{"id":"9.11","title":"नवम स्कन्ध · अध्याय 11","part":"नवम स्कन्ध","heading":"अथैकादशोऽध्यायः","topics":["भगवान् श्रीरामकी शेष लीलाओंका वर्णन"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 9.11.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":2,"pages":[60,65]},"verses":[{"id":"9.11.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/1/","page":60,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["भगवानात्मनाऽऽत्मानं राम उत्तमकल्पकैः।","सर्वदेवमयं देवमीज आचार्यवान् मखैः॥ १"],"iast":["bhagavānātmanā''tmānaṃ rāma uttamakalpakaiḥ|","sarvadevamayaṃ devamīja ācāryavān makhaiḥ|| 1"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीरामने गुरु वसिष्ठजीको अपना आचार्य बनाकर उत्तम सामग्रियोंसे युक्त यज्ञोंके द्वारा अपने-आप ही अपने सर्वदेवस्वरूप स्वयंप्रकाश आत्माका यजन किया॥ १॥"},{"id":"9.11.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/2/","page":60,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["होत्रेऽददाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः।","अध्वर्यवे प्रतीचीं च उदीचीं सामगाय सः॥ २"],"iast":["hotre'dadād diśaṃ prācīṃ brahmaṇe dakṣiṇāṃ prabhuḥ|","adhvaryave pratīcīṃ ca udīcīṃ sāmagāya saḥ|| 2"],"meaning":"उन्होंने होताको पूर्व दिशा, ब्रह्माको दक्षिण, अध्वर्युको पश्‍चिम और उद्गाताको उत्तर दिशा दे दी॥ २॥"},{"id":"9.11.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/3/","page":60,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा।","मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः॥ ३"],"iast":["ācāryāya dadau śeṣāṃ yāvatī bhūstadantarā|","manyamāna idaṃ kṛtsnaṃ brāhmaṇo'rhati niḥspṛhaḥ|| 3"],"meaning":"उनके बीचमें जितनी भूमि बच रही थी, वह उन्होंने आचार्यको दे दी। उनका यह निश्‍चय था कि सम्पूर्ण भूमण्डलका एकमात्र अधिकारी निःस्पृह ब्राह्मण ही है॥ ३॥"},{"id":"9.11.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/4/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इत्ययं तदलंकारवासोभ्यामवशेषितः।","तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमंगल्यावशेषिता॥ ४"],"iast":["ityayaṃ tadalaṃkāravāsobhyāmavaśeṣitaḥ|","tathā rājñyapi vaidehī saumaṃgalyāvaśeṣitā|| 4"],"meaning":"इस प्रकार सारे भूमण्डलका दान करके उन्होंने अपने शरीरके वस्त्र और अलंकार ही अपने पास रखे। इसी प्रकार महारानी सीताजीके पास भी केवल मांगलिक वस्त्र और आभूषण ही बच रहे॥ ४॥"},{"id":"9.11.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/5/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ते तु ब्रह्मण्यदेवस्य वात्सल्यं वीक्ष्य संस्तुतम्।","प्रीताः क्लिन्‍नधियस्तस्मै प्रत्यर्प्येदं बभाषिरे॥ ५"],"iast":["te tu brahmaṇyadevasya vātsalyaṃ vīkṣya saṃstutam|","prītāḥ klinnadhiyastasmai pratyarpyedaṃ babhāṣire|| 5"],"meaning":"जब आचार्य आदि ब्राह्मणोंने देखा कि भगवान् श्रीराम तो ब्राह्मणोंको ही अपना इष्टदेव मानते हैं, उनके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति अनन्त स्नेह है, तब उनका हृदय प्रेमसे द्रवित हो गया। उन्होंने प्रसन्‍न होकर सारी पृथ्वी भगवान्‌को लौटा दी और कहा॥ ५॥"},{"id":"9.11.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/6/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्‍वर।","यन्‍नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा॥ ६"],"iast":["aprattaṃ nastvayā kiṃ nu bhagavan bhuvaneśvara|","yanno'ntarhṛdayaṃ viśya tamo haṃsi svarociṣā|| 6"],"meaning":"‘प्रभो! आप सब लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप तो हमारे हृदयके भीतर रहकर अपनी ज्योतिसे अज्ञानान्धकारका नाश कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें भला, आपने हमें क्या नहीं दे रखा है॥ ६॥"},{"id":"9.11.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/7/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे।","उत्तमश्‍लोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताङ्‌घ्र‌ये॥ ७"],"iast":["namo brahmaṇyadevāya rāmāyākuṇṭhamedhase|","uttamaślokadhuryāya nyastadaṇḍārpitāṅghraye|| 7"],"meaning":"आपका ज्ञान अनन्त है। पवित्र कीर्तिवाले पुरुषोंमें आप सर्वश्रेष्ठ हैं। उन महात्माओंको, जो किसीको किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं पहुँचाते, आपने अपने चरणकमल दे रखे हैं। ऐसा होनेपर भी आप ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव मानते हैं। भगवन्! आपके इस रामरूपको हम नमस्कार करते हैं’॥ ७॥"},{"id":"9.11.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/8/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["कदाचिल्लोकजिज्ञासुर्गूढो रात्र्यामलक्षितः।","चरन् वाचोऽशृणोद् रामो भार्यामुद्दिश्य कस्यचित्॥ ८"],"iast":["kadācillokajijñāsurgūḍho rātryāmalakṣitaḥ|","caran vāco'śṛṇod rāmo bhāryāmuddiśya kasyacit|| 8"],"meaning":"परीक्षित्! एक बार अपनी प्रजाकी स्थिति जाननेके लिये भगवान् श्रीरामजी रातके समय छिपकर बिना किसीको बतलाये घूम रहे थे। उस समय उन्होंने किसीकी यह बात सुनी। वह अपनी पत्‍नीसे कह रहा था॥ ८॥"},{"id":"9.11.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/9/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टामसतीं परवेश्मगाम्।","स्त्रीलोभी बिभृयात् सीतां रामो नाहं भजे पुनः॥ ९"],"iast":["nāhaṃ bibharmi tvāṃ duṣṭāmasatīṃ paraveśmagām|","strīlobhī bibhṛyāt sītāṃ rāmo nāhaṃ bhaje punaḥ|| 9"],"meaning":"‘अरी! तू दुष्ट और कुलटा है। तू पराये घरमें रह आयी है। स्त्री-लोभी राम भले ही सीताको रख लें, परन्तु मैं तुझे फिर नहीं रख सकता’॥ ९॥"},{"id":"9.11.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/10/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इति लोकाद् बहुमुखाद् दुराराध्यादसंविदः।","पत्या भीतेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्राचेतसाश्रमम्॥ १०"],"iast":["iti lokād bahumukhād durārādhyādasaṃvidaḥ|","patyā bhītena sā tyaktā prāptā prācetasāśramam|| 10"],"meaning":"सचमुच सब लोगोंको प्रसन्‍न रखना टेढ़ी खीर है। क्योंकि मूर्खोंकी तो कमी नहीं है। जब भगवान् श्रीरामने बहुतोंके मुँहसे ऐसी बात सुनी, तो वे लोकापवादसे कुछ भयभीत-से हो गये। उन्होंने श्रीसीताजीका परित्याग कर दिया और वे वाल्मीकि मुनिके आश्रममें रहने लगीं॥ १०॥"},{"id":"9.11.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/11/","page":61,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अन्तर्वत्‍न्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ।","कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्‍चक्रे क्रिया मुनिः॥ ११"],"iast":["antarvatnyāgate kāle yamau sā suṣuve sutau|","kuśo lava iti khyātau tayoścakre kriyā muniḥ|| 11"],"meaning":"सीताजी उस समय गर्भवती थीं। समय आनेपर उन्होंने एक साथ ही दो पुत्र उत्पन्‍न किये। उनके नाम हुए—कुश और लव। वाल्मीकि मुनिने उनके जात-कर्मादि संस्कार किये॥ ११॥"},{"id":"9.11.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/12/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अंगदश्‍चित्रकेतुश्‍च लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ।","तक्षः पुष्कल इत्यास्तां भरतस्य महीपते॥ १२"],"iast":["aṃgadaścitraketuśca lakṣmaṇasyātmajau smṛtau|","takṣaḥ puṣkala ityāstāṃ bharatasya mahīpate|| 12"],"meaning":"लक्ष्मणजीके दो पुत्र हुए—अंगद और चित्रकेतु। परीक्षित्! इसी प्रकार भरतजीके भी दो ही पुत्र थे—तक्ष और पुष्कल॥ १२॥"},{"id":"9.11.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/13/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुबाहुः श्रुतसेनश्‍च शत्रुघ्नस्य बभूवतुः।","गन्धर्वान् कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम्॥ १३"],"iast":["subāhuḥ śrutasenaśca śatrughnasya babhūvatuḥ|","gandharvān koṭiśo jaghne bharato vijaye diśām|| 13"],"meaning":"तथा शत्रुघ्नके भी दो पुत्र हुए—सुबाहु और श्रुतसेन। भरतजीने दिग्विजयमें करोड़ों गन्धर्वोंका संहार किया॥ १३॥"},{"id":"9.11.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/14/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तदीयं धनमानीय सर्वं राज्ञे न्यवेदयत्।","शत्रुघ्नश्‍च मधोः पुत्रं लवणं नाम राक्षसम्।","हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम्॥ १४"],"iast":["tadīyaṃ dhanamānīya sarvaṃ rājñe nyavedayat|","śatrughnaśca madhoḥ putraṃ lavaṇaṃ nāma rākṣasam|","hatvā madhuvane cakre mathurāṃ nāma vai purīm|| 14"],"meaning":"उन्होंने उनका सब धन लाकर अपने बड़े भाई भगवान् श्रीरामकी सेवामें निवेदन किया। शत्रुघ्नजीने मधुवनमें मधुके पुत्र लवण नामक राक्षसको मारकर वहाँ मथुरा नामकी पुरी बसायी॥ १४॥"},{"id":"9.11.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/15/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता।","ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह॥ १५"],"iast":["munau nikṣipya tanayau sītā bhartrā vivāsitā|","dhyāyantī rāmacaraṇau vivaraṃ praviveśa ha|| 15"],"meaning":"भगवान् श्रीरामके द्वारा निर्वासित सीताजीने अपने पुत्रोंको वाल्मीकिजीके हाथोंमें सौंप दिया और भगवान् श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई वे पृथ्वीदेवीके लोकमें चली गयीं॥ १५॥"},{"id":"9.11.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/16/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्‍नपि धिया शुचः।","स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान्‍नाशक्‍नोद् रोद्धुमीश्‍वरः॥ १६"],"iast":["tacchrutvā bhagavān rāmo rundhannapi dhiyā śucaḥ|","smaraṃstasyā guṇāṃstāṃstānnāśaknod roddhumīśvaraḥ|| 16"],"meaning":"यह समाचार सुनकर भगवान् श्रीरामने अपने शोका-वेशको बुद्धिके द्वारा रोकना चाहा, परन्तु परम समर्थ होनेपर भी वे उसे रोक न सके। क्योंकि उन्हें जानकीजीके पवित्र गुण बार-बार स्मरण हो आया करते थे॥ १६॥"},{"id":"9.11.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/17/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्त्रीपुंप्रसंग एतादृक्सर्वत्र त्रासमावहः।","अपीश्‍वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः॥ १७"],"iast":["strīpuṃprasaṃga etādṛksarvatra trāsamāvahaḥ|","apīśvarāṇāṃ kimuta grāmyasya gṛhacetasaḥ|| 17"],"meaning":"परीक्षित्! यह स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध सब कहीं इसी प्रकार दुःखका कारण है। यह बात बड़े-बड़े समर्थ लोगोंके विषयमें भी ऐसी ही है, फिर गृहासक्त विषयी पुरुषके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ १७॥"},{"id":"9.11.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/18/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्‍नजुहोत् प्रभुः।","त्रयोदशाब्दसाहस्रमग्‍निहोत्रमखण्डितम्॥ १८"],"iast":["tata ūrdhvaṃ brahmacaryaṃ dhārayannajuhot prabhuḥ|","trayodaśābdasāhasramagnihotramakhaṇḍitam|| 18"],"meaning":"इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मचर्य धारण करके तेरह हजार वर्षतक अखण्डरूपसे अग्‍निहोत्र किया॥ १८॥"},{"id":"9.11.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/19/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः।","स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः॥ १९"],"iast":["smaratāṃ hṛdi vinyasya viddhaṃ daṇḍakakaṇṭakaiḥ|","svapādapallavaṃ rāma ātmajyotiragāt tataḥ|| 19"],"meaning":"तदनन्तर अपना स्मरण करनेवाले भक्तोंके हृदयमें अपने उन चरणकमलोंको स्थापित करके, जो दण्डकवनके काँटोंसे बिंध गये थे, अपने स्वयंप्रकाश परम ज्योतिर्मय धाममें चले गये॥ १९॥"},{"id":"9.11.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/20/","page":62,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयाऽऽत्त-","लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्‍नः।","रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः","किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः॥ २०"],"iast":["nedaṃ yaśo raghupateḥ surayācñayā''tta-","līlātanoradhikasāmyavimuktadhāmnaḥ|","rakṣovadho jaladhibandhanamastrapūgaiḥ","kiṃ tasya śatruhanane kapayaḥ sahāyāḥ|| 20"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान्‌के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकता है। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीला-विग्रह धारण किया था। ऐसी स्थितिमें रघुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीरामके लिये यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार डाला या समुद्रपर पुल बाँध दिया। भला, उन्हें शत्रुओंको मारनेके लिये बंदरोंकी सहायताकी भी आवश्यकता थी क्या? यह सब उनकी लीला ही है॥ २०॥"},{"id":"9.11.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/21/","page":63,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यस्यामलं नृपसदस्सु यशोऽधुनापि","गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम्।","तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट-","पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये॥ २१"],"iast":["yasyāmalaṃ nṛpasadassu yaśo'dhunāpi","gāyantyaghaghnamṛṣayo digibhendrapaṭṭam|","taṃ nākapālavasupālakirīṭajuṣṭa-","pādāmbujaṃ raghupatiṃ śaraṇaṃ prapadye|| 21"],"meaning":"भगवान् श्रीरामका निर्मल यश समस्त पापोंको नष्ट कर देनेवाला है। वह इतना फैल गया है कि दिग्गजोंका श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलतासे चमक उठता है। आज भी बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि राजाओंकी सभामें उसका गान करते रहते हैं। स्वर्गके देवता और पृथ्वीके नरपति अपने कमनीय किरीटोंसे उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। मैं उन्हीं रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ २१॥"},{"id":"9.11.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/22/","page":63,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा।","कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ २२"],"iast":["sa yaiḥ spṛṣṭo'bhidṛṣṭo vā saṃviṣṭo'nugato'pi vā|","kosalāste yayuḥ sthānaṃ yatra gacchanti yoginaḥ|| 22"],"meaning":"जिन्होंने भगवान् श्रीरामका दर्शन और स्पर्श किया, उनका सहवास अथवा अनुगमन किया—वे सब-के-सब तथा कोसलदेशके निवासी भी उसी लोकमें गये, जहाँ बड़े-बड़े योगी योग-साधनाके द्वारा जाते हैं॥ २२॥"},{"id":"9.11.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/23/","page":63,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन्।","आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते॥ २३"],"iast":["puruṣo rāmacaritaṃ śravaṇairupadhārayan|","ānṛśaṃsyaparo rājan karmabandhairvimucyate|| 23"],"meaning":"जो पुरुष अपने कानोंसे भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनता है—उसे सरलता, कोमलता आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है। परीक्षित्! केवल इतना ही नहीं, वह समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥ २३॥"},{"id":"9.11.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/24/","page":63,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कथं स भगवान् रामो भ्रातॄन् वा स्वयमात्मनः।","तस्मिन् वा तेऽन्ववर्तन्त प्रजाः पौराश्‍च ईश्‍वरे॥ २४"],"iast":["kathaṃ sa bhagavān rāmo bhrātṝn vā svayamātmanaḥ|","tasmin vā te'nvavartanta prajāḥ paurāśca īśvare|| 24"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवान् श्रीराम स्वयं अपने भाइयोंके साथ किस प्रकारका व्यवहार करते थे? तथा भरत आदि भाई, प्रजाजन और अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके प्रति कैसा बर्ताव करते थे?॥ २४॥"},{"id":"9.11.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/25/","page":63,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथादिशद् दिग्विजये भ्रातॄंस्त्रिभुवनेश्‍वरः।","आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैक्षत सानुगः॥ २५"],"iast":["athādiśad digvijaye bhrātṝṃstribhuvaneśvaraḥ|","ātmānaṃ darśayan svānāṃ purīmaikṣata sānugaḥ|| 25"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—त्रिभुवनपति महाराज श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार करनेके बाद अपने भाइयोंको दिग्विजयकी आज्ञा दी और स्वयं अपने निजजनोंको दर्शन देते हुए अपने अनुचरोंके साथ वे पुरीकी देख-रेख करने लगे॥ २५॥"},{"id":"9.11.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/26/","page":63,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["आसिक्तमार्गां गन्धोदैः करिणां मदशीकरैः।","स्वामिनं प्राप्तमालोक्य मत्तां वा सुतरामिव॥ २६"],"iast":["āsiktamārgāṃ gandhodaiḥ kariṇāṃ madaśīkaraiḥ|","svāminaṃ prāptamālokya mattāṃ vā sutarāmiva|| 26"],"meaning":"उस समय अयोध्यापुरीके मार्ग सुगन्धित जल और हाथियोंके मदकणोंसे सिंचे रहते। ऐसा जान पड़ता, मानो यह नगरी अपने स्वामी भगवान् श्रीरामको देखकर अत्यन्त मतवाली हो रही है॥ २६॥"},{"id":"9.11.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/27/","page":63,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["प्रासादगोपुरसभाचैत्यदेवगृहादिषु ।","विन्यस्तहेमकलशैः पताकाभिश्‍च मण्डिताम्॥ २७"],"iast":["prāsādagopurasabhācaityadevagṛhādiṣu |","vinyastahemakalaśaiḥ patākābhiśca maṇḍitām|| 27"],"meaning":"उसके महल, फाटक, सभाभवन, विहार और देवालय आदिमें सुवर्णके कलश रखे हुऐ थे और स्थान-स्थानपर पताकाएँ फहरा रही थीं॥ २७॥"},{"id":"9.11.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/28/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["पूगैः सवृन्तै रम्भाभिः पट्टिकाभिः सुवाससाम्।","आदर्शैरंशुकैः स्रग्भिः कृतकौतुकतोरणाम्॥ २८"],"iast":["pūgaiḥ savṛntai rambhābhiḥ paṭṭikābhiḥ suvāsasām|","ādarśairaṃśukaiḥ sragbhiḥ kṛtakautukatoraṇām|| 28"],"meaning":"वह डंठलसमेत सुपारी, केलेके खंभे और सुन्दर वस्त्रोंके पट्टोंसे सजायी हुई थी। दर्पण, वस्त्र और पुष्पमालाओंसे तथा मांगलिक चित्रकारियों और बंदनवारोंसे सारी नगरी जगमगा रही थी॥ २८॥"},{"id":"9.11.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/29/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तमुपेयुस्तत्र तत्र पौरा अर्हणपाणयः।","आशिषो युयुजुर्देव पाहीमां प्राक् त्वयोद‍्धृताम्॥ २९"],"iast":["tamupeyustatra tatra paurā arhaṇapāṇayaḥ|","āśiṣo yuyujurdeva pāhīmāṃ prāk tvayoddhṛtām|| 29"],"meaning":"नगरवासी अपने हाथोंमें तरह-तरहकी भेंटें लेकर भगवान्‌के पास आते और उनसे प्रार्थना करते कि ‘देव! पहले आपने ही वराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार किया था; अब आप ही इसका पालन कीजिये॥ २९॥"},{"id":"9.11.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/30/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतं","दिदृक्षयोत्सृष्टगृहाः स्त्रियो नराः।","आरुह्य हर्म्याण्यरविन्दलोचन-","मतृप्तनेत्राः कुसुमैरवाकिरन्॥ ३०"],"iast":["tataḥ prajā vīkṣya patiṃ cirāgataṃ","didṛkṣayotsṛṣṭagṛhāḥ striyo narāḥ|","āruhya harmyāṇyaravindalocana-","matṛptanetrāḥ kusumairavākiran|| 30"],"meaning":"परीक्षित्! उस समय जब प्रजाको मालूम होता कि बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीरामजी इधर पधारे हैं, तब सभी स्त्री-पुरुष उनके दर्शनकी लालसासे घर-द्वार छोड़कर दौड़ पड़ते। वे ऊँची-ऊँची अटारियोंपर चढ़ जाते और अतृप्त नेत्रोंसे कमलनयन भगवान्‌को देखते हुए उनपर पुष्पोंकी वर्षा करते॥ ३०॥"},{"id":"9.11.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/31/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथ प्रविष्टः स्वगृहं जुष्टं स्वैः पूर्वराजभिः।","अनन्ताखिलकोशाढ्यमनर्घ्योरुपरिच्छदम्॥ ३१"],"iast":["atha praviṣṭaḥ svagṛhaṃ juṣṭaṃ svaiḥ pūrvarājabhiḥ|","anantākhilakośāḍhyamanarghyoruparicchadam|| 31"],"meaning":"इस प्रकार प्रजाका निरीक्षण करके भगवान् फिर अपने महलोंमें आ जाते । उनके वे महल पूर्ववर्ती राजाओंके द्वारा सेवित थे। उनमें इतने बड़े-बड़े सब प्रकारके खजाने थे, जो कभी समाप्त नहीं होते थे। वे बड़ी-बड़ी बहुमूल्य बहुत-सी सामग्रियोंसे सुसज्जित थे॥ ३१॥"},{"id":"9.11.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/32/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विद्रुमोदुम्बरद्वारैर्वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तिभिः ।","स्थलैर्मारकतैः स्वच्छैर्भातस्फटिकभित्तिभिः॥ ३२"],"iast":["vidrumodumbaradvārairvaidūryastambhapaṅktibhiḥ |","sthalairmārakataiḥ svacchairbhātasphaṭikabhittibhiḥ|| 32"],"meaning":"महलोंके द्वार तथा देहलियाँ मूँगेकी बनी हुई थीं। उनमें जो खंभे थे, वे वैदूर्यमणिके थे। मरकतमणिके बड़े सुन्दर-सुन्दर फर्श थे, तथा स्फटिकमणिकी दीवारें चमकती रहती थीं॥ ३२॥"},{"id":"9.11.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/33/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["चित्रस्रग्भिः पट्टिकाभिर्वासोमणिगणांशुकैः।","मुक्ताफलैश्‍चिदुल्लासैः कान्तकामोपपत्तिभिः॥ ३३"],"iast":["citrasragbhiḥ paṭṭikābhirvāsomaṇigaṇāṃśukaiḥ|","muktāphalaiścidullāsaiḥ kāntakāmopapattibhiḥ|| 33"],"meaning":"रंग-बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल मोती, सुन्दर-सुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे। आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री-पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"9.11.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/34/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["धूपदीपैः सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डनैः।","स्त्रीपुम्भिः सुरसंकाशैर्जुष्टं भूषणभूषणैः॥ ३४"],"iast":["dhūpadīpaiḥ surabhibhirmaṇḍitaṃ puṣpamaṇḍanaiḥ|","strīpumbhiḥ surasaṃkāśairjuṣṭaṃ bhūṣaṇabhūṣaṇaiḥ|| 34"],"meaning":"रंग-बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल मोती, सुन्दर-सुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे। आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री-पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३३-३४॥","meaning_covers":[33,34]},{"id":"9.11.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/35/","page":64,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तस्मिन् स भगवान् रामः स्निग्धया प्रिययेष्टया।","रेमे स्वारामधीराणामृषभः सीतया किल॥ ३५"],"iast":["tasmin sa bhagavān rāmaḥ snigdhayā priyayeṣṭayā|","reme svārāmadhīrāṇāmṛṣabhaḥ sītayā kila|| 35"],"meaning":"परीक्षित्! भगवान् श्रीरामजी आत्माराम जितेन्द्रिय पुरुषोंके शिरोमणि थे। उसी महलमें वे अपनी प्राणप्रिया प्रेममयी पत्‍नी श्रीसीताजीके साथ विहार करते थे॥ ३५॥"},{"id":"9.11.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/11/36/","page":65,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["बुभुजे च यथाकालं कामान् धर्ममपीडयन्।","वर्षपूगान् बहून् नॄणामभिध्याताङ्‌घ्रिपल्लवः॥ ३६"],"iast":["bubhuje ca yathākālaṃ kāmān dharmamapīḍayan|","varṣapūgān bahūn nṝṇāmabhidhyātāṅghripallavaḥ|| 36"],"meaning":"सभी स्त्री-पुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, वे ही भगवान् श्रीराम बहुत वर्षोंतक धर्मकी मर्यादाका पालन करते हुए समयानुसार भोगोंका उपभोग करते रहे॥ ३६॥"}],"text":[{"b":25658,"kind":"adhyaya_heading","page":60,"text":"अथैकादशोऽध्यायः"},{"b":25659,"kind":"topic_heading","page":60,"text":"भगवान् श्रीरामकी शेष लीलाओंका वर्णन"},{"b":25660,"kind":"topic_heading","page":60,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25661,"kind":"sanskrit_shloka","page":60,"verses":["9.11.1"],"text":"भगवानात्मनाऽऽत्मानं राम उत्तमकल्पकैः।"},{"b":25662,"kind":"hindi_commentary","page":60,"verses":["9.11.1"],"text":"सर्वदेवमयं देवमीज आचार्यवान् मखैः॥ १"},{"b":25663,"kind":"hindi_commentary","page":60,"verses":["9.11.2"],"text":"होत्रेऽददाद् दिशं प्राचीं ब्रह्मणे दक्षिणां प्रभुः।"},{"b":25664,"kind":"sanskrit_shloka","page":60,"verses":["9.11.2"],"text":"अध्वर्यवे प्रतीचीं च उदीचीं सामगाय सः॥ २"},{"b":25665,"kind":"sanskrit_shloka","page":60,"verses":["9.11.3"],"text":"आचार्याय ददौ शेषां यावती भूस्तदन्तरा।"},{"b":25666,"kind":"sanskrit_shloka","page":60,"verses":["9.11.3"],"text":"मन्यमान इदं कृत्स्नं ब्राह्मणोऽर्हति निःस्पृहः॥ ३"},{"b":25667,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.4"],"text":"इत्ययं तदलंकारवासोभ्यामवशेषितः।"},{"b":25668,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.4"],"text":"तथा राज्ञ्यपि वैदेही सौमंगल्यावशेषिता॥ ४"},{"b":25669,"kind":"hindi_commentary","page":60,"explains":["9.11.1","9.11.2","9.11.3","9.11.4"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीरामने गुरु वसिष्ठजीको अपना आचार्य बनाकर उत्तम सामग्रियोंसे युक्त यज्ञोंके द्वारा अपने-आप ही अपने सर्वदेवस्वरूप स्वयंप्रकाश आत्माका यजन किया॥ १॥ उन्होंने होताको पूर्व दिशा, ब्रह्माको दक्षिण, अध्वर्युको पश्‍चिम और उद्गाताको उत्तर दिशा दे दी॥ २॥ उनके बीचमें जितनी भूमि बच रही थी, वह उन्होंने आचार्यको दे दी। उनका यह निश्‍चय था कि सम्पूर्ण भूमण्डलका एकमात्र अधिकारी निःस्पृह ब्राह्मण ही है॥ ३॥ इस प्रकार सारे भूमण्डलका दान करके उन्होंने अपने शरीरके वस्त्र और अलंकार ही अपने पास रखे। इसी प्रकार महारानी सीताजीके पास भी केवल मांगलिक वस्त्र और आभूषण ही बच रहे॥ ४॥"},{"b":25672,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.5"],"text":"ते तु ब्रह्मण्यदेवस्य वात्सल्यं वीक्ष्य संस्तुतम्।"},{"b":25673,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.5"],"text":"प्रीताः क्लिन्‍नधियस्तस्मै प्रत्यर्प्येदं बभाषिरे॥ ५"},{"b":25674,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.6"],"text":"अप्रत्तं नस्त्वया किं नु भगवन् भुवनेश्‍वर।"},{"b":25675,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.6"],"text":"यन्‍नोऽन्तर्हृदयं विश्य तमो हंसि स्वरोचिषा॥ ६"},{"b":25676,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.7"],"text":"नमो ब्रह्मण्यदेवाय रामायाकुण्ठमेधसे।"},{"b":25677,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.7"],"text":"उत्तमश्‍लोकधुर्याय न्यस्तदण्डार्पिताङ्‌घ्र‌ये॥ ७"},{"b":25678,"kind":"hindi_commentary","page":61,"explains":["9.11.5","9.11.6","9.11.7"],"text":"जब आचार्य आदि ब्राह्मणोंने देखा कि भगवान् श्रीराम तो ब्राह्मणोंको ही अपना इष्टदेव मानते हैं, उनके हृदयमें ब्राह्मणोंके प्रति अनन्त स्नेह है, तब उनका हृदय प्रेमसे द्रवित हो गया। उन्होंने प्रसन्‍न होकर सारी पृथ्वी भगवान्‌को लौटा दी और कहा॥ ५॥ ‘प्रभो! आप सब लोकोंके एकमात्र स्वामी हैं। आप तो हमारे हृदयके भीतर रहकर अपनी ज्योतिसे अज्ञानान्धकारका नाश कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें भला, आपने हमें क्या नहीं दे रखा है॥ ६॥ आपका ज्ञान अनन्त है। पवित्र कीर्तिवाले पुरुषोंमें आप सर्वश्रेष्ठ हैं। उन महात्माओंको, जो किसीको किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं पहुँचाते, आपने अपने चरणकमल दे रखे हैं। ऐसा होनेपर भी आप ब्राह्मणोंको अपना इष्टदेव मानते हैं। भगवन्! आपके इस रामरूपको हम नमस्कार करते हैं’॥ ७॥"},{"b":25679,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.8"],"text":"कदाचिल्लोकजिज्ञासुर्गूढो रात्र्यामलक्षितः।"},{"b":25680,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.8"],"text":"चरन् वाचोऽशृणोद् रामो भार्यामुद्दिश्य कस्यचित्॥ ८"},{"b":25681,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.9"],"text":"नाहं बिभर्मि त्वां दुष्टामसतीं परवेश्मगाम्।"},{"b":25682,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.9"],"text":"स्त्रीलोभी बिभृयात् सीतां रामो नाहं भजे पुनः॥ ९"},{"b":25683,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.10"],"text":"इति लोकाद् बहुमुखाद् दुराराध्यादसंविदः।"},{"b":25684,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.10"],"text":"पत्या भीतेन सा त्यक्ता प्राप्ता प्राचेतसाश्रमम्॥ १०"},{"b":25685,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.11"],"text":"अन्तर्वत्‍न्यागते काले यमौ सा सुषुवे सुतौ।"},{"b":25686,"kind":"sanskrit_shloka","page":61,"verses":["9.11.11"],"text":"कुशो लव इति ख्यातौ तयोश्‍चक्रे क्रिया मुनिः॥ ११"},{"b":25687,"kind":"hindi_commentary","page":61,"explains":["9.11.8","9.11.9","9.11.10","9.11.11"],"text":"परीक्षित्! एक बार अपनी प्रजाकी स्थिति जाननेके लिये भगवान् श्रीरामजी रातके समय छिपकर बिना किसीको बतलाये घूम रहे थे। उस समय उन्होंने किसीकी यह बात सुनी। वह अपनी पत्‍नीसे कह रहा था॥ ८॥ ‘अरी! तू दुष्ट और कुलटा है। तू पराये घरमें रह आयी है। स्त्री-लोभी राम भले ही सीताको रख लें, परन्तु मैं तुझे फिर नहीं रख सकता’॥ ९॥ सचमुच सब लोगोंको प्रसन्‍न रखना टेढ़ी खीर है। क्योंकि मूर्खोंकी तो कमी नहीं है। जब भगवान् श्रीरामने बहुतोंके मुँहसे ऐसी बात सुनी, तो वे लोकापवादसे कुछ भयभीत-से हो गये। उन्होंने श्रीसीताजीका परित्याग कर दिया और वे वाल्मीकि मुनिके आश्रममें रहने लगीं॥ १०॥ सीताजी उस समय गर्भवती थीं। समय आनेपर उन्होंने एक साथ ही दो पुत्र उत्पन्‍न किये। उनके नाम हुए—कुश और लव। वाल्मीकि मुनिने उनके जात-कर्मादि संस्कार किये॥ ११॥"},{"b":25688,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.12"],"text":"अंगदश्‍चित्रकेतुश्‍च लक्ष्मणस्यात्मजौ स्मृतौ।"},{"b":25689,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.12"],"text":"तक्षः पुष्कल इत्यास्तां भरतस्य महीपते॥ १२"},{"b":25690,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.13"],"text":"सुबाहुः श्रुतसेनश्‍च शत्रुघ्नस्य बभूवतुः।"},{"b":25691,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.13"],"text":"गन्धर्वान् कोटिशो जघ्ने भरतो विजये दिशाम्॥ १३"},{"b":25692,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.14"],"text":"तदीयं धनमानीय सर्वं राज्ञे न्यवेदयत्।"},{"b":25693,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.14"],"text":"शत्रुघ्नश्‍च मधोः पुत्रं लवणं नाम राक्षसम्।"},{"b":25694,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.14"],"text":"हत्वा मधुवने चक्रे मथुरां नाम वै पुरीम्॥ १४"},{"b":25695,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.15"],"text":"मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता।"},{"b":25696,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.15"],"text":"ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह॥ १५"},{"b":25697,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.16"],"text":"तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्‍नपि धिया शुचः।"},{"b":25698,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.16"],"text":"स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान्‍नाशक्‍नोद् रोद्धुमीश्‍वरः॥ १६"},{"b":25699,"kind":"hindi_commentary","page":62,"verses":["9.11.17"],"text":"स्त्रीपुंप्रसंग एतादृक्सर्वत्र त्रासमावहः।"},{"b":25700,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.17"],"text":"अपीश्‍वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहचेतसः॥ १७"},{"b":25701,"kind":"hindi_translation","page":62,"explains":["9.11.12","9.11.13","9.11.14","9.11.15","9.11.16","9.11.17"],"text":"लक्ष्मणजीके दो पुत्र हुए—अंगद और चित्रकेतु। परीक्षित्! इसी प्रकार भरतजीके भी दो ही पुत्र थे—तक्ष और पुष्कल॥ १२॥ तथा शत्रुघ्नके भी दो पुत्र हुए—सुबाहु और श्रुतसेन। भरतजीने दिग्विजयमें करोड़ों गन्धर्वोंका संहार किया॥ १३॥ उन्होंने उनका सब धन लाकर अपने बड़े भाई भगवान् श्रीरामकी सेवामें निवेदन किया। शत्रुघ्नजीने मधुवनमें मधुके पुत्र लवण नामक राक्षसको मारकर वहाँ मथुरा नामकी पुरी बसायी॥ १४॥ भगवान् श्रीरामके द्वारा निर्वासित सीताजीने अपने पुत्रोंको वाल्मीकिजीके हाथोंमें सौंप दिया और भगवान् श्रीरामके चरणकमलोंका ध्यान करती हुई वे पृथ्वीदेवीके लोकमें चली गयीं॥ १५॥ यह समाचार सुनकर भगवान् श्रीरामने अपने शोका-वेशको बुद्धिके द्वारा रोकना चाहा, परन्तु परम समर्थ होनेपर भी वे उसे रोक न सके। क्योंकि उन्हें जानकीजीके पवित्र गुण बार-बार स्मरण हो आया करते थे॥ १६॥ परीक्षित्! यह स्त्री और पुरुषका सम्बन्ध सब कहीं इसी प्रकार दुःखका कारण है। यह बात बड़े-बड़े समर्थ लोगोंके विषयमें भी ऐसी ही है, फिर गृहासक्त विषयी पुरुषके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या है॥ १७॥"},{"b":25702,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.18"],"text":"तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्‍नजुहोत् प्रभुः।"},{"b":25703,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.18"],"text":"त्रयोदशाब्दसाहस्रमग्‍निहोत्रमखण्डितम्॥ १८"},{"b":25704,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.19"],"text":"स्मरतां हृदि विन्यस्य विद्धं दण्डककण्टकैः।"},{"b":25705,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.19"],"text":"स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः॥ १९"},{"b":25706,"kind":"hindi_translation","page":62,"explains":["9.11.18","9.11.19"],"text":"इसके बाद भगवान् श्रीरामने ब्रह्मचर्य धारण करके तेरह हजार वर्षतक अखण्डरूपसे अग्‍निहोत्र किया॥ १८॥ तदनन्तर अपना स्मरण करनेवाले भक्तोंके हृदयमें अपने उन चरणकमलोंको स्थापित करके, जो दण्डकवनके काँटोंसे बिंध गये थे, अपने स्वयंप्रकाश परम ज्योतिर्मय धाममें चले गये॥ १९॥"},{"b":25707,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.20"],"text":"नेदं यशो रघुपतेः सुरयाच्ञयाऽऽत्त-"},{"b":25708,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.20"],"text":"लीलातनोरधिकसाम्यविमुक्तधाम्‍नः।"},{"b":25709,"kind":"hindi_commentary","page":62,"verses":["9.11.20"],"text":"रक्षोवधो जलधिबन्धनमस्त्रपूगैः"},{"b":25710,"kind":"sanskrit_shloka","page":62,"verses":["9.11.20"],"text":"किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः॥ २०"},{"b":25711,"kind":"hindi_translation","page":62,"explains":["9.11.20"],"text":"परीक्षित्! भगवान्‌के समान प्रतापशाली और कोई नहीं है, फिर उनसे बढ़कर तो हो ही कैसे सकता है। उन्होंने देवताओंकी प्रार्थनासे ही यह लीला-विग्रह धारण किया था। ऐसी स्थितिमें रघुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीरामके लिये यह कोई बड़े गौरवकी बात नहीं है कि उन्होंने अस्त्र-शस्त्रोंसे राक्षसोंको मार डाला या समुद्रपर पुल बाँध दिया। भला, उन्हें शत्रुओंको मारनेके लिये बंदरोंकी सहायताकी भी आवश्यकता थी क्या? यह सब उनकी लीला ही है॥ २०॥"},{"b":25712,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.21"],"text":"यस्यामलं नृपसदस्सु यशोऽधुनापि"},{"b":25713,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.21"],"text":"गायन्त्यघघ्नमृषयो दिगिभेन्द्रपट्टम्।"},{"b":25714,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.21"],"text":"तं नाकपालवसुपालकिरीटजुष्ट-"},{"b":25715,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.21"],"text":"पादाम्बुजं रघुपतिं शरणं प्रपद्ये॥ २१"},{"b":25716,"kind":"hindi_commentary","page":63,"explains":["9.11.21"],"text":"भगवान् श्रीरामका निर्मल यश समस्त पापोंको नष्ट कर देनेवाला है। वह इतना फैल गया है कि दिग्गजोंका श्यामल शरीर भी उसकी उज्ज्वलतासे चमक उठता है। आज भी बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि राजाओंकी सभामें उसका गान करते रहते हैं। स्वर्गके देवता और पृथ्वीके नरपति अपने कमनीय किरीटोंसे उनके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। मैं उन्हीं रघुवंशशिरोमणि भगवान् श्रीरामचन्द्रकी शरण ग्रहण करता हूँ॥ २१॥"},{"b":25717,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.22"],"text":"स यैः स्पृष्टोऽभिदृष्टो वा संविष्टोऽनुगतोऽपि वा।"},{"b":25718,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.22"],"text":"कोसलास्ते ययुः स्थानं यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ २२"},{"b":25719,"kind":"hindi_translation","page":63,"explains":["9.11.22"],"text":"जिन्होंने भगवान् श्रीरामका दर्शन और स्पर्श किया, उनका सहवास अथवा अनुगमन किया—वे सब-के-सब तथा कोसलदेशके निवासी भी उसी लोकमें गये, जहाँ बड़े-बड़े योगी योग-साधनाके द्वारा जाते हैं॥ २२॥"},{"b":25720,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.23"],"text":"पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन्।"},{"b":25721,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.23"],"text":"आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते॥ २३"},{"b":25722,"kind":"hindi_commentary","page":63,"explains":["9.11.23"],"text":"जो पुरुष अपने कानोंसे भगवान् श्रीरामका चरित्र सुनता है—उसे सरलता, कोमलता आदि गुणोंकी प्राप्ति होती है। परीक्षित्! केवल इतना ही नहीं, वह समस्त कर्म-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥ २३॥"},{"b":25723,"kind":"topic_heading","page":63,"text":"राजोवाच"},{"b":25724,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.24"],"text":"कथं स भगवान् रामो भ्रातॄन् वा स्वयमात्मनः।"},{"b":25725,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.24"],"text":"तस्मिन् वा तेऽन्ववर्तन्त प्रजाः पौराश्‍च ईश्‍वरे॥ २४"},{"b":25726,"kind":"hindi_commentary","page":63,"explains":["9.11.24"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवान् श्रीराम स्वयं अपने भाइयोंके साथ किस प्रकारका व्यवहार करते थे? तथा भरत आदि भाई, प्रजाजन और अयोध्यावासी भगवान् श्रीरामके प्रति कैसा बर्ताव करते थे?॥ २४॥"},{"b":25727,"kind":"topic_heading","page":63,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":25728,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.25"],"text":"अथादिशद् दिग्विजये भ्रातॄंस्त्रिभुवनेश्‍वरः।"},{"b":25729,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.25"],"text":"आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैक्षत सानुगः॥ २५"},{"b":25730,"kind":"hindi_commentary","page":63,"explains":["9.11.25"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—त्रिभुवनपति महाराज श्रीरामने राजसिंहासन स्वीकार करनेके बाद अपने भाइयोंको दिग्विजयकी आज्ञा दी और स्वयं अपने निजजनोंको दर्शन देते हुए अपने अनुचरोंके साथ वे पुरीकी देख-रेख करने लगे॥ २५॥"},{"b":25731,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.26"],"text":"आसिक्तमार्गां गन्धोदैः करिणां मदशीकरैः।"},{"b":25732,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.26"],"text":"स्वामिनं प्राप्तमालोक्य मत्तां वा सुतरामिव॥ २६"},{"b":25733,"kind":"hindi_translation","page":63,"explains":["9.11.26"],"text":"उस समय अयोध्यापुरीके मार्ग सुगन्धित जल और हाथियोंके मदकणोंसे सिंचे रहते। ऐसा जान पड़ता, मानो यह नगरी अपने स्वामी भगवान् श्रीरामको देखकर अत्यन्त मतवाली हो रही है॥ २६॥"},{"b":25734,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.27"],"text":"प्रासादगोपुरसभाचैत्यदेवगृहादिषु ।"},{"b":25735,"kind":"sanskrit_shloka","page":63,"verses":["9.11.27"],"text":"विन्यस्तहेमकलशैः पताकाभिश्‍च मण्डिताम्॥ २७"},{"b":25736,"kind":"hindi_commentary","page":63,"explains":["9.11.27"],"text":"उसके महल, फाटक, सभाभवन, विहार और देवालय आदिमें सुवर्णके कलश रखे हुऐ थे और स्थान-स्थानपर पताकाएँ फहरा रही थीं॥ २७॥"},{"b":25737,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.28"],"text":"पूगैः सवृन्तै रम्भाभिः पट्टिकाभिः सुवाससाम्।"},{"b":25738,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.28"],"text":"आदर्शैरंशुकैः स्रग्भिः कृतकौतुकतोरणाम्॥ २८"},{"b":25739,"kind":"hindi_commentary","page":64,"verses":["9.11.29"],"text":"तमुपेयुस्तत्र तत्र पौरा अर्हणपाणयः।"},{"b":25740,"kind":"hindi_commentary","page":64,"verses":["9.11.29"],"text":"आशिषो युयुजुर्देव पाहीमां प्राक् त्वयोद‍्धृताम्॥ २९"},{"b":25741,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.30"],"text":"ततः प्रजा वीक्ष्य पतिं चिरागतं"},{"b":25742,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.30"],"text":"दिदृक्षयोत्सृष्टगृहाः स्त्रियो नराः।"},{"b":25743,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.30"],"text":"आरुह्य हर्म्याण्यरविन्दलोचन-"},{"b":25744,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.30"],"text":"मतृप्तनेत्राः कुसुमैरवाकिरन्॥ ३०"},{"b":25745,"kind":"hindi_translation","page":64,"explains":["9.11.28","9.11.29","9.11.30"],"text":"वह डंठलसमेत सुपारी, केलेके खंभे और सुन्दर वस्त्रोंके पट्टोंसे सजायी हुई थी। दर्पण, वस्त्र और पुष्पमालाओंसे तथा मांगलिक चित्रकारियों और बंदनवारोंसे सारी नगरी जगमगा रही थी॥ २८॥ नगरवासी अपने हाथोंमें तरह-तरहकी भेंटें लेकर भगवान्‌के पास आते और उनसे प्रार्थना करते कि ‘देव! पहले आपने ही वराहरूपसे पृथ्वीका उद्धार किया था; अब आप ही इसका पालन कीजिये॥ २९॥ परीक्षित्! उस समय जब प्रजाको मालूम होता कि बहुत दिनोंके बाद भगवान् श्रीरामजी इधर पधारे हैं, तब सभी स्त्री-पुरुष उनके दर्शनकी लालसासे घर-द्वार छोड़कर दौड़ पड़ते। वे ऊँची-ऊँची अटारियोंपर चढ़ जाते और अतृप्त नेत्रोंसे कमलनयन भगवान्‌को देखते हुए उनपर पुष्पोंकी वर्षा करते॥ ३०॥"},{"b":25746,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.31"],"text":"अथ प्रविष्टः स्वगृहं जुष्टं स्वैः पूर्वराजभिः।"},{"b":25747,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.31"],"text":"अनन्ताखिलकोशाढ्यमनर्घ्योरुपरिच्छदम्॥ ३१"},{"b":25748,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.32"],"text":"विद्रुमोदुम्बरद्वारैर्वैदूर्यस्तम्भपङ्क्तिभिः ।"},{"b":25749,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.32"],"text":"स्थलैर्मारकतैः स्वच्छैर्भातस्फटिकभित्तिभिः॥ ३२"},{"b":25750,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.33"],"text":"चित्रस्रग्भिः पट्टिकाभिर्वासोमणिगणांशुकैः।"},{"b":25751,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.33"],"text":"मुक्ताफलैश्‍चिदुल्लासैः कान्तकामोपपत्तिभिः॥ ३३"},{"b":25752,"kind":"hindi_commentary","page":64,"verses":["9.11.34"],"text":"धूपदीपैः सुरभिभिर्मण्डितं पुष्पमण्डनैः।"},{"b":25753,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.34"],"text":"स्त्रीपुम्भिः सुरसंकाशैर्जुष्टं भूषणभूषणैः॥ ३४"},{"b":25754,"kind":"hindi_translation","page":64,"explains":["9.11.31","9.11.32","9.11.33","9.11.34"],"text":"इस प्रकार प्रजाका निरीक्षण करके भगवान् फिर अपने महलोंमें आ जाते । उनके वे महल पूर्ववर्ती राजाओंके द्वारा सेवित थे। उनमें इतने बड़े-बड़े सब प्रकारके खजाने थे, जो कभी समाप्त नहीं होते थे। वे बड़ी-बड़ी बहुमूल्य बहुत-सी सामग्रियोंसे सुसज्जित थे॥ ३१॥ महलोंके द्वार तथा देहलियाँ मूँगेकी बनी हुई थीं। उनमें जो खंभे थे, वे वैदूर्यमणिके थे। मरकतमणिके बड़े सुन्दर-सुन्दर फर्श थे, तथा स्फटिकमणिकी दीवारें चमकती रहती थीं॥ ३२॥ रंग-बिरंगी मालाओं, पताकाओं, मणियोंकी चमक, शुद्ध चेतनके समान उज्ज्वल मोती, सुन्दर-सुन्दर भोग-सामग्री, सुगन्धित धूप-दीप तथा फूलोंके गहनोंसे वे महल खूब सजाये हुए थे। आभूषणोंको भी भूषित करनेवाले देवताओंके समान स्त्री-पुरुष उसकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३३-३४॥"},{"b":25755,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.35"],"text":"तस्मिन् स भगवान् रामः स्निग्धया प्रिययेष्टया।"},{"b":25756,"kind":"sanskrit_shloka","page":64,"verses":["9.11.35"],"text":"रेमे स्वारामधीराणामृषभः सीतया किल॥ ३५"},{"b":25757,"kind":"hindi_commentary","page":64,"explains":["9.11.35"],"text":"परीक्षित्! भगवान् श्रीरामजी आत्माराम जितेन्द्रिय पुरुषोंके शिरोमणि थे। उसी महलमें वे अपनी प्राणप्रिया प्रेममयी पत्‍नी श्रीसीताजीके साथ विहार करते थे॥ ३५॥"},{"b":25758,"kind":"sanskrit_shloka","page":65,"verses":["9.11.36"],"text":"बुभुजे च यथाकालं कामान् धर्ममपीडयन्।"},{"b":25759,"kind":"sanskrit_shloka","page":65,"verses":["9.11.36"],"text":"वर्षपूगान् बहून् नॄणामभिध्याताङ्‌घ्रिपल्लवः॥ ३६"},{"b":25760,"kind":"hindi_translation","page":65,"explains":["9.11.36"],"text":"सभी स्त्री-पुरुष जिनके चरणकमलोंका ध्यान करते रहते हैं, वे ही भगवान् श्रीराम बहुत वर्षोंतक धर्मकी मर्यादाका पालन करते हुए समयानुसार भोगोंका उपभोग करते रहे॥ ३६॥"},{"b":25761,"kind":"hindi_translation","page":65,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीरामोपाख्याने एकादशोऽध्यायः॥ ११॥"}],"notes":[{"id":"v2:95","mark":"३","page":60,"after_verse":"9.11.1","text":"कल्पकः।"},{"id":"v2:96","mark":"४","page":60,"after_verse":"9.11.1","text":"मयो।"},{"id":"v2:97","mark":"५","page":60,"after_verse":"9.11.2","text":"होत्रे तदादिशत्प्राचीं।"},{"id":"v2:98","mark":"१","page":62,"after_verse":"9.11.12","text":"दश्‍चन्द्रके०।"},{"id":"v2:99","mark":"२","page":62,"after_verse":"9.11.17","text":"सर्वत्रोत्तापमावहत्।"},{"id":"v2:100","mark":"३","page":62,"after_verse":"9.11.20","text":"स्त्रपाणेः।"},{"id":"v2:101","mark":"१","page":64,"after_verse":"9.11.29","text":"युस्ततस्तत्र।"},{"id":"v2:102","mark":"२","page":64,"after_verse":"9.11.29","text":"त्वयाऽऽवृताम्।"},{"id":"v2:103","mark":"३","page":64,"after_verse":"9.11.34","text":"मण्डलैः।"}],"corrections":{"count":0,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}