{"id":"9.15","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 15","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथ पञ्चदशोऽध्यायः","topics":["ऋचीक, जमदग्‍नि और परशुरामजीका चरित्र"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.15.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[75,80]},"verses":[{"id":"9.15.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/1/","page":75,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ऐलस्य चोर्वशीगर्भात् षडासन्‍नात्मजा नृप।","आयुः श्रुतायुः सत्यायू रयोऽथ विजयो जयः॥ १"],"iast":["ailasya corvaśīgarbhāt ṣaḍāsannātmajā nṛpa|","āyuḥ śrutāyuḥ satyāyū rayo'tha vijayo jayaḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! उर्वशीके गर्भसे पुरूरवाके छः पुत्र हुए—आयु, श्रुतायु, सत्यायु, रय, विजय और जय॥ १॥"},{"id":"9.15.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/2/","page":75,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["श्रुतायोर्वसुमान् पुत्रः सत्यायोश्‍च श्रुतंजयः।","रयस्य सुत एकश्‍च जयस्य तनयोऽमितः॥ २"],"iast":["śrutāyorvasumān putraḥ satyāyośca śrutaṃjayaḥ|","rayasya suta ekaśca jayasya tanayo'mitaḥ|| 2"],"meaning":"श्रुतायुका पुत्र था वसुमान्, सत्यायुका श्रुतंजय, रयका एक और जयका अमित॥ २॥"},{"id":"9.15.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/3/","page":75,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भीमस्तु विजयस्याथ कांचनो होत्रकस्ततः।","तस्य जह्नुः सुतो गंगां गण्डूषीकृत्य योऽपिबत्।","जह्नोस्तु पूरुस्तत्पुत्रो बलाकश्‍चात्मजोऽजकः॥ ३"],"iast":["bhīmastu vijayasyātha kāṃcano hotrakastataḥ|","tasya jahnuḥ suto gaṃgāṃ gaṇḍūṣīkṛtya yo'pibat|","jahnostu pūrustatputro balākaścātmajo'jakaḥ|| 3"],"meaning":"विजयका भीम, भीमका कांचन, कांचनका होत्र और होत्रका पुत्र था जह्नु। ये जह्नु वही थे, जो गंगाजीको अपनी अंजलिमें लेकर पी गये थे। जह्नुका पुत्र था पूरु, पूरुका बलाक और बलाकका अजक॥ ३॥"},{"id":"9.15.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/4/","page":75,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः कुशः कुशस्यापि कुशाम्बुस्तनयो वसुः।","कुशनाभश्‍च चत्वारो गाधिरासीत् कुशाम्बुजः॥ ४"],"iast":["tataḥ kuśaḥ kuśasyāpi kuśāmbustanayo vasuḥ|","kuśanābhaśca catvāro gādhirāsīt kuśāmbujaḥ|| 4"],"meaning":"अजकका कुश था। कुशके चार पुत्र थे—कुशाम्बु, तनय, वसु और कुशनाभ। इनमेंसे कुशाम्बुके पुत्र गाधि हुए॥ ४॥"},{"id":"9.15.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/5/","page":75,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्य सत्यवतीं कन्यामृचीकोऽयाचत द्विजः।","वरं विसदृशं मत्वा गाधिर्भार्गवमब्रवीत्॥ ५"],"iast":["tasya satyavatīṃ kanyāmṛcīko'yācata dvijaḥ|","varaṃ visadṛśaṃ matvā gādhirbhārgavamabravīt|| 5"],"meaning":"परीक्षित्! गाधिकी कन्याका नाम था सत्यवती। ऋचीक ऋषिने गाधिसे उनकी कन्या माँगी। गाधिने यह समझकर कि ये कन्याके योग्य वर नहीं है, ऋचीकसे कहा—॥ ५॥"},{"id":"9.15.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/6/","page":75,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एकतः श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम्।","सहस्रं दीयतां शुल्कं कन्यायाः कुशिका वयम्॥ ६"],"iast":["ekataḥ śyāmakarṇānāṃ hayānāṃ candravarcasām|","sahasraṃ dīyatāṃ śulkaṃ kanyāyāḥ kuśikā vayam|| 6"],"meaning":"‘मुनिवर! हमलोग कुशिकवंशके हैं। हमारी कन्या मिलनी कठिन है। इसलिये आप एक हजार ऐसे घोड़े लाकर मुझे शुल्करूपमें दीजिये, जिनका सारा शरीर तो श्‍वेत हो, परन्तु एक-एक कान श्याम वर्णका हो’॥ ६॥"},{"id":"9.15.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/7/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्युक्तस्तन्मतं ज्ञात्वा गतः स वरुणान्तिकम्।","आनीय दत्त्वा तानश्‍वानुपयेमे वराननाम्॥ ७"],"iast":["ityuktastanmataṃ jñātvā gataḥ sa varuṇāntikam|","ānīya dattvā tānaśvānupayeme varānanām|| 7"],"meaning":"जब गाधिने यह बात कही, तब ऋचीक मुनि उनका आशय समझ गये और वरुणके पास जाकर वैसे ही घोड़े ले आये तथा उन्हें देकर सुन्दरी सत्यवतीसे विवाह कर लिया॥ ७॥"},{"id":"9.15.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/8/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स ऋषिः प्रार्थितः पत्‍न्या श्‍वश्र्वा चापत्यकाम्यया।","श्रपयित्वोभयैर्मन्त्रैश्‍चरुं स्नातुं गतो मुनिः॥ ८"],"iast":["sa ṛṣiḥ prārthitaḥ patnyā śvaśrvā cāpatyakāmyayā|","śrapayitvobhayairmantraiścaruṃ snātuṃ gato muniḥ|| 8"],"meaning":"एक बार महर्षि ऋचीकसे उनकी पत्‍नी और सास दोनोंने ही पुत्रप्राप्तिके लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीकने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनोंके लिये अलग-अलग मन्त्रोंसे चरु पकाया और स्नान करनेके लिये चले गये॥ ८॥"},{"id":"9.15.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/9/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तावत् सत्यवती मात्रा स्वचरुं याचिता सती।","श्रेष्ठं मत्वा तयायच्छन्मात्रे मातुरदत् स्वयम्॥ ९"],"iast":["tāvat satyavatī mātrā svacaruṃ yācitā satī|","śreṣṭhaṃ matvā tayāyacchanmātre māturadat svayam|| 9"],"meaning":"सत्यवतीकी माँने यह समझकर कि ऋषिने अपनी पत्‍नीके लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा, उससे वह चरु माँग लिया। इसपर सत्यवतीने अपना चरु तो माँको दे दिया और माँका चरु वह स्वयं खा गयी॥ ९॥"},{"id":"9.15.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/10/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तद् विज्ञाय मुनिः प्राह पत्‍नीं कष्टमकारषीः।","घोरो दण्डधरः पुत्रो भ्राता ते ब्रह्मवित्तमः॥ १०"],"iast":["tad vijñāya muniḥ prāha patnīṃ kaṣṭamakāraṣīḥ|","ghoro daṇḍadharaḥ putro bhrātā te brahmavittamaḥ|| 10"],"meaning":"जब ऋचीक मुनिको इस बातका पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्‍नी सत्यवतीसे कहा कि ‘तुमने बड़ा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगोंको दण्ड देनेवाला घोर प्रकृतिका होगा और तुम्हारा भाई होगा एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता’॥ १०॥"},{"id":"9.15.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/11/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रसादितः सत्यवत्या मैवं भूदिति भार्गवः।","अथ तर्हि भवेत् पौत्रो जमदग्‍निस्ततोऽभवत्॥ ११"],"iast":["prasāditaḥ satyavatyā maivaṃ bhūditi bhārgavaḥ|","atha tarhi bhavet pautro jamadagnistato'bhavat|| 11"],"meaning":"सत्यवतीने ऋचीक मुनिको प्रसन्‍न किया और प्रार्थना की कि ‘स्वामी! ऐसा नहीं होना चाहिये।’ तब उन्होंने कहा—‘अच्छी बात है। पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा (घोर प्रकृतिका) होगा।’ समयपर सत्यवतीके गर्भसे जमदग्‍निका जन्म हुआ॥ ११॥"},{"id":"9.15.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/12/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सा चाभूत् सुमहापुण्या कौशिकी लोकपावनी।","रेणोः सुतां रेणुकां वै जमदग्‍निरुवाह याम्॥ १२"],"iast":["sā cābhūt sumahāpuṇyā kauśikī lokapāvanī|","reṇoḥ sutāṃ reṇukāṃ vai jamadagniruvāha yām|| 12"],"meaning":"सत्यवती समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी ‘कौशिकी’ नदी बन गयी। रेणु ऋषिकी कन्या थी रेणुका। जमदग्‍निने उसका पाणिग्रहण किया॥ १२॥"},{"id":"9.15.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/13/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्यां वै भार्गवऋषेः सुता वसुमदादयः।","यवीयांजज्ञ एतेषां राम इत्यभिविश्रुतः॥ १३"],"iast":["tasyāṃ vai bhārgavaṛṣeḥ sutā vasumadādayaḥ|","yavīyāṃjajña eteṣāṃ rāma ityabhiviśrutaḥ|| 13"],"meaning":"रेणुकाके गर्भसे जमदग्‍नि ऋषिके वसुमान् आदि कई पुत्र हुए। उनमें सबसे छोटे परशुरामजी थे। उनका यश सारे संसारमें प्रसिद्ध है॥ १३॥"},{"id":"9.15.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/14/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम्।","त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम्॥ १४"],"iast":["yamāhurvāsudevāṃśaṃ haihayānāṃ kulāntakam|","triḥsaptakṛtvo ya imāṃ cakre niḥkṣatriyāṃ mahīm|| 14"],"meaning":"कहते हैं कि हैहयवंशका अन्त करनेके लिये स्वयं भगवान्‌ने ही परशुरामके रूपमें अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया॥ १४॥"},{"id":"9.15.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/15/","page":76,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत्।","रजस्तमोवृतमहन् फल्गुन्यपि कृतेंऽहसि॥ १५"],"iast":["duṣṭaṃ kṣatraṃ bhuvo bhāramabrahmaṇyamanīnaśat|","rajastamovṛtamahan phalgunyapi kṛteṃ'hasi|| 15"],"meaning":"यद्यपि क्षत्रियोंने उनका थोड़ा-सा ही अपराध किया था—फिर भी वे लोग बड़े दुष्ट, ब्राह्मणोंके अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारण था कि वे पृथ्वीके भार हो गये थे और इसीके फलस्वरूप भगवान् परशुरामने उनका नाश करके पृथ्वीका भार उतार दिया॥ १५॥"},{"id":"9.15.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/16/","page":77,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["किं तदंहो भगवतो राजन्यैरजितात्मभिः।","कृतं येन कुलं नष्टं क्षत्रियाणामभीक्ष्णशः॥ १६"],"iast":["kiṃ tadaṃho bhagavato rājanyairajitātmabhiḥ|","kṛtaṃ yena kulaṃ naṣṭaṃ kṣatriyāṇāmabhīkṣṇaśaḥ|| 16"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! अवश्य ही उस समयके क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये थे; परन्तु उन्होंने परशुरामजीका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया, जिसके कारण उन्होंने बार-बार क्षत्रियोंके वंशका संहार किया?॥ १६॥"},{"id":"9.15.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/17/","page":77,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हैहयानामधिपतिरर्जुनः क्षत्रियर्षभः।","दत्तं नारायणस्यांशमाराध्य परिकर्मभिः॥ १७"],"iast":["haihayānāmadhipatirarjunaḥ kṣatriyarṣabhaḥ|","dattaṃ nārāyaṇasyāṃśamārādhya parikarmabhiḥ|| 17"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्! उन दिनों हैहयवंशका अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा करके भगवान् नारायणके अंशावतार दत्तात्रेयजीको प्रसन्‍न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके—यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियोंका अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपासे प्राप्त कर लिये थे॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"9.15.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/18/","page":77,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बाहून् दशशतं लेभे दुर्धर्षत्वमरातिषु।","अव्याहतेन्द्रियौजःश्रीतेजोवीर्ययशोबलम्॥ १८"],"iast":["bāhūn daśaśataṃ lebhe durdharṣatvamarātiṣu|","avyāhatendriyaujaḥśrītejovīryayaśobalam|| 18"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्! उन दिनों हैहयवंशका अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा करके भगवान् नारायणके अंशावतार दत्तात्रेयजीको प्रसन्‍न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके—यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियोंका अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपासे प्राप्त कर लिये थे॥ १७-१८॥","meaning_covers":[17,18]},{"id":"9.15.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/19/","page":77,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["योगेश्‍वरत्वमैश्‍वर्यं गुणा यत्राणिमादयः।","चचाराव्याहतगतिर्लोकेषु पवनो यथा॥ १९"],"iast":["yogeśvaratvamaiśvaryaṃ guṇā yatrāṇimādayaḥ|","cacārāvyāhatagatirlokeṣu pavano yathā|| 19"],"meaning":"वह योगेश्‍वर हो गया था। उसमें ऐसा ऐश्‍वर्य था कि वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, स्थूल-से-स्थूल रूप धारण कर लेता। सभी सिद्धियाँ उसे प्राप्त थीं। वह संसारमें वायुकी तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता॥ १९॥"},{"id":"9.15.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/20/","page":77,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्त्रीरत्‍नैरावृतः क्रीडन् रेवाम्भसि मदोत्कटः।","वैजयन्तीं स्रजं बिभ्रद् रुरोध सरितं भुजैः॥ २०"],"iast":["strīratnairāvṛtaḥ krīḍan revāmbhasi madotkaṭaḥ|","vaijayantīṃ srajaṃ bibhrad rurodha saritaṃ bhujaiḥ|| 20"],"meaning":"एक बार गलेमें वैजयन्ती माला पहने सहस्रबाहु अर्जुन बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल-विहार कर रहा था। उस समय मदोन्मत्त सहस्रबाहुने अपनी बाँहोंसे नदीका प्रवाह रोक दिया॥ २०॥"},{"id":"9.15.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/21/","page":77,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विप्लावितं स्वशिबिरं प्रतिस्रोतःसरिज्जलैः।","नामृष्यत् तस्य तद् वीर्यं वीरमानी दशाननः॥ २१"],"iast":["viplāvitaṃ svaśibiraṃ pratisrotaḥsarijjalaiḥ|","nāmṛṣyat tasya tad vīryaṃ vīramānī daśānanaḥ|| 21"],"meaning":"दशमुख रावणका शिविर भी वहीं कहीं पासमें ही था। नदीकी धारा उलटी बहने लगी, जिससे उसका शिविर डूबने लगा। रावण अपनेको बहुत बड़ा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्रार्जुनका यह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ॥ २१॥"},{"id":"9.15.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/22/","page":77,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गृहीतो लीलया स्त्रीणां समक्षं कृतकिल्बिषः।","माहिष्मत्यां संनिरुद्धो मुक्तो येन कपिर्यथा॥ २२"],"iast":["gṛhīto līlayā strīṇāṃ samakṣaṃ kṛtakilbiṣaḥ|","māhiṣmatyāṃ saṃniruddho mukto yena kapiryathā|| 22"],"meaning":"जब रावण सहस्रबाहु अर्जुनके पास जाकर बुरा-भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियोंके सामने ही खेल-खेलमें रावणको पकड़ लिया और अपनी राजधानी माहिष्मतीमें ले जाकर बंदरके समान कैद कर लिया। पीछे पुलस्त्यजीके कहनेसे सहस्रबाहुने रावणको छोड़ दिया॥ २२॥"},{"id":"9.15.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/23/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स एकदा तु मृगयां विचरन् विपिने वने।","यदृच्छयाऽऽश्रमपदं जमद‌ग्‍नेरुपाविशत्॥ २३"],"iast":["sa ekadā tu mṛgayāṃ vicaran vipine vane|","yadṛcchayā''śramapadaṃ jamadagnerupāviśat|| 23"],"meaning":"एक दिन सहस्रबाहु अर्जुन शिकार खेलनेके लिये बड़े घोर जंगलमें निकल गया था। दैववश वह जमदग्‍नि मुनिके आश्रमपर जा पहुँचा॥ २३॥"},{"id":"9.15.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/24/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मै स नरदेवाय मुनिरर्हणमाहरत्।","ससैन्यामात्यवाहाय हविष्मत्या तपोधनः॥ २४"],"iast":["tasmai sa naradevāya munirarhaṇamāharat|","sasainyāmātyavāhāya haviṣmatyā tapodhanaḥ|| 24"],"meaning":"परम तपस्वी जमदग्‍नि मुनिके आश्रममें कामधेनु रहती थी। उसके प्रतापसे उन्होंने सेना, मन्त्री और वाहनोंके साथ हैहयाधिपतिका खूब स्वागत-सत्कार किया॥ २४॥"},{"id":"9.15.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/25/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स वीरस्तत्र तद् दृष्ट्वा आत्मैश्‍वर्यातिशायनम्।","तन्‍नाद्रियताग्‍निहोत्र्यां साभिलाषः स हैहयः॥ २५"],"iast":["sa vīrastatra tad dṛṣṭvā ātmaiśvaryātiśāyanam|","tannādriyatāgnihotryāṃ sābhilāṣaḥ sa haihayaḥ|| 25"],"meaning":"वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्‍नि मुनिका ऐश्‍वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको ही ले लेना चाहा॥ २५॥"},{"id":"9.15.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/26/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["हविर्धानीमृषेर्दर्पान्‍नरान् हर्तुमचोदयत्।","ते च माहिष्मतीं निन्युः सवत्सां क्रन्दतीं बलात्॥ २६"],"iast":["havirdhānīmṛṣerdarpānnarān hartumacodayat|","te ca māhiṣmatīṃ ninyuḥ savatsāṃ krandatīṃ balāt|| 26"],"meaning":"उसने अभिमानवश जमदग्‍नि मुनिसे माँगा भी नहीं, अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि कामधेनुको छीन ले चलो। उसकी आज्ञासे उसके सेवक बछड़ेके साथ ‘बाँ-बाँ’ डकराती हुई कामधेनुको बलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये॥ २६॥"},{"id":"9.15.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/27/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ राजनि निर्याते राम आश्रम आगतः।","श्रुत्वा तत् तस्य दौरात्म्यं चुक्रोधाहिरिवाहतः॥ २७"],"iast":["atha rājani niryāte rāma āśrama āgataḥ|","śrutvā tat tasya daurātmyaṃ cukrodhāhirivāhataḥ|| 27"],"meaning":"जब वे सब चले गये, तब परशुरामजी आश्रमपर आये और उसकी दुष्टताका वृत्तान्त सुनकर चोट खाये हुए साँपकी तरह क्रोधसे तिलमिला उठे॥ २७॥"},{"id":"9.15.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/28/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["घोरमादाय परशुं सतूणं चर्म कार्मुकम्।","अन्वधावत दुर्धर्षो मृगेन्द्र इव यूथपम्॥ २८"],"iast":["ghoramādāya paraśuṃ satūṇaṃ carma kārmukam|","anvadhāvata durdharṣo mṛgendra iva yūthapam|| 28"],"meaning":"वे अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े वेगसे उसके पीछे दौड़े—जैसे कोई किसीसे न दबनेवाला सिंह हाथीपर टूट पड़े॥ २८॥"},{"id":"9.15.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/29/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमापतन्तं भृगुवर्यमोजसा","धनुर्धरं बाणपरश्‍वधायुधम्।","ऐणेयचर्माम्बरमर्कधामभि-","र्युतं जटाभिर्ददृशे पुरीं विशन्॥ २९"],"iast":["tamāpatantaṃ bhṛguvaryamojasā","dhanurdharaṃ bāṇaparaśvadhāyudham|","aiṇeyacarmāmbaramarkadhāmabhi-","ryutaṃ jaṭābhirdadṛśe purīṃ viśan|| 29"],"meaning":"सहस्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगरमें प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज बड़े वेगसे उसीकी ओर झपटे आ रहे हैं। उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी। वे हाथमें धनुष-बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीरपर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्यकी किरणोंके समान चमक रही थीं॥ २९॥"},{"id":"9.15.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/30/","page":78,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अचोदयद्धस्तिरथाश्‍वपत्तिभि-","र्गदासिबाणर्ष्टिशतघ्निशक्तिभिः ।","अक्षौहिणीः सप्तदशातिभीषणा-","स्ता राम एको भगवानसूदयत्॥ ३०"],"iast":["acodayaddhastirathāśvapattibhi-","rgadāsibāṇarṣṭiśataghniśaktibhiḥ |","akṣauhiṇīḥ saptadaśātibhīṣaṇā-","stā rāma eko bhagavānasūdayat|| 30"],"meaning":"उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग, बाण, ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधोंसे सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियोंसे युक्त अत्यन्त भयंकर सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी। भगवान् परशुरामने बात-की-बातमें अकेले ही उस सारी सेनाको नष्ट कर दिया॥ ३०॥"},{"id":"9.15.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/31/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यतो यतोऽसौ प्रहरत्परश्‍वधो","मनोऽनिलौजाः परचक्रसूदनः।","ततस्ततश्छिन्‍नभुजोरुकन्धरा","निपेतुरुर्व्यां हतसूतवाहनाः॥ ३१"],"iast":["yato yato'sau praharatparaśvadho","mano'nilaujāḥ paracakrasūdanaḥ|","tatastataśchinnabhujorukandharā","nipetururvyāṃ hatasūtavāhanāḥ|| 31"],"meaning":"भगवान् परशुरामजीकी गति मन और वायुके समान थी। बस, वे शत्रुकी सेना काटते ही जा रहे थे। जहाँ-जहाँ वे अपने फरसेका प्रहार करते, वहाँ-वहाँ सारथि और वाहनोंके साथ बड़े-बड़े वीरोंकी बाँहें, जाँघें और कंधे कट-कटकर पृथ्वीपर गिरते जाते थे॥ ३१॥"},{"id":"9.15.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/32/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["दृष्ट्वा स्वसैन्यं रुधिरौघकर्दमे","रणाजिरे रामकुठारसायकैः।","विवृक्णचर्मध्वजचापविग्रहं","निपातितं हैहय आपतद् रुषा॥ ३२"],"iast":["dṛṣṭvā svasainyaṃ rudhiraughakardame","raṇājire rāmakuṭhārasāyakaiḥ|","vivṛkṇacarmadhvajacāpavigrahaṃ","nipātitaṃ haihaya āpatad ruṣā|| 32"],"meaning":"हैहयाधिपति अर्जुनने देखा कि मेरी सेनाके सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल भगवान् परशुरामके फरसे और बाणोंसे कट-कटकर खूनसे लथपथ रणभूमिमें गिर गये हैं, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़नेके लिये आ धमका॥ ३२॥"},{"id":"9.15.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/33/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथार्जुनः पंचशतेषु बाहुभि-","र्धनुःषु बाणान् युगपत् स सन्दधे।","रामाय रामोऽस्त्रभृतां समग्रणी-","स्तान्येकधन्वेषुभिराच्छिनत् समम्॥ ३३"],"iast":["athārjunaḥ paṃcaśateṣu bāhubhi-","rdhanuḥṣu bāṇān yugapat sa sandadhe|","rāmāya rāmo'strabhṛtāṃ samagraṇī-","stānyekadhanveṣubhirācchinat samam|| 33"],"meaning":"उसने एक साथ ही अपनी हजार भुजाओंसे पाँच सौ धनुषोंपर बाण चढ़ाये और परशुरामजीपर छोड़े। परन्तु परशुरामजी तो समस्त शस्त्रधारियोंके शिरोमणि ठहरे। उन्होंने अपने एक धनुषपर छोड़े हुए बाणोंसे ही एक साथ सबको काट डाला॥ ३३॥"},{"id":"9.15.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/34/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुनः स्वहस्तैरचलान् मृधेऽङ्‌घ्रिपा-","नुत्क्षिप्य वेगादभिधावतो युधि।","भुजान् कुठारेण कठोरनेमिना","चिच्छेद रामः प्रसभं त्वहेरिव॥ ३४"],"iast":["punaḥ svahastairacalān mṛdhe'ṅghripā-","nutkṣipya vegādabhidhāvato yudhi|","bhujān kuṭhāreṇa kaṭhoraneminā","ciccheda rāmaḥ prasabhaṃ tvaheriva|| 34"],"meaning":"अब हैहयाधिपति अपने हाथोंसे पहाड़ और पेड़ उखाड़कर बड़े वेगसे युद्धभूमिमें परशुरामजीकी ओर झपटा। परन्तु परशुरामजीने अपनी तीखी धारवाले फरसेसे बड़ी फुर्तीके साथ उसकी साँपोंके समान भुजाओंको काट डाला॥ ३४॥"},{"id":"9.15.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/35/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कृत्तबाहोः शिरस्तस्य गिरेः शृंगमिवाहरत्।","हते पितरि तत्पुत्रा अयुतं दुद्रुवुर्भयात्॥ ३५"],"iast":["kṛttabāhoḥ śirastasya gireḥ śṛṃgamivāharat|","hate pitari tatputrā ayutaṃ dudruvurbhayāt|| 35"],"meaning":"जब उसकी बाँहें कट गयीं, तब उन्होंने पहाड़की चोटीकी तरह उसका ऊँचा सिर धड़से अलग कर दिया। पिताके मर जानेपर उसके दस हजार लड़के डरकर भग गये॥ ३५॥"},{"id":"9.15.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/36/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अग्‍निहोत्रीमुपावर्त्य सवत्सां परवीरहा।","समुपेत्याश्रमं पित्रे परिक्लिष्टां समर्पयत्॥ ३६"],"iast":["agnihotrīmupāvartya savatsāṃ paravīrahā|","samupetyāśramaṃ pitre parikliṣṭāṃ samarpayat|| 36"],"meaning":"परीक्षित्! विपक्षी वीरोंके नाशक परशुरामजीने बछड़ेके साथ कामधेनु लौटा ली। वह बहुत ही दुःखी हो रही थी। उन्होंने उसे अपने आश्रमपर लाकर पिताजीको सौंप दिया॥ ३६॥"},{"id":"9.15.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/37/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्वकर्म तत्कृतं रामः पित्रे भ्रातृभ्य एव च।","वर्णयामास तच्छ्रुत्वा जमदग्‍निरभाषत॥ ३७"],"iast":["svakarma tatkṛtaṃ rāmaḥ pitre bhrātṛbhya eva ca|","varṇayāmāsa tacchrutvā jamadagnirabhāṣata|| 37"],"meaning":"और माहिष्मतीमें सहस्रबाहुने तथा उन्होंने जो कुछ किया था, सब अपने पिताजी तथा भाइयोंको कह सुनाया। सब कुछ सुनकर जमदग्‍नि मुनिने कहा—॥ ३७॥"},{"id":"9.15.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/38/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राम राम महाबाहो भवान् पापमकारषीत्।","अवधीन्‍नरदेवं यत् सर्वदेवमयं वृथा॥ ३८"],"iast":["rāma rāma mahābāho bhavān pāpamakāraṣīt|","avadhīnnaradevaṃ yat sarvadevamayaṃ vṛthā|| 38"],"meaning":"‘हाय, हाय, परशुराम! तुमने बड़ा पाप किया। राम, राम! तुम बड़े वीर हो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेवका तुमने व्यर्थ ही वध किया॥ ३८॥"},{"id":"9.15.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/39/","page":79,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वयं हि ब्राह्मणास्तात क्षमयार्हणतां गताः।","यया लोकगुरुर्देवः पारमेष्ठ्यमगात् पदम्॥ ३९"],"iast":["vayaṃ hi brāhmaṇāstāta kṣamayārhaṇatāṃ gatāḥ|","yayā lokagururdevaḥ pārameṣṭhyamagāt padam|| 39"],"meaning":"बेटा! हमलोग ब्राह्मण हैं। क्षमाके प्रभावसे ही हम संसारमें पूजनीय हुए हैं। और तो क्या, सबके दादा ब्रह्माजी भी क्षमाके बलसे ही ब्रह्मपदको प्राप्त हुए हैं॥ ३९॥"},{"id":"9.15.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/40/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["क्षमया रोचते लक्ष्मीर्ब्राह्मी सौरी यथा प्रभा।","क्षमिणामाशु भगवांस्तुष्यते हरिरीश्‍वरः॥ ४०"],"iast":["kṣamayā rocate lakṣmīrbrāhmī saurī yathā prabhā|","kṣamiṇāmāśu bhagavāṃstuṣyate harirīśvaraḥ|| 40"],"meaning":"ब्राह्मणोंकी शोभा क्षमाके द्वारा ही सूर्यकी प्रभाके समान चमक उठती है। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि भी क्षमावानोंपर ही शीघ्र प्रसन्‍न होते हैं॥ ४०॥"},{"id":"9.15.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/15/41/","page":80,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधाद् गुरुः।","तीर्थसंसेवया चांहो जह्यंगाच्युतचेतनः॥ ४१"],"iast":["rājño mūrdhābhiṣiktasya vadho brahmavadhād guruḥ|","tīrthasaṃsevayā cāṃho jahyaṃgācyutacetanaḥ|| 41"],"meaning":"बेटा! सार्वभौम राजाका वध ब्राह्मणकी हत्यासे भी बढ़कर है। जाओ, भगवान्‌का स्मरण करते हुए तीर्थोंका सेवन करके अपने पापोंको धो डालो’॥ ४१॥"}],"text":[{"b":25998,"kind":"adhyaya_heading","page":75,"text":"अथ पञ्चदशोऽध्यायः"},{"b":25999,"kind":"topic_heading","page":75,"text":"ऋचीक, जमदग्‍नि और परशुरामजीका चरित्र"},{"b":26000,"kind":"topic_heading","page":75,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":26001,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.1"],"text":"ऐलस्य चोर्वशीगर्भात् षडासन्‍नात्मजा नृप।"},{"b":26002,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.1"],"text":"आयुः श्रुतायुः सत्यायू रयोऽथ विजयो जयः॥ १"},{"b":26003,"kind":"hindi_commentary","page":75,"explains":["9.15.1"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! उर्वशीके गर्भसे पुरूरवाके छः पुत्र हुए—आयु, श्रुतायु, सत्यायु, रय, विजय और जय॥ १॥"},{"b":26004,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.2"],"text":"श्रुतायोर्वसुमान् पुत्रः सत्यायोश्‍च श्रुतंजयः।"},{"b":26005,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.2"],"text":"रयस्य सुत एकश्‍च जयस्य तनयोऽमितः॥ २"},{"b":26006,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.3"],"text":"भीमस्तु विजयस्याथ कांचनो होत्रकस्ततः।"},{"b":26007,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.3"],"text":"तस्य जह्नुः सुतो गंगां गण्डूषीकृत्य योऽपिबत्।"},{"b":26008,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.3"],"text":"जह्नोस्तु पूरुस्तत्पुत्रो बलाकश्‍चात्मजोऽजकः॥ ३"},{"b":26009,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.4"],"text":"ततः कुशः कुशस्यापि कुशाम्बुस्तनयो वसुः।"},{"b":26010,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.4"],"text":"कुशनाभश्‍च चत्वारो गाधिरासीत् कुशाम्बुजः॥ ४"},{"b":26011,"kind":"hindi_translation","page":75,"explains":["9.15.2","9.15.3","9.15.4"],"text":"श्रुतायुका पुत्र था वसुमान्, सत्यायुका श्रुतंजय, रयका एक और जयका अमित॥ २॥ विजयका भीम, भीमका कांचन, कांचनका होत्र और होत्रका पुत्र था जह्नु। ये जह्नु वही थे, जो गंगाजीको अपनी अंजलिमें लेकर पी गये थे। जह्नुका पुत्र था पूरु, पूरुका बलाक और बलाकका अजक॥ ३॥ अजकका कुश था। कुशके चार पुत्र थे—कुशाम्बु, तनय, वसु और कुशनाभ। इनमेंसे कुशाम्बुके पुत्र गाधि हुए॥ ४॥"},{"b":26012,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.5"],"text":"तस्य सत्यवतीं कन्यामृचीकोऽयाचत द्विजः।"},{"b":26013,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.5"],"text":"वरं विसदृशं मत्वा गाधिर्भार्गवमब्रवीत्॥ ५"},{"b":26014,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.6"],"text":"एकतः श्यामकर्णानां हयानां चन्द्रवर्चसाम्।"},{"b":26015,"kind":"sanskrit_shloka","page":75,"verses":["9.15.6"],"text":"सहस्रं दीयतां शुल्कं कन्यायाः कुशिका वयम्॥ ६"},{"b":26016,"kind":"hindi_commentary","page":75,"explains":["9.15.5","9.15.6"],"text":"परीक्षित्! गाधिकी कन्याका नाम था सत्यवती। ऋचीक ऋषिने गाधिसे उनकी कन्या माँगी। गाधिने यह समझकर कि ये कन्याके योग्य वर नहीं है, ऋचीकसे कहा—॥ ५॥ ‘मुनिवर! हमलोग कुशिकवंशके हैं। हमारी कन्या मिलनी कठिन है। इसलिये आप एक हजार ऐसे घोड़े लाकर मुझे शुल्करूपमें दीजिये, जिनका सारा शरीर तो श्‍वेत हो, परन्तु एक-एक कान श्याम वर्णका हो’॥ ६॥"},{"b":26017,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.7"],"text":"इत्युक्तस्तन्मतं ज्ञात्वा गतः स वरुणान्तिकम्।"},{"b":26018,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.7"],"text":"आनीय दत्त्वा तानश्‍वानुपयेमे वराननाम्॥ ७"},{"b":26019,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.8"],"text":"स ऋषिः प्रार्थितः पत्‍न्या श्‍वश्र्वा चापत्यकाम्यया।"},{"b":26020,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.8"],"text":"श्रपयित्वोभयैर्मन्त्रैश्‍चरुं स्नातुं गतो मुनिः॥ ८"},{"b":26021,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.9"],"text":"तावत् सत्यवती मात्रा स्वचरुं याचिता सती।"},{"b":26022,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.9"],"text":"श्रेष्ठं मत्वा तयायच्छन्मात्रे मातुरदत् स्वयम्॥ ९"},{"b":26023,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.10"],"text":"तद् विज्ञाय मुनिः प्राह पत्‍नीं कष्टमकारषीः।"},{"b":26024,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.10"],"text":"घोरो दण्डधरः पुत्रो भ्राता ते ब्रह्मवित्तमः॥ १०"},{"b":26025,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.11"],"text":"प्रसादितः सत्यवत्या मैवं भूदिति भार्गवः।"},{"b":26026,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.11"],"text":"अथ तर्हि भवेत् पौत्रो जमदग्‍निस्ततोऽभवत्॥ ११"},{"b":26027,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.12"],"text":"सा चाभूत् सुमहापुण्या कौशिकी लोकपावनी।"},{"b":26028,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.12"],"text":"रेणोः सुतां रेणुकां वै जमदग्‍निरुवाह याम्॥ १२"},{"b":26029,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.13"],"text":"तस्यां वै भार्गवऋषेः सुता वसुमदादयः।"},{"b":26030,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.13"],"text":"यवीयांजज्ञ एतेषां राम इत्यभिविश्रुतः॥ १३"},{"b":26031,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.14"],"text":"यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम्।"},{"b":26032,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.14"],"text":"त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम्॥ १४"},{"b":26033,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.15"],"text":"दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत्।"},{"b":26034,"kind":"sanskrit_shloka","page":76,"verses":["9.15.15"],"text":"रजस्तमोवृतमहन् फल्गुन्यपि कृतेंऽहसि॥ १५"},{"b":26035,"kind":"hindi_translation","page":76,"explains":["9.15.7","9.15.8","9.15.9","9.15.10","9.15.11","9.15.12","9.15.13","9.15.14","9.15.15"],"text":"जब गाधिने यह बात कही, तब ऋचीक मुनि उनका आशय समझ गये और वरुणके पास जाकर वैसे ही घोड़े ले आये तथा उन्हें देकर सुन्दरी सत्यवतीसे विवाह कर लिया॥ ७॥ एक बार महर्षि ऋचीकसे उनकी पत्‍नी और सास दोनोंने ही पुत्रप्राप्तिके लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीकने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनोंके लिये अलग-अलग मन्त्रोंसे चरु पकाया और स्नान करनेके लिये चले गये॥ ८॥ सत्यवतीकी माँने यह समझकर कि ऋषिने अपनी पत्‍नीके लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा, उससे वह चरु माँग लिया। इसपर सत्यवतीने अपना चरु तो माँको दे दिया और माँका चरु वह स्वयं खा गयी॥ ९॥ जब ऋचीक मुनिको इस बातका पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्‍नी सत्यवतीसे कहा कि ‘तुमने बड़ा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगोंको दण्ड देनेवाला घोर प्रकृतिका होगा और तुम्हारा भाई होगा एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता’॥ १०॥ सत्यवतीने ऋचीक मुनिको प्रसन्‍न किया और प्रार्थना की कि ‘स्वामी! ऐसा नहीं होना चाहिये।’ तब उन्होंने कहा—‘अच्छी बात है। पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा (घोर प्रकृतिका) होगा।’ समयपर सत्यवतीके गर्भसे जमदग्‍निका जन्म हुआ॥ ११॥ सत्यवती समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी ‘कौशिकी’ नदी बन गयी। रेणु ऋषिकी कन्या थी रेणुका। जमदग्‍निने उसका पाणिग्रहण किया॥ १२॥ रेणुकाके गर्भसे जमदग्‍नि ऋषिके वसुमान् आदि कई पुत्र हुए। उनमें सबसे छोटे परशुरामजी थे। उनका यश सारे संसारमें प्रसिद्ध है॥ १३॥ कहते हैं कि हैहयवंशका अन्त करनेके लिये स्वयं भगवान्‌ने ही परशुरामके रूपमें अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया॥ १४॥ यद्यपि क्षत्रियोंने उनका थोड़ा-सा ही अपराध किया था—फिर भी वे लोग बड़े दुष्ट, ब्राह्मणोंके अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारण था कि वे पृथ्वीके भार हो गये थे और इसीके फलस्वरूप भगवान् परशुरामने उनका नाश करके पृथ्वीका भार उतार दिया॥ १५॥"},{"b":26036,"kind":"topic_heading","page":77,"text":"राजोवाच"},{"b":26037,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.16"],"text":"किं तदंहो भगवतो राजन्यैरजितात्मभिः।"},{"b":26038,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.16"],"text":"कृतं येन कुलं नष्टं क्षत्रियाणामभीक्ष्णशः॥ १६"},{"b":26039,"kind":"hindi_commentary","page":77,"explains":["9.15.16"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! अवश्य ही उस समयके क्षत्रिय विषयलोलुप हो गये थे; परन्तु उन्होंने परशुरामजीका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया, जिसके कारण उन्होंने बार-बार क्षत्रियोंके वंशका संहार किया?॥ १६॥"},{"b":26040,"kind":"hindi_commentary","page":77,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":26041,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.17"],"text":"हैहयानामधिपतिरर्जुनः क्षत्रियर्षभः।"},{"b":26042,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.17"],"text":"दत्तं नारायणस्यांशमाराध्य परिकर्मभिः॥ १७"},{"b":26043,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.18"],"text":"बाहून् दशशतं लेभे दुर्धर्षत्वमरातिषु।"},{"b":26044,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.18"],"text":"अव्याहतेन्द्रियौजःश्रीतेजोवीर्ययशोबलम्॥ १८"},{"b":26045,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.19"],"text":"योगेश्‍वरत्वमैश्‍वर्यं गुणा यत्राणिमादयः।"},{"b":26046,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.19"],"text":"चचाराव्याहतगतिर्लोकेषु पवनो यथा॥ १९"},{"b":26047,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.20"],"text":"स्त्रीरत्‍नैरावृतः क्रीडन् रेवाम्भसि मदोत्कटः।"},{"b":26048,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.20"],"text":"वैजयन्तीं स्रजं बिभ्रद् रुरोध सरितं भुजैः॥ २०"},{"b":26049,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.21"],"text":"विप्लावितं स्वशिबिरं प्रतिस्रोतःसरिज्जलैः।"},{"b":26050,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.21"],"text":"नामृष्यत् तस्य तद् वीर्यं वीरमानी दशाननः॥ २१"},{"b":26051,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.22"],"text":"गृहीतो लीलया स्त्रीणां समक्षं कृतकिल्बिषः।"},{"b":26052,"kind":"sanskrit_shloka","page":77,"verses":["9.15.22"],"text":"माहिष्मत्यां संनिरुद्धो मुक्तो येन कपिर्यथा॥ २२"},{"b":26053,"kind":"hindi_commentary","page":77,"explains":["9.15.17","9.15.18","9.15.19","9.15.20","9.15.21","9.15.22"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहने लगे—परीक्षित्! उन दिनों हैहयवंशका अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा करके भगवान् नारायणके अंशावतार दत्तात्रेयजीको प्रसन्‍न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके—यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियोंका अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपासे प्राप्त कर लिये थे॥ १७-१८॥ वह योगेश्‍वर हो गया था। उसमें ऐसा ऐश्‍वर्य था कि वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, स्थूल-से-स्थूल रूप धारण कर लेता। सभी सिद्धियाँ उसे प्राप्त थीं। वह संसारमें वायुकी तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता॥ १९॥ एक बार गलेमें वैजयन्ती माला पहने सहस्रबाहु अर्जुन बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंके साथ नर्मदा नदीमें जल-विहार कर रहा था। उस समय मदोन्मत्त सहस्रबाहुने अपनी बाँहोंसे नदीका प्रवाह रोक दिया॥ २०॥ दशमुख रावणका शिविर भी वहीं कहीं पासमें ही था। नदीकी धारा उलटी बहने लगी, जिससे उसका शिविर डूबने लगा। रावण अपनेको बहुत बड़ा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्रार्जुनका यह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ॥ २१॥ जब रावण सहस्रबाहु अर्जुनके पास जाकर बुरा-भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियोंके सामने ही खेल-खेलमें रावणको पकड़ लिया और अपनी राजधानी माहिष्मतीमें ले जाकर बंदरके समान कैद कर लिया। पीछे पुलस्त्यजीके कहनेसे सहस्रबाहुने रावणको छोड़ दिया॥ २२॥"},{"b":26054,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.23"],"text":"स एकदा तु मृगयां विचरन् विपिने वने।"},{"b":26055,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.23"],"text":"यदृच्छयाऽऽश्रमपदं जमद‌ग्‍नेरुपाविशत्॥ २३"},{"b":26056,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.24"],"text":"तस्मै स नरदेवाय मुनिरर्हणमाहरत्।"},{"b":26057,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.24"],"text":"ससैन्यामात्यवाहाय हविष्मत्या तपोधनः॥ २४"},{"b":26058,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.25"],"text":"स वीरस्तत्र तद् दृष्ट्वा आत्मैश्‍वर्यातिशायनम्।"},{"b":26059,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.25"],"text":"तन्‍नाद्रियताग्‍निहोत्र्यां साभिलाषः स हैहयः॥ २५"},{"b":26060,"kind":"hindi_translation","page":78,"explains":["9.15.23","9.15.24","9.15.25"],"text":"एक दिन सहस्रबाहु अर्जुन शिकार खेलनेके लिये बड़े घोर जंगलमें निकल गया था। दैववश वह जमदग्‍नि मुनिके आश्रमपर जा पहुँचा॥ २३॥ परम तपस्वी जमदग्‍नि मुनिके आश्रममें कामधेनु रहती थी। उसके प्रतापसे उन्होंने सेना, मन्त्री और वाहनोंके साथ हैहयाधिपतिका खूब स्वागत-सत्कार किया॥ २४॥ वीर हैहयाधिपतिने देखा कि जमदग्‍नि मुनिका ऐश्‍वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कारको कुछ भी आदर न देकर कामधेनुको ही ले लेना चाहा॥ २५॥"},{"b":26061,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.26"],"text":"हविर्धानीमृषेर्दर्पान्‍नरान् हर्तुमचोदयत्।"},{"b":26062,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.26"],"text":"ते च माहिष्मतीं निन्युः सवत्सां क्रन्दतीं बलात्॥ २६"},{"b":26063,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.27"],"text":"अथ राजनि निर्याते राम आश्रम आगतः।"},{"b":26064,"kind":"hindi_commentary","page":78,"verses":["9.15.27"],"text":"श्रुत्वा तत् तस्य दौरात्म्यं चुक्रोधाहिरिवाहतः॥ २७"},{"b":26065,"kind":"hindi_commentary","page":78,"verses":["9.15.28"],"text":"घोरमादाय परशुं सतूणं चर्म कार्मुकम्।"},{"b":26066,"kind":"hindi_commentary","page":78,"verses":["9.15.28"],"text":"अन्वधावत दुर्धर्षो मृगेन्द्र इव यूथपम्॥ २८"},{"b":26067,"kind":"hindi_translation","page":78,"explains":["9.15.26","9.15.27","9.15.28"],"text":"उसने अभिमानवश जमदग्‍नि मुनिसे माँगा भी नहीं, अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि कामधेनुको छीन ले चलो। उसकी आज्ञासे उसके सेवक बछड़ेके साथ ‘बाँ-बाँ’ डकराती हुई कामधेनुको बलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये॥ २६॥ जब वे सब चले गये, तब परशुरामजी आश्रमपर आये और उसकी दुष्टताका वृत्तान्त सुनकर चोट खाये हुए साँपकी तरह क्रोधसे तिलमिला उठे॥ २७॥ वे अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े वेगसे उसके पीछे दौड़े—जैसे कोई किसीसे न दबनेवाला सिंह हाथीपर टूट पड़े॥ २८॥"},{"b":26068,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.29"],"text":"तमापतन्तं भृगुवर्यमोजसा"},{"b":26069,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.29"],"text":"धनुर्धरं बाणपरश्‍वधायुधम्।"},{"b":26070,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.29"],"text":"ऐणेयचर्माम्बरमर्कधामभि-"},{"b":26071,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.29"],"text":"र्युतं जटाभिर्ददृशे पुरीं विशन्॥ २९"},{"b":26072,"kind":"hindi_translation","page":78,"explains":["9.15.29"],"text":"सहस्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगरमें प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज बड़े वेगसे उसीकी ओर झपटे आ रहे हैं। उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी। वे हाथमें धनुष-बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीरपर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्यकी किरणोंके समान चमक रही थीं॥ २९॥"},{"b":26073,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.30"],"text":"अचोदयद्धस्तिरथाश्‍वपत्तिभि-"},{"b":26074,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.30"],"text":"र्गदासिबाणर्ष्टिशतघ्निशक्तिभिः ।"},{"b":26075,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.30"],"text":"अक्षौहिणीः सप्तदशातिभीषणा-"},{"b":26076,"kind":"sanskrit_shloka","page":78,"verses":["9.15.30"],"text":"स्ता राम एको भगवानसूदयत्॥ ३०"},{"b":26077,"kind":"hindi_commentary","page":78,"explains":["9.15.30"],"text":"उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग, बाण, ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधोंसे सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियोंसे युक्त अत्यन्त भयंकर सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी। भगवान् परशुरामने बात-की-बातमें अकेले ही उस सारी सेनाको नष्ट कर दिया॥ ३०॥"},{"b":26078,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.31"],"text":"यतो यतोऽसौ प्रहरत्परश्‍वधो"},{"b":26079,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.31"],"text":"मनोऽनिलौजाः परचक्रसूदनः।"},{"b":26080,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.31"],"text":"ततस्ततश्छिन्‍नभुजोरुकन्धरा"},{"b":26081,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.31"],"text":"निपेतुरुर्व्यां हतसूतवाहनाः॥ ३१"},{"b":26082,"kind":"hindi_commentary","page":79,"explains":["9.15.31"],"text":"भगवान् परशुरामजीकी गति मन और वायुके समान थी। बस, वे शत्रुकी सेना काटते ही जा रहे थे। जहाँ-जहाँ वे अपने फरसेका प्रहार करते, वहाँ-वहाँ सारथि और वाहनोंके साथ बड़े-बड़े वीरोंकी बाँहें, जाँघें और कंधे कट-कटकर पृथ्वीपर गिरते जाते थे॥ ३१॥"},{"b":26083,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.32"],"text":"दृष्ट्वा स्वसैन्यं रुधिरौघकर्दमे"},{"b":26084,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.32"],"text":"रणाजिरे रामकुठारसायकैः।"},{"b":26085,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.32"],"text":"विवृक्णचर्मध्वजचापविग्रहं"},{"b":26086,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.32"],"text":"निपातितं हैहय आपतद् रुषा॥ ३२"},{"b":26087,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.33"],"text":"अथार्जुनः पंचशतेषु बाहुभि-"},{"b":26088,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.33"],"text":"र्धनुःषु बाणान् युगपत् स सन्दधे।"},{"b":26089,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.33"],"text":"रामाय रामोऽस्त्रभृतां समग्रणी-"},{"b":26090,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.33"],"text":"स्तान्येकधन्वेषुभिराच्छिनत् समम्॥ ३३"},{"b":26091,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.34"],"text":"पुनः स्वहस्तैरचलान् मृधेऽङ्‌घ्रिपा-"},{"b":26092,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.34"],"text":"नुत्क्षिप्य वेगादभिधावतो युधि।"},{"b":26093,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.34"],"text":"भुजान् कुठारेण कठोरनेमिना"},{"b":26094,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.34"],"text":"चिच्छेद रामः प्रसभं त्वहेरिव॥ ३४"},{"b":26095,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.35"],"text":"कृत्तबाहोः शिरस्तस्य गिरेः शृंगमिवाहरत्।"},{"b":26096,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.35"],"text":"हते पितरि तत्पुत्रा अयुतं दुद्रुवुर्भयात्॥ ३५"},{"b":26097,"kind":"hindi_commentary","page":79,"explains":["9.15.32","9.15.33","9.15.34","9.15.35"],"text":"हैहयाधिपति अर्जुनने देखा कि मेरी सेनाके सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल भगवान् परशुरामके फरसे और बाणोंसे कट-कटकर खूनसे लथपथ रणभूमिमें गिर गये हैं, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़नेके लिये आ धमका॥ ३२॥ उसने एक साथ ही अपनी हजार भुजाओंसे पाँच सौ धनुषोंपर बाण चढ़ाये और परशुरामजीपर छोड़े। परन्तु परशुरामजी तो समस्त शस्त्रधारियोंके शिरोमणि ठहरे। उन्होंने अपने एक धनुषपर छोड़े हुए बाणोंसे ही एक साथ सबको काट डाला॥ ३३॥ अब हैहयाधिपति अपने हाथोंसे पहाड़ और पेड़ उखाड़कर बड़े वेगसे युद्धभूमिमें परशुरामजीकी ओर झपटा। परन्तु परशुरामजीने अपनी तीखी धारवाले फरसेसे बड़ी फुर्तीके साथ उसकी साँपोंके समान भुजाओंको काट डाला॥ ३४॥ जब उसकी बाँहें कट गयीं, तब उन्होंने पहाड़की चोटीकी तरह उसका ऊँचा सिर धड़से अलग कर दिया। पिताके मर जानेपर उसके दस हजार लड़के डरकर भग गये॥ ३५॥"},{"b":26098,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.36"],"text":"अग्‍निहोत्रीमुपावर्त्य सवत्सां परवीरहा।"},{"b":26099,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.36"],"text":"समुपेत्याश्रमं पित्रे परिक्लिष्टां समर्पयत्॥ ३६"},{"b":26100,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.37"],"text":"स्वकर्म तत्कृतं रामः पित्रे भ्रातृभ्य एव च।"},{"b":26101,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.37"],"text":"वर्णयामास तच्छ्रुत्वा जमदग्‍निरभाषत॥ ३७"},{"b":26102,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.38"],"text":"राम राम महाबाहो भवान् पापमकारषीत्।"},{"b":26103,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.38"],"text":"अवधीन्‍नरदेवं यत् सर्वदेवमयं वृथा॥ ३८"},{"b":26104,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.39"],"text":"वयं हि ब्राह्मणास्तात क्षमयार्हणतां गताः।"},{"b":26105,"kind":"sanskrit_shloka","page":79,"verses":["9.15.39"],"text":"यया लोकगुरुर्देवः पारमेष्ठ्यमगात् पदम्॥ ३९"},{"b":26106,"kind":"hindi_commentary","page":79,"explains":["9.15.36","9.15.37","9.15.38","9.15.39"],"text":"परीक्षित्! विपक्षी वीरोंके नाशक परशुरामजीने बछड़ेके साथ कामधेनु लौटा ली। वह बहुत ही दुःखी हो रही थी। उन्होंने उसे अपने आश्रमपर लाकर पिताजीको सौंप दिया॥ ३६॥ और माहिष्मतीमें सहस्रबाहुने तथा उन्होंने जो कुछ किया था, सब अपने पिताजी तथा भाइयोंको कह सुनाया। सब कुछ सुनकर जमदग्‍नि मुनिने कहा—॥ ३७॥ ‘हाय, हाय, परशुराम! तुमने बड़ा पाप किया। राम, राम! तुम बड़े वीर हो; परन्तु सर्वदेवमय नरदेवका तुमने व्यर्थ ही वध किया॥ ३८॥ बेटा! हमलोग ब्राह्मण हैं। क्षमाके प्रभावसे ही हम संसारमें पूजनीय हुए हैं। और तो क्या, सबके दादा ब्रह्माजी भी क्षमाके बलसे ही ब्रह्मपदको प्राप्त हुए हैं॥ ३९॥"},{"b":26107,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.15.40"],"text":"क्षमया रोचते लक्ष्मीर्ब्राह्मी सौरी यथा प्रभा।"},{"b":26108,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.15.40"],"text":"क्षमिणामाशु भगवांस्तुष्यते हरिरीश्‍वरः॥ ४०"},{"b":26109,"kind":"hindi_translation","page":80,"explains":["9.15.40"],"text":"ब्राह्मणोंकी शोभा क्षमाके द्वारा ही सूर्यकी प्रभाके समान चमक उठती है। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि भी क्षमावानोंपर ही शीघ्र प्रसन्‍न होते हैं॥ ४०॥"},{"b":26110,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.15.41"],"text":"राज्ञो मूर्धाभिषिक्तस्य वधो ब्रह्मवधाद् गुरुः।"},{"b":26111,"kind":"sanskrit_shloka","page":80,"verses":["9.15.41"],"text":"तीर्थसंसेवया चांहो जह्यंगाच्युतचेतनः॥ ४१"},{"b":26112,"kind":"hindi_translation","page":80,"explains":["9.15.41"],"text":"बेटा! सार्वभौम राजाका वध ब्राह्मणकी हत्यासे भी बढ़कर है। जाओ, भगवान्‌का स्मरण करते हुए तीर्थोंका सेवन करके अपने पापोंको धो डालो’॥ ४१॥"},{"b":26113,"kind":"hindi_translation","page":80,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥"}],"notes":[{"id":"v2:124","mark":"२","page":75,"after_verse":null,"text":"बादरायणिरुवाच।"},{"id":"v2:125","mark":"३","page":75,"after_verse":"9.15.4","text":"शाम्बुर्मूर्तरयो।"},{"id":"v2:126","mark":"१","page":76,"after_verse":"9.15.9","text":"सा चरुं।"},{"id":"v2:127","mark":"२","page":76,"after_verse":"9.15.9","text":"तु सा य०।"},{"id":"v2:128","mark":"३","page":76,"after_verse":"9.15.15","text":"मुपाहरत्।"},{"id":"v2:129","mark":"१","page":77,"after_verse":null,"text":"बादरायणिरुवाच।"},{"id":"v2:130","mark":"२","page":77,"after_verse":"9.15.18","text":"शोऽतुलम्।"},{"id":"v2:131","mark":"१","page":78,"after_verse":"9.15.23","text":"विजने।"},{"id":"v2:132","mark":"२","page":78,"after_verse":"9.15.25","text":"स चैश्‍वर्यं तु त०।"},{"id":"v2:133","mark":"३","page":78,"after_verse":"9.15.27","text":"स तस्य।"},{"id":"v2:134","mark":"४","page":78,"after_verse":"9.15.28","text":"परशुं घोरमादाय स क्षणाद्वर्मकार्मुकम्।"},{"id":"v2:135","mark":"५","page":78,"after_verse":"9.15.28","text":"दुर्मर्षो।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}