप्रीतमना इव॥ १९"},{"b":24695,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.20"],"text":"चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया"},{"b":24696,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.20"],"text":"प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनिः।"},{"b":24697,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.20"],"text":"यत् त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं"},{"b":24698,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.20"],"text":"विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम्॥ २०"},{"b":24699,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.21"],"text":"कथं मतिस्तेऽवगतान्यथा सतां"},{"b":24700,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.21"],"text":"कुलप्रसूते कुलदूषणं त्विदम्।"},{"b":24701,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.21"],"text":"बिभर्षि जारं यदपत्रपा कुलं"},{"b":24702,"kind":"sanskrit_shloka","page":16,"verses":["9.3.21"],"text":"पितुश्‍च भर्तुश्‍च नयस्यधस्तमः॥ २१"},{"b":24703,"kind":"hindi_translation","page":16,"explains":["9.3.18","9.3.19","9.3.20","9.3.21"],"text":"कुछ समयके बाद यज्ञ करनेकी इच्छासे राजा शर्याति च्यवन मुनिके आश्रमपर आये। वहाँ उन्होंने देखा कि उनकी कन्या सुकन्याके पास एक सूर्यके समान तेजस्वी पुरुष बैठा हुआ है॥ १८॥ सुकन्याने उनके चरणोंकी वन्दना की। शर्यातिने उसे आशीर्वाद नहीं दिया और कुछ अप्रसन्‍न-से होकर बोले॥ १९॥ ‘दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है॥ २०॥ तेरा जन्म तो बड़े ऊँचे कुलमें हुआ था। यह उलटी बुद्धि तुझे कैसे प्राप्त हुई? तेरा यह व्यवहार तो कुलमें कलंक लगानेवाला है। अरे राम-राम! तू निर्लज्ज होकर जार पुरुषकी सेवा कर रही है और इस प्रकार अपने पिता और पति दोनोंके वंशको घोर नरकमें ले जा रही है’॥ २१॥"},{"b":24704,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.22"],"text":"एवं ब्रुवाणं पितरं स्मयमाना शुचिस्मिता।"},{"b":24705,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.22"],"text":"उवाच तात जामाता तवैष भृगुनन्दनः॥ २२"},{"b":24706,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.23"],"text":"शशंस पित्रे तत् सर्वं वयोरूपाभिलम्भनम्।"},{"b":24707,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.23"],"text":"विस्मितः परमप्रीतस्तनयां परिषस्वजे॥ २३"},{"b":24708,"kind":"hindi_translation","page":17,"explains":["9.3.22","9.3.23"],"text":"राजा शर्यातिके इस प्रकार कहनेपर पवित्र मुसकानवाली सुकन्याने मुसकराकर कहा—‘पिताजी! ये आपके जामाता स्वयं भृगुनन्दन महर्षि च्यवन ही हैं’॥ २२॥ इसके बाद उसने अपने पितासे महर्षि च्यवनके यौवन और सौन्दर्यकी प्राप्तिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। वह सब सुनकर राजा शर्याति अत्यन्त विस्मित हुए। उन्होंने बड़े प्रेमसे अपनी पुत्रीको गलेसे लगा लिया॥ २३॥"},{"b":24709,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.24"],"text":"सोमेन याजयन् वीरं ग्रहं सोमस्य चाग्रहीत्।"},{"b":24710,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.24"],"text":"असोमपोरप्यश्‍विनोश्‍च्यवनः स्वेन तेजसा॥ २४"},{"b":24711,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.25"],"text":"हन्तुं तमाददे वज्रं सद्योमन्युरमर्षितः।"},{"b":24712,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.25"],"text":"सवज्रं स्तम्भयामास भुजमिन्द्रस्य भार्गवः॥ २५"},{"b":24713,"kind":"hindi_commentary","page":17,"explains":["9.3.24","9.3.25"],"text":"महर्षि च्यवनने वीर शर्यातिसे सोमयज्ञका अनुष्ठान करवाया और सोमपानके अधिकारी न होनेपर भी अपने प्रभावसे अश्‍विनीकुमारोंको सोमपान कराया॥ २४॥ इन्द्र बहुत जल्दी क्रोध कर बैठते हैं। इसलिये उनसे यह सहा न गया। उन्होंने चिढ़कर शर्यातिको मारनेके लिये वज्र उठाया। महर्षि च्यवनने वज्रके साथ उनके हाथको वहीं स्तम्भित कर दिया॥ २५॥"},{"b":24714,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.26"],"text":"अन्वजानंस्ततः सर्वे ग्रहं सोमस्य चाश्‍विनोः।"},{"b":24715,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.26"],"text":"भिषजाविति यत् पूर्वं सोमाहुत्या बहिष्कृतौ॥ २६"},{"b":24716,"kind":"hindi_commentary","page":17,"explains":["9.3.26"],"text":"तब सब देवताओंने अश्‍विनीकुमारोंको सोमका भाग देना स्वीकार कर लिया। उन लोगोंने वैद्य होनेके कारण पहले अश्‍विनीकुमारोंका सोमपानसे बहिष्कार कर रखा था॥ २६॥"},{"b":24717,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.27"],"text":"उत्तानबर्हिरानर्तो भूरिषेण इति त्रयः।"},{"b":24718,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.27"],"text":"शर्यातेरभवन् पुत्रा आनर्ताद् रेवतोऽभवत्॥ २७"},{"b":24719,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.28"],"text":"सोऽन्तःसमुद्रे नगरीं विनिर्माय कुशस्थलीम्।"},{"b":24720,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.28"],"text":"आस्थितोऽभुङ्क्त विषयानानर्तादीनरिन्दम॥ २८"},{"b":24721,"kind":"hindi_translation","page":17,"explains":["9.3.27","9.3.28"],"text":"परीक्षित्! शर्यातिके तीन पुत्र थे—उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। आनर्तसे रेवत हुए॥ २७॥ महाराज! रेवतने समुद्रके भीतर कुशस्थली नामकी एक नगरी बसायी थी। उसीमें रहकर वे आनर्त आदि देशोंका राज्य करते थे॥ २८॥"},{"b":24722,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.29"],"text":"तस्य पुत्रशतं जज्ञे ककुद्मिज्येष्ठमुत्तमम्।"},{"b":24723,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.29"],"text":"ककुद्मी रेवतीं कन्यां स्वामादाय विभुं गतः॥ २९"},{"b":24724,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.30"],"text":"कन्यावरं परिप्रष्टुं ब्रह्मलोकमपावृतम्।"},{"b":24725,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.30"],"text":"आवर्तमाने गान्धर्वे स्थितोऽलब्धक्षणः क्षणम्॥ ३०"},{"b":24726,"kind":"hindi_translation","page":17,"explains":["9.3.29","9.3.30"],"text":"उनके सौ श्रेष्ठ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े थे ककुद्मी। ककुद्मी अपनी कन्या रेवतीको लेकर उसके लिये वर पूछनेके उद्देश्यसे ब्रह्माजीके पास गये। उस समय ब्रह्मलोकका रास्ता ऐसे लोगोंके लिये बेरोक-टोक था। ब्रह्मलोकमें गाने-बजानेकी धूम मची हुई थी। बातचीतके लिये अवसर न मिलनेके कारण वे कुछ क्षण वहीं ठहर गये॥ २९-३०॥"},{"b":24727,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.31"],"text":"तदन्त आद्यमानम्य स्वाभिप्रायं न्यवेदयत्।"},{"b":24728,"kind":"sanskrit_shloka","page":17,"verses":["9.3.31"],"text":"तच्छ्रुत्वा भगवान् ब्रह्मा प्रहस्य तमुवाच ह॥ ३१"},{"b":24729,"kind":"hindi_commentary","page":17,"explains":["9.3.31"],"text":"उत्सवके अन्तमें ब्रह्माजीको नमस्कार करके उन्होंने अपना अभिप्राय निवेदन किया। उनकी बात सुनकर भगवान् ब्रह्माजीने हँसकर उनसे कहा—॥ ३१॥"},{"b":24730,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.32"],"text":"अहो राजन् निरुद्धास्ते कालेन हृदि ये कृताः।"},{"b":24731,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.32"],"text":"तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणां गोत्राणि च न शृण्महे॥ ३२"},{"b":24732,"kind":"hindi_translation","page":18,"explains":["9.3.32"],"text":"‘महाराज! तुमने अपने मनमें जिन लोगोंके विषयमें सोच रखा था, वे सब तो कालके गालमें चले गये। अब उनके पुत्र, पौत्र अथवा नातियोंकी तो बात ही क्या है, गोत्रोंके नाम भी नहीं सुनायी पड़ते॥ ३२॥"},{"b":24733,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.33"],"text":"कालोऽभियातस्त्रिणवचतुर्युगविकल्पितः ।"},{"b":24734,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.33"],"text":"तद् गच्छ देवदेवांशो बलदेवो महाबलः॥ ३३"},{"b":24735,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.34"],"text":"कन्यारत्‍नमिदं राजन् नररत्‍नाय देहि भोः।"},{"b":24736,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.34"],"text":"भुवो भारावताराय भगवान् भूतभावनः॥ ३४"},{"b":24737,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.35"],"text":"अवतीर्णो निजांशेन पुण्यश्रवणकीर्तनः।"},{"b":24738,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.35"],"text":"इत्यादिष्टोऽभिवन्द्याजं नृपः स्वपुरमागतः।"},{"b":24739,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.35"],"text":"त्यक्तं पुण्यजनत्रासाद् भ्रातृभिर्दिक्ष्ववस्थितैः॥ ३५"},{"b":24740,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.36"],"text":"सुतां दत्त्वानवद्यांगीं बलाय बलशालिने।"},{"b":24741,"kind":"sanskrit_shloka","page":18,"verses":["9.3.36"],"text":"बदर्याख्यं गतो राजा तप्तुं नारायणाश्रमम्॥ ३६"},{"b":24743,"kind":"hindi_translation","page":18,"explains":["9.3.33","9.3.34","9.3.35","9.3.36"],"text":"इस बीचमें सत्ताईस चतुर्युगीका समय बीत चुका है। इसलिये तुम जाओ। इस समय भगवान् नारायणके अंशावतार महाबली बलदेवजी पृथ्वीपर विद्यमान हैं॥ ३३॥ राजन्! उन्हीं नररत्‍नको यह कन्यारत्‍न तुम समर्पित कर दो। जिनके नाम, लीला आदिका श्रवण-कीर्तन बड़ा ही पवित्र है—वे ही प्राणियोंके जीवनसर्वस्व भगवान् पृथ्वीका भार उतारनेके लिये अपने अंशसे अवतीर्ण हुए हैं।’ राजा ककुद्मीने ब्रह्माजीका यह आदेश प्राप्त करके उनके चरणोंकी वन्दना की और अपने नगरमें चले आये। उनके वंशजोंने यक्षोंके भयसे वह नगरी छोड़ दी थी और जहाँ-तहाँ यों ही निवास कर रहे थे॥ ३४-३५॥ राजा ककुद्मीने अपनी सर्वांगसुन्दरी पुत्री परम बलशाली बलरामजीको सौंप दी और स्वयं तपस्या करनेके लिये भगवान् नर-नारायणके आश्रम बदरीवनकी ओर चल दिये॥ ३६॥"},{"b":24744,"kind":"hindi_translation","page":18,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥"}],"notes":[{"id":"v2:10","mark":"१","page":16,"after_verse":"9.3.15","text":"रापीच्या।"},{"id":"v2:11","mark":"२","page":16,"after_verse":"9.3.16","text":"पुरुषान् सू०।"},{"id":"v2:12","mark":"३","page":16,"after_verse":"9.3.19","text":"आशिषो न प्रयु०।"}],"corrections":{"count":7,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}