{"id":"7.10","title":"सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10","part":"सप्तम स्कन्ध","heading":"अथ दशमोऽध्यायः","topics":["प्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[867,874]},"verses":[{"id":"7.10.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/1/","page":867,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["भक्तियोगस्य तत् सर्वमन्तरायतयार्भकः।","मन्यमानो हृषीकेशं स्मयमान उवाच ह॥ १"],"iast":["bhaktiyogasya tat sarvamantarāyatayārbhakaḥ|","manyamāno hṛṣīkeśaṃ smayamāna uvāca ha|| 1"],"meaning":"नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीने बालक होनेपर भी यही समझा कि वरदान माँगना प्रेम-भक्तिका विघ्न है; इसलिये कुछ मुसकराते हुए वे भगवान्‌से बोले॥ १॥"},{"id":"7.10.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/2/","page":867,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["मा मां प्रलोभयोत्पत्त्याऽऽसक्तं कामेषु तैर्वरैः।","तत्सङ्गभीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाश्रितः॥ २"],"iast":["mā māṃ pralobhayotpattyā''saktaṃ kāmeṣu tairvaraiḥ|","tatsaṅgabhīto nirviṇṇo mumukṣustvāmupāśritaḥ|| 2"],"meaning":"प्रह्लादजीने कहा—प्रभो! मैं जन्मसे ही विषय-भोगोंमें आसक्त हूँ, अब मुझे इन वरोंके द्वारा आप लुभाइये नहीं। मैं उन भोगोंके संगसे डरकर, उनके द्वारा होनेवाली तीव्र वेदनाका अनुभव कर उनसे छूटनेकी अभिलाषासे ही आपकी शरणमें आया हूँ॥ २॥"},{"id":"7.10.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/3/","page":867,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["भृत्यलक्षणजिज्ञासुर्भक्तं कामेष्वचोदयत्।","भवान् संसारबीजेषु हृदयग्रन्थिषु प्रभो॥ ३"],"iast":["bhṛtyalakṣaṇajijñāsurbhaktaṃ kāmeṣvacodayat|","bhavān saṃsārabījeṣu hṛdayagranthiṣu prabho|| 3"],"meaning":"भगवन्! मुझमें भक्तके लक्षण हैं या नहीं—यह जाननेके लिये आपने अपने भक्तको वरदान माँगनेकी ओर प्रेरित किया है। ये विषय-भोग हृदयकी गाँठको और भी मजबूत करनेवाले तथा बार-बार जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले हैं॥ ३॥"},{"id":"7.10.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/4/","page":867,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत करुणात्मनः।","यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्॥ ४"],"iast":["nānyathā te'khilaguro ghaṭeta karuṇātmanaḥ|","yasta āśiṣa āśāste na sa bhṛtyaḥ sa vai vaṇik|| 4"],"meaning":"जगद‍्गुरो! परीक्षाके सिवा ऐसा कहनेका और कोई कारण नहीं दीखता; क्योंकि आप परम दयालु हैं। (अपने भक्तको भोगोंमें फँसानेवाला वर कैसे दे सकते हैं?) आपसे जो सेवक अपनी कामनाएँ पूर्ण करना चाहता है, वह सेवक नहीं; वह तो लेन-देन करनेवाला निरा बनिया है॥ ४॥"},{"id":"7.10.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/5/","page":867,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["आशासानो न वै भृत्यः स्वामिन्याशिष आत्मनः।","न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन् यो राति चाशिषः॥ ५"],"iast":["āśāsāno na vai bhṛtyaḥ svāminyāśiṣa ātmanaḥ|","na svāmī bhṛtyataḥ svāmyamicchan yo rāti cāśiṣaḥ|| 5"],"meaning":"जो स्वामीसे अपनी कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवकसे सेवा करानेके लिये, उसका स्वामी बननेके लिये उसकी कामनाएँ पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं॥ ५॥"},{"id":"7.10.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/6/","page":867,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["अहं त्वकामस्त्वद्भक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रयः।","नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव॥ ६"],"iast":["ahaṃ tvakāmastvadbhaktastvaṃ ca svāmyanapāśrayaḥ|","nānyathehāvayorartho rājasevakayoriva|| 6"],"meaning":"मैं आपका निष्काम सेवक हूँ और आप मेरे निरपेक्ष स्वामी हैं। जैसे राजा और उसके सेवकोंका प्रयोजनवश स्वामी-सेवकका सम्बन्ध रहता है, वैसा तो मेरा और आपका सम्बन्ध है नहीं॥ ६॥"},{"id":"7.10.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/7/","page":867,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["यदि रासीश मे कामान् वरांस्त्वं वरदर्षभ।","कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम्॥ ७"],"iast":["yadi rāsīśa me kāmān varāṃstvaṃ varadarṣabha|","kāmānāṃ hṛdyasaṃrohaṃ bhavatastu vṛṇe varam|| 7"],"meaning":"मेरे वरदानिशिरोमणि स्वामी! यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना ही चाहते हैं तो यह वर दीजिये कि मेरे हृदयमें कभी किसी कामनाका बीज अंकुरित ही न हो॥ ७॥"},{"id":"7.10.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/8/","page":868,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः।","ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना॥ ८"],"iast":["indriyāṇi manaḥ prāṇa ātmā dharmo dhṛtirmatiḥ|","hrīḥ śrīstejaḥ smṛtiḥ satyaṃ yasya naśyanti janmanā|| 8"],"meaning":"हृदयमें किसी भी कामनाके उदय होते ही इन्द्रिय, मन, प्राण, देह, धर्म, धैर्य, बुद्धि, लज्जा, श्री, तेज, स्मृति और सत्य—ये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं॥ ८॥"},{"id":"7.10.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/9/","page":868,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["विमुञ्चति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान्।","तर्ह्येव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते॥ ९"],"iast":["vimuñcati yadā kāmānmānavo manasi sthitān|","tarhyeva puṇḍarīkākṣa bhagavattvāya kalpate|| 9"],"meaning":"कमलनयन! जिस समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है॥ ९॥"},{"id":"7.10.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/10/","page":868,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["नमो भगवते तुभ्यं पुरुषाय महात्मने।","हरयेऽद्भुतसिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने॥ १०"],"iast":["namo bhagavate tubhyaṃ puruṣāya mahātmane|","haraye'dbhutasiṃhāya brahmaṇe paramātmane|| 10"],"meaning":"भगवन्! आपको नमस्कार है। आप सबके हृदयमें विराजमान, उदारशिरोमणि स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं। अद्भुत नृसिंहरूपधारी श्रीहरिके चरणोंमें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ॥ १०॥"},{"id":"7.10.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/11/","page":868,"speaker":"नृसिंह उवाच","sanskrit":["नैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिष","आशासतेऽमुत्र च ये भवद्विधाः।","अथापि मन्वन्तरमेतदत्र","दैत्येश्‍वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्॥ ११"],"iast":["naikāntino me mayi jātvihāśiṣa","āśāsate'mutra ca ye bhavadvidhāḥ|","athāpi manvantarametadatra","daityeśvarāṇāmanubhuṅkṣva bhogān|| 11"],"meaning":"श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—प्रह्लाद! तुम्हारे-जैसे मेरे एकान्तप्रेमी इस लोक अथवा परलोककी किसी भी वस्तुके लिये कभी कोई कामना नहीं करते। फिर भी अधिक नहीं, केवल एक मन्वन्तरतक मेरी प्रसन्‍नताके लिये तुम इस लोकमें दैत्याधिपतियोंके समस्त भोग स्वीकार कर लो॥ ११॥"},{"id":"7.10.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/12/","page":868,"speaker":"नृसिंह उवाच","sanskrit":["कथा मदीया जुषमाणः प्रियास्त्व-","मावेश्य मामात्मनि सन्तमेकम्।","सर्वेषु भूतेष्वधियज्ञमीशं","यजस्व योगेन च कर्म हिन्वन्॥ १२"],"iast":["kathā madīyā juṣamāṇaḥ priyāstva-","māveśya māmātmani santamekam|","sarveṣu bhūteṣvadhiyajñamīśaṃ","yajasva yogena ca karma hinvan|| 12"],"meaning":"समस्त प्राणियोंके हृदयमें यज्ञोंके भोक्ता ईश्‍वरके रूपमें मैं ही विराजमान हूँ। तुम अपने हृदयमें मुझे देखते रहना और मेरी लीला-कथाएँ, जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं, सुनते रहना। समस्त कर्मोंके द्वारा मेरी ही आराधना करना और इस प्रकार अपने प्रारब्ध-कर्मका क्षय कर देना॥ १२॥"},{"id":"7.10.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/13/","page":868,"speaker":"नृसिंह उवाच","sanskrit":["भोगेन पुण्यं कुशलेन पापं","कलेवरं कालजवेन हित्वा।","कीर्तिं विशुद्धां सुरलोकगीतां","विताय मामेष्यसि मुक्तबन्धः॥ १३"],"iast":["bhogena puṇyaṃ kuśalena pāpaṃ","kalevaraṃ kālajavena hitvā|","kīrtiṃ viśuddhāṃ suralokagītāṃ","vitāya māmeṣyasi muktabandhaḥ|| 13"],"meaning":"भोगके द्वारा पुण्यकर्मोंके फल और निष्काम पुण्यकर्मोंके द्वारा पापका नाश करते हुए समयपर शरीरका त्याग करके समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर तुम मेरे पास आ जाओगे। देवलोकमें भी लोग तुम्हारी विशुद्ध कीर्तिका गान करेंगे॥ १३॥"},{"id":"7.10.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/14/","page":868,"speaker":"नृसिंह उवाच","sanskrit":["य एतत् कीर्तयेन्मह्यं त्वया गीतमिदं नरः।","त्वां च मां च स्मरन्काले कर्मबन्धात् प्रमुच्यते॥ १४"],"iast":["ya etat kīrtayenmahyaṃ tvayā gītamidaṃ naraḥ|","tvāṃ ca māṃ ca smarankāle karmabandhāt pramucyate|| 14"],"meaning":"तुम्हारे द्वारा की हुई मेरी इस स्तुतिका जो मनुष्य कीर्तन करेगा और साथ ही मेरा और तुम्हारा स्मरण भी करेगा, वह समयपर कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ १४॥"},{"id":"7.10.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/15/","page":868,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["वरं वरय एतत् ते वरदेशान्महेश्‍वर।","यदनिन्दत् पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्‍वरम्॥ १५"],"iast":["varaṃ varaya etat te varadeśānmaheśvara|","yadanindat pitā me tvāmavidvāṃsteja aiśvaram|| 15"],"meaning":"प्रह्लादजीने कहा—महेश्‍वर! आप वर देनेवालोंके स्वामी हैं। आपसे मैं एक वर और माँगता हूँ। मेरे पिताने आपके ईश्‍वरीय तेजको और सर्वशक्तिमान् चराचरगुरु स्वयं आपको न जानकर आपकी बड़ी निन्दा की है। ‘इस विष्णुने मेरे भाईको मार डाला है’ ऐसी मिथ्यादृष्टि रखनेके कारण पिताजी क्रोधके वेगको सहन करनेमें असमर्थ हो गये थे। इसीसे उन्होंने आपका भक्त होनेके कारण मुझसे भी द्रोह किया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"7.10.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/16/","page":868,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["विद्धामर्षाशयः साक्षात् सर्वलोकगुरुं प्रभुम्।","भ्रातृहेति मृषादृष्टिस्त्वद्भक्ते मयि चाघवान्॥ १६"],"iast":["viddhāmarṣāśayaḥ sākṣāt sarvalokaguruṃ prabhum|","bhrātṛheti mṛṣādṛṣṭistvadbhakte mayi cāghavān|| 16"],"meaning":"प्रह्लादजीने कहा—महेश्‍वर! आप वर देनेवालोंके स्वामी हैं। आपसे मैं एक वर और माँगता हूँ। मेरे पिताने आपके ईश्‍वरीय तेजको और सर्वशक्तिमान् चराचरगुरु स्वयं आपको न जानकर आपकी बड़ी निन्दा की है। ‘इस विष्णुने मेरे भाईको मार डाला है’ ऐसी मिथ्यादृष्टि रखनेके कारण पिताजी क्रोधके वेगको सहन करनेमें असमर्थ हो गये थे। इसीसे उन्होंने आपका भक्त होनेके कारण मुझसे भी द्रोह किया॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"7.10.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/17/","page":869,"speaker":"प्रह्राद उवाच","sanskrit":["तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्।","पूतस्तेऽपाङ्गसंदृष्टस्तदा कृपणवत्सल॥ १७"],"iast":["tasmāt pitā me pūyeta durantād dustarādaghāt|","pūtaste'pāṅgasaṃdṛṣṭastadā kṛpaṇavatsala|| 17"],"meaning":"दीनबन्धो! यद्यपि आपकी दृष्टि पड़ते ही वे पवित्र हो चुके, फिर भी मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उस जल्दी नाश न होनेवाले दुस्तर दोषसे मेरे पिता शुद्ध हो जायँ॥ १७॥"},{"id":"7.10.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/18/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["त्रिःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ।","यत् साधोऽस्य गृहे जातो भवान्वै कुलपावनः॥ १८"],"iast":["triḥsaptabhiḥ pitā pūtaḥ pitṛbhiḥ saha te'nagha|","yat sādho'sya gṛhe jāto bhavānvai kulapāvanaḥ|| 18"],"meaning":"श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद! तुम्हारे पिता स्वयं पवित्र होकर तर गये, इसकी तो बात ही क्या है, यदि उनकी इक्कीस पीढ़ियोंके पितर होते तो उन सबके साथ भी वे तर जाते; क्योंकि तुम्हारे-जैसा कुलको पवित्र करनेवाला पुत्र उनको प्राप्त हुआ॥ १८॥"},{"id":"7.10.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/19/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["यत्र यत्र च मद्भक्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः।","साधवः समुदाचारास्ते पूयन्त्यपि कीकटाः॥ १९"],"iast":["yatra yatra ca madbhaktāḥ praśāntāḥ samadarśinaḥ|","sādhavaḥ samudācārāste pūyantyapi kīkaṭāḥ|| 19"],"meaning":"मेरे शान्त, समदर्शी और सुखसे सदाचार पालन करनेवाले प्रेमी भक्तजन जहाँ-जहाँ निवास करते हैं, वे स्थान चाहे कीकट ही क्यों न हों, पवित्र हो जाते हैं॥ १९॥"},{"id":"7.10.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/20/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["सर्वात्मना न हिंसन्ति भूतग्रामेषु किञ्चन।","उच्चावचेषु दैत्येन्द्र मद्भावेन गतस्पृहाः॥ २०"],"iast":["sarvātmanā na hiṃsanti bhūtagrāmeṣu kiñcana|","uccāvaceṣu daityendra madbhāvena gataspṛhāḥ|| 20"],"meaning":"दैत्यराज! मेरे भक्तिभावसे जिनकी कामनाएँ नष्ट हो गयी हैं, वे सर्वत्र आत्मभाव हो जानेके कारण छोटे-बड़े किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कष्ट नहीं पहुँचाते॥ २०॥"},{"id":"7.10.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/21/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः।","भवान्मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक्॥ २१"],"iast":["bhavanti puruṣā loke madbhaktāstvāmanuvratāḥ|","bhavānme khalu bhaktānāṃ sarveṣāṃ pratirūpadhṛk|| 21"],"meaning":"संसारमें जो लोग तुम्हारे अनुयायी होंगे, वे भी मेरे भक्त हो जायँगे। बेटा! तुम मेरे सभी भक्तोंके आदर्श हो॥ २१॥"},{"id":"7.10.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/22/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["कुरु त्वं प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः।","मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान्यास्यति सुप्रजाः॥ २२"],"iast":["kuru tvaṃ pretakāryāṇi pituḥ pūtasya sarvaśaḥ|","madaṅgasparśanenāṅga lokānyāsyati suprajāḥ|| 22"],"meaning":"यद्यपि मेरे अंगोंका स्पर्श होनेसे तुम्हारे पिता पूर्णरूपसे पवित्र हो गये हैं, तथापि तुम उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया करो। तुम्हारे-जैसी सन्तानके कारण उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी॥ २२॥"},{"id":"7.10.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/23/","page":869,"speaker":"श्रीभगवानुवाच","sanskrit":["पित्र्यं च स्थानमातिष्ठ यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः।","मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्परः॥ २३"],"iast":["pitryaṃ ca sthānamātiṣṭha yathoktaṃ brahmavādibhiḥ|","mayyāveśya manastāta kuru karmāṇi matparaḥ|| 23"],"meaning":"वत्स! तुम अपने पिताके पदपर स्थित हो जाओ और वेदवादी मुनियोंकी आज्ञाके अनुसार मुझमें अपना मन लगाकर और मेरी शरणमें रहकर मेरी सेवाके लिये ही अपने सारे कार्य करो॥ २३॥"},{"id":"7.10.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/24/","page":869,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["प्रह्रादोऽपि तथा चक्रे पितुर्यत्साम्परायिकम्।","यथाऽऽह भगवान् राजन्‍नभिषिक्तो द्विजोत्तमैः॥ २४"],"iast":["prahrādo'pi tathā cakre pituryatsāmparāyikam|","yathā''ha bhagavān rājannabhiṣikto dvijottamaiḥ|| 24"],"meaning":"नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार प्रह्लादजीने अपने पिताकी अन्त्येष्टि-क्रिया की, इसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उनका राज्याभिषेक किया॥ २४॥"},{"id":"7.10.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/25/","page":869,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["प्रसादसुमुखं दृष्ट्वा ब्रह्मा नरहरिं हरिम्।","स्तुत्वा वाग्भिः पवित्राभिः प्राह देवादिभिर्वृतः॥ २५"],"iast":["prasādasumukhaṃ dṛṣṭvā brahmā narahariṃ harim|","stutvā vāgbhiḥ pavitrābhiḥ prāha devādibhirvṛtaḥ|| 25"],"meaning":"इसी समय देवता, ऋषि आदिके साथ ब्रह्माजीने नृसिंहभगवान्‌को प्रसन्‍नवदन देखकर पवित्र वचनोंके द्वारा उनकी स्तुति की और उनसे यह बात कही॥ २५॥"},{"id":"7.10.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/26/","page":869,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["देवदेवाखिलाध्यक्ष भूतभावन पूर्वज।","दिष्ट्या ते निहतः पापो लोकसन्तापनोऽसुरः॥ २६"],"iast":["devadevākhilādhyakṣa bhūtabhāvana pūrvaja|","diṣṭyā te nihataḥ pāpo lokasantāpano'suraḥ|| 26"],"meaning":"ब्रह्माजीने कहा—देवताओंके आराध्यदेव! आप सर्वान्तर्यामी, जीवोंके जीवनदाता और मेरे भी पिता हैं। यह पापी दैत्य लोगोंको बहुत ही सता रहा था। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपने इसे मार डाला॥ २६॥"},{"id":"7.10.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/27/","page":870,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["योऽसौ लब्धवरो मत्तो न वध्यो मम सृष्टिभिः।","तपोयोगबलोन्‍नद्धः समस्तनिगमानहन्॥ २७"],"iast":["yo'sau labdhavaro matto na vadhyo mama sṛṣṭibhiḥ|","tapoyogabalonnaddhaḥ samastanigamānahan|| 27"],"meaning":"मैंने इसे वर दे दिया था कि मेरी सृष्टिका कोई भी प्राणी तुम्हारा वध न कर सकेगा। इससे यह मतवाला हो गया था। तपस्या, योग और बलके कारण उच्छृङ्खल होकर इसने वेदविधियोंका उच्छेद कर दिया था॥ २७॥"},{"id":"7.10.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/28/","page":870,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["दिष्ट्यास्य तनयः साधुर्महाभागवतोऽर्भकः।","त्वया विमोचितो मृत्योर्दिष्ट्या त्वां समितोऽधुना॥ २८"],"iast":["diṣṭyāsya tanayaḥ sādhurmahābhāgavato'rbhakaḥ|","tvayā vimocito mṛtyordiṣṭyā tvāṃ samito'dhunā|| 28"],"meaning":"यह भी बड़े सौभाग्यकी बात है कि इसके पुत्र परमभागवत शुद्धहृदय नन्हे-से शिशु प्रह्लादको आपने मृत्युके मुखसे छुड़ा दिया; तथा यह भी बड़े आनन्द और मंगलकी बात है कि वह अब आपकी शरणमें है॥ २८॥"},{"id":"7.10.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/29/","page":870,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["एतद् वपुस्ते भगवन्ध्यायतः प्रयतात्मनः।","सर्वतो गोप्तृ संत्रासान्मृत्योरपि जिघांसतः॥ २९"],"iast":["etad vapuste bhagavandhyāyataḥ prayatātmanaḥ|","sarvato goptṛ saṃtrāsānmṛtyorapi jighāṃsataḥ|| 29"],"meaning":"भगवन्! आपके इस नृसिंहरूपका ध्यान जो कोई एकाग्र मनसे करेगा, उसे यह सब प्रकारके भयोंसे बचा लेगा। यहाँतक कि मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्यु भी उसका कुछ न बिगाड़ सकेगी॥ २९॥"},{"id":"7.10.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/30/","page":870,"speaker":"नृसिंह उवाच","sanskrit":["मैवं वरोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव।","वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा॥ ३०"],"iast":["maivaṃ varo'surāṇāṃ te pradeyaḥ padmasambhava|","varaḥ krūranisargāṇāmahīnāmamṛtaṃ yathā|| 30"],"meaning":"श्रीनृसिंहभगवान् बोले—ब्रह्माजी! आप दैत्योंको ऐसा वर न दिया करें। जो स्वभावसे ही क्रूर हैं, उनको दिया हुआ वर तो वैसा ही है जैसा साँपोंको दूध पिलाना॥ ३०॥"},{"id":"7.10.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/31/","page":870,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["इत्युक्‍त्वा भगवान्राजंस्तत्रैवान्तर्दधे हरिः।","अदृश्यः सर्वभूतानां पूजितः परमेष्ठिना॥ ३१"],"iast":["ityuktvā bhagavānrājaṃstatraivāntardadhe hariḥ|","adṛśyaḥ sarvabhūtānāṃ pūjitaḥ parameṣṭhinā|| 31"],"meaning":"नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नृसिंहभगवान् इतना कहकर और ब्रह्माजीके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके वहीं अन्तर्धान—समस्त प्राणियोंके लिये अदृश्य हो गये॥ ३१॥"},{"id":"7.10.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/32/","page":870,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ततः सम्पूज्य शिरसा ववन्दे परमेष्ठिनम्।","भवं प्रजापतीन्देवान्प्रह्रादो भगवत्कलाः॥ ३२"],"iast":["tataḥ sampūjya śirasā vavande parameṣṭhinam|","bhavaṃ prajāpatīndevānprahrādo bhagavatkalāḥ|| 32"],"meaning":"इसके बाद प्रह्लादजीने भगवत्स्वरूप ब्रह्मा-शंकरकी तथा प्रजापति और देवताओंकी पूजा करके उन्हें माथा टेककर प्रणाम किया॥ ३२॥"},{"id":"7.10.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/33/","page":870,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ततः काव्यादिभिः सार्धं मुनिभिः कमलासनः।","दैत्यानां दानवानां च प्रह्रादमकरोत् पतिम्॥ ३३"],"iast":["tataḥ kāvyādibhiḥ sārdhaṃ munibhiḥ kamalāsanaḥ|","daityānāṃ dānavānāṃ ca prahrādamakarot patim|| 33"],"meaning":"तब शुक्राचार्य आदि मुनियोंके साथ ब्रह्माजीने प्रह्लादजीको समस्त दानव और दैत्योंका अधिपति बना दिया॥ ३३॥"},{"id":"7.10.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/34/","page":870,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["प्रतिनन्द्य ततो देवाः प्रयुज्य परमाशिषः।","स्वधामानि ययू राजन्ब्रह्माद्याः प्रतिपूजिताः॥ ३४"],"iast":["pratinandya tato devāḥ prayujya paramāśiṣaḥ|","svadhāmāni yayū rājanbrahmādyāḥ pratipūjitāḥ|| 34"],"meaning":"फिर ब्रह्मादि देवताओंने प्रह्लादका अभिनन्दन किया और उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। प्रह्लादजीने भी यथायोग्य सबका सत्कार किया और वे लोग अपने-अपने लोकोंको चले गये॥ ३४॥"},{"id":"7.10.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/35/","page":870,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["एवं तौ पार्षदौ विष्णोः पुत्रत्वं प्रापितौ दितेः।","हृदि स्थितेन हरिणा वैरभावेन तौ हतौ॥ ३५"],"iast":["evaṃ tau pārṣadau viṣṇoḥ putratvaṃ prāpitau diteḥ|","hṛdi sthitena hariṇā vairabhāvena tau hatau|| 35"],"meaning":"युधिष्ठिर! इस प्रकार भगवान्‌के वे दोनों पार्षद जय और विजय दितिके पुत्र दैत्य हो गये थे। वे भगवान्‌से वैरभाव रखते थे। उनके हृदयमें रहनेवाले भगवान्‌ने उनका उद्धार करनेके लिये उन्हें मार डाला॥ ३५॥"},{"id":"7.10.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/36/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["पुनश्‍च विप्रशापेन राक्षसौ तौ बभूवतुः।","कुम्भकर्णदशग्रीवौ हतौ तौ रामविक्रमैः॥ ३६"],"iast":["punaśca vipraśāpena rākṣasau tau babhūvatuḥ|","kumbhakarṇadaśagrīvau hatau tau rāmavikramaiḥ|| 36"],"meaning":"ऋषियोंके शापके कारण उनकी मुक्ति नहीं हुई, वे फिरसे कुम्भकर्ण और रावणके रूपमें राक्षस हुए। उस समय भगवान् श्रीरामके पराक्रमसे उनका अन्त हुआ॥ ३६॥"},{"id":"7.10.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/37/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["शयानौ युधि निर्भिन्‍नहृदयौ रामसायकैः।","तच्चित्तौ जहतुर्देहं यथा प्राक्तनजन्मनि॥ ३७"],"iast":["śayānau yudhi nirbhinnahṛdayau rāmasāyakaiḥ|","taccittau jahaturdehaṃ yathā prāktanajanmani|| 37"],"meaning":"युद्धमें भगवान् रामके बाणोंसे उनका कलेजा फट गया। वहीं पड़े-पड़े पूर्वजन्मकी भाँति भगवान्‌का स्मरण करते-करते उन्होंने अपने शरीर छोड़े॥ ३७॥"},{"id":"7.10.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/38/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ताविहाथ पुनर्जातौ शिशुपालकरूषजौ।","हरौ वैरानुबन्धेन पश्यतस्ते समीयतुः॥ ३८"],"iast":["tāvihātha punarjātau śiśupālakarūṣajau|","harau vairānubandhena paśyataste samīyatuḥ|| 38"],"meaning":"वे ही अब इस युगमें शिशुपाल और दन्तवक्‍त्रके रूपमें पैदा हुए थे। भगवान्‌के प्रति वैरभाव होनेके कारण तुम्हारे सामने ही वे उनमें समा गये॥ ३८॥"},{"id":"7.10.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/39/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः।","जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा॥ ३९"],"iast":["enaḥ pūrvakṛtaṃ yat tad rājānaḥ kṛṣṇavairiṇaḥ|","jahustvante tadātmānaḥ kīṭaḥ peśaskṛto yathā|| 39"],"meaning":"युधिष्ठिर! श्रीकृष्णसे शत्रुता रखनेवाले सभी राजा अन्तसमयमें श्रीकृष्णके स्मरणसे तद्रूप होकर अपने पूर्वकृत पापोंसे सदाके लिये मुक्त हो गये। जैसे भृंगीके द्वारा पकड़ा हुआ कीड़ा भयसे ही उसका स्वरूप प्राप्त कर लेता है॥ ३९॥"},{"id":"7.10.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/40/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["यथा यथा भगवतो भक्‍त्या परमयाभिदा।","नृपाश्चैद्यादयः सात्म्यं हरेस्तच्चिन्तया ययुः॥ ४०"],"iast":["yathā yathā bhagavato bhaktyā paramayābhidā|","nṛpāścaidyādayaḥ sātmyaṃ harestaccintayā yayuḥ|| 40"],"meaning":"जिस प्रकार भगवान्‌के प्यारे भक्त अपनी भेद-भावरहित अनन्य भक्तिके द्वारा भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही शिशुपाल आदि नरपति भी भगवान्‌के वैरभावजनित अनन्य चिन्तनसे भगवान्‌के सारूप्यको प्राप्त हो गये॥ ४०॥"},{"id":"7.10.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/41/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["आख्यातं सर्वमेतत् ते यन्मां त्वं परिपृष्टवान्।","दमघोषसुतादीनां हरेः सात्म्यमपि द्विषाम्॥ ४१"],"iast":["ākhyātaṃ sarvametat te yanmāṃ tvaṃ paripṛṣṭavān|","damaghoṣasutādīnāṃ hareḥ sātmyamapi dviṣām|| 41"],"meaning":"युधिष्ठिर! तुमने मुझसे पूछा था कि भगवान्‌से द्वेष करनेवाले शिशुपाल आदिको उनके सारूप्यकी प्राप्ति कैसे हुई। उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया॥ ४१॥"},{"id":"7.10.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/42/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः।","अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः॥ ४२"],"iast":["eṣā brahmaṇyadevasya kṛṣṇasya ca mahātmanaḥ|","avatārakathā puṇyā vadho yatrādidaityayoḥ|| 42"],"meaning":"ब्रह्मण्यदेव परमात्मा श्रीकृष्णका यह परम पवित्र अवतार-चरित्र है। इसमें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु इन दोनों दैत्योंके वधका वर्णन है॥ ४२॥"},{"id":"7.10.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/43/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["प्रह्रादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च।","भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्‍च याथात्म्यं चास्य वै हरेः॥ ४३"],"iast":["prahrādasyānucaritaṃ mahābhāgavatasya ca|","bhaktirjñānaṃ viraktiśca yāthātmyaṃ cāsya vai hareḥ|| 43"],"meaning":"इस प्रसंगमें भगवान्‌के परम भक्त प्रह्लादका चरित्र, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके स्वामी श्रीहरिके यथार्थ स्वरूप तथा उनके दिव्य गुण एवं लीलाओंका वर्णन है। इस आख्यानमें देवता और दैत्योंके पदोंमें कालक्रमसे जो महान् परिवर्तन होता है, उसका भी निरूपण किया गया है॥ ४३-४४॥","meaning_covers":[43,44]},{"id":"7.10.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/44/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम्।","परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान्॥ ४४"],"iast":["sargasthityapyayeśasya guṇakarmānuvarṇanam|","parāvareṣāṃ sthānānāṃ kālena vyatyayo mahān|| 44"],"meaning":"इस प्रसंगमें भगवान्‌के परम भक्त प्रह्लादका चरित्र, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके स्वामी श्रीहरिके यथार्थ स्वरूप तथा उनके दिव्य गुण एवं लीलाओंका वर्णन है। इस आख्यानमें देवता और दैत्योंके पदोंमें कालक्रमसे जो महान् परिवर्तन होता है, उसका भी निरूपण किया गया है॥ ४३-४४॥","meaning_covers":[43,44]},{"id":"7.10.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/45/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["धर्मो भागवतानां च भगवान्येन गम्यते।","आख्यानेऽस्मिन्समाम्नातमाध्यात्मिकमशेषतः॥ ४५"],"iast":["dharmo bhāgavatānāṃ ca bhagavānyena gamyate|","ākhyāne'sminsamāmnātamādhyātmikamaśeṣataḥ|| 45"],"meaning":"जिसके द्वारा भगवान्‌की प्राप्ति होती है, उस भागवत-धर्मका भी वर्णन है। अध्यात्मके सम्बन्धमें भी सभी जाननेयोग्य बातें इसमें हैं॥ ४५॥"},{"id":"7.10.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/46/","page":871,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["य एतत् पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वीर्योपबृंहितम्।","कीर्तयेच्छ्रद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते॥ ४६"],"iast":["ya etat puṇyamākhyānaṃ viṣṇorvīryopabṛṃhitam|","kīrtayecchraddhayā śrutvā karmapāśairvimucyate|| 46"],"meaning":"भगवान्‌के पराक्रमसे पूर्ण इस पवित्र आख्यानको जो कोई पुरुष श्रद्धासे कीर्तन करता और सुनता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥"},{"id":"7.10.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/47/","page":872,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["एतद् य आदिपुरुषस्य मृगेन्द्रलीलां","दैत्येन्द्रयूथपवधं प्रयतः पठेत।","दैत्यात्मजस्य च सतां प्रवरस्य पुण्यं","श्रुत्वानुभावमकुतोभयमेति लोकम्॥ ४७"],"iast":["etad ya ādipuruṣasya mṛgendralīlāṃ","daityendrayūthapavadhaṃ prayataḥ paṭheta|","daityātmajasya ca satāṃ pravarasya puṇyaṃ","śrutvānubhāvamakutobhayameti lokam|| 47"],"meaning":"जो मनुष्य परम पुरुष परमात्माकी यह श्रीनृसिंह-लीला, सेनापतियोंसहित हिरण्यकशिपुका वध और संतशिरोमणि प्रह्लादजीका पावन प्रभाव एकाग्र मनसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान्‌के अभयपद वैकुण्ठको प्राप्त होता है॥ ४७॥"},{"id":"7.10.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/48/","page":872,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["यूयं नृलोके बत भूरिभागा","लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति।","येषां गृहानावसतीति साक्षाद्","गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्॥ ४८"],"iast":["yūyaṃ nṛloke bata bhūribhāgā","lokaṃ punānā munayo'bhiyanti|","yeṣāṃ gṛhānāvasatīti sākṣād","gūḍhaṃ paraṃ brahma manuṣyaliṅgam|| 48"],"meaning":"युधिष्ठिर! इस मनुष्यलोकमें तुमलोगोंके भाग्य अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, क्योंकि तुम्हारे घरमें साक्षात् परब्रह्म परमात्मा मनुष्यका रूप धारण करके गुप्तरूपसे निवास करते हैं। इसीसे सारे संसारको पवित्र कर देनेवाले ऋषि-मुनि बार-बार उनका दर्शन करनेके लिये चारों ओरसे तुम्हारे पास आया करते हैं॥ ४८॥"},{"id":"7.10.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/49/","page":872,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्य-","कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।","प्रियः सुहृद‍् वः खलु मातुलेय","आत्मार्हणीयो विधिकृद् गुरुश्‍च॥ ४९"],"iast":["sa vā ayaṃ brahma mahadvimṛgya-","kaivalyanirvāṇasukhānubhūtiḥ |","priyaḥ suhṛd vaḥ khalu mātuleya","ātmārhaṇīyo vidhikṛd guruśca|| 49"],"meaning":"बड़े-बड़े महापुरुष निरन्तर जिनको ढूँढ़ते रहते हैं, जो मायाके लेशसे रहित परम शान्त परमानन्दानुभव-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा हैं—वे ही तुम्हारे प्रिय, हितैषी, ममेरे भाई, पूज्य, आज्ञाकारी, गुरु और स्वयं आत्मा श्रीकृष्ण हैं॥ ४९॥"},{"id":"7.10.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/50/","page":872,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["न यस्य साक्षाद् भवपद्मजादिभी","रूपं धिया वस्तुतयोपवर्णितम्।","मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितः","प्रसीदतामेष स सात्वतां पतिः॥ ५०"],"iast":["na yasya sākṣād bhavapadmajādibhī","rūpaṃ dhiyā vastutayopavarṇitam|","maunena bhaktyopaśamena pūjitaḥ","prasīdatāmeṣa sa sātvatāṃ patiḥ|| 50"],"meaning":"शंकर, ब्रह्मा आदि भी अपनी सारी बुद्धि लगाकर ‘वे यह हैं’—इस रूपमें उनका वर्णन नहीं कर सके, फिर हम तो कर ही कैसे सकते हैं। हम तो मौन, भक्ति और संयमके द्वारा ही उनकी पूजा करते हैं। कृपया हमारी यह पूजा स्वीकार करके भक्तवत्सल भगवान् हमपर प्रसन्‍न हों॥ ५०॥"},{"id":"7.10.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/51/","page":872,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["स एष भगवान्राजन्व्यतनोद् विहतं यशः।","पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना॥ ५१"],"iast":["sa eṣa bhagavānrājanvyatanod vihataṃ yaśaḥ|","purā rudrasya devasya mayenānantamāyinā|| 51"],"meaning":"युधिष्ठिर! यही एकमात्र आराध्यदेव हैं। प्राचीन कालमें बहुत बड़े मायावी मयासुरने जब रुद्रदेवकी कमनीय कीर्तिमें कलंक लगाना चाहा था, तब इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने फिरसे उनके यशकी रक्षा और विस्तार किया था॥ ५१॥"},{"id":"7.10.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/52/","page":872,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कस्मिन् कर्मणि देवस्य मयोऽहञ्जगदीशितुः।","यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम्॥ ५२"],"iast":["kasmin karmaṇi devasya mayo'hañjagadīśituḥ|","yathā copacitā kīrtiḥ kṛṣṇenānena kathyatām|| 52"],"meaning":"राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! मयदानव किस कार्यमें जगदीश्‍वर रुद्रदेवका यश नष्ट करना चाहता था और भगवान् श्रीकृष्णने किस प्रकार उनके यशकी रक्षा की? आप कृपा करके बतलाइये॥ ५२॥"},{"id":"7.10.53","number":53,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/53/","page":872,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["निर्जिता असुरा देवैर्युध्यनेनोपबृंहितैः।","मायिनां परमाचार्यं मयं शरणमाययुः॥ ५३"],"iast":["nirjitā asurā devairyudhyanenopabṛṃhitaiḥ|","māyināṃ paramācāryaṃ mayaṃ śaraṇamāyayuḥ|| 53"],"meaning":"नारदजीने कहा—एक बार इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे शक्ति प्राप्त करके देवताओंने युद्धमें असुरोंको जीत लिया था। उस समय सब-के-सब असुर मायावियोंके परमगुरु मयदानवकी शरणमें गये॥ ५३॥"},{"id":"7.10.54","number":54,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/54/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["स निर्माय पुरस्तिस्रो हैमीरौप्यायसीर्विभुः।","दुर्लक्ष्यापायसंयोगा दुर्वितर्क्यपरिच्छदाः॥ ५४"],"iast":["sa nirmāya purastisro haimīraupyāyasīrvibhuḥ|","durlakṣyāpāyasaṃyogā durvitarkyaparicchadāḥ|| 54"],"meaning":"शक्तिशाली मयासुरने सोने, चाँदी और लोहेके तीन विमान बना दिये। वे विमान क्या थे, तीन पुर ही थे। वे इतने विलक्षण थे कि उनका आना-जाना जान नहीं पड़ता था। उनमें अपरिमित सामग्रियाँ भरी हुई थीं॥ ५४॥"},{"id":"7.10.55","number":55,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/55/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ताभिस्तेऽसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन् सेश्‍वरान् नृप।","स्मरन्तो नाशयाञ्चक्रुः पूर्ववैरमलक्षिताः॥ ५५"],"iast":["tābhiste'surasenānyo lokāṃstrīn seśvarān nṛpa|","smaranto nāśayāñcakruḥ pūrvavairamalakṣitāḥ|| 55"],"meaning":"युधिष्ठिर! दैत्यसेनापतियोंके मनमें तीनों लोक और लोकपतियोंके प्रति वैरभाव तो था ही, अब उसकी याद करके उन तीनों विमानोंके द्वारा वे उनमें छिपे रहकर सबका नाश करने लगे॥ ५५॥"},{"id":"7.10.56","number":56,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/56/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ततस्ते सेश्‍वरा लोका उपासाद्येश्‍वरं विभो।","त्राहि नस्तावकान्देव विनष्टांस्त्रिपुरालयैः॥ ५६"],"iast":["tataste seśvarā lokā upāsādyeśvaraṃ vibho|","trāhi nastāvakāndeva vinaṣṭāṃstripurālayaiḥ|| 56"],"meaning":"तब लोकपालोंके साथ सारी प्रजा भगवान् शंकरकी शरणमें गयी और उनसे प्रार्थना की कि ‘प्रभो! त्रिपुरमें रहनेवाले असुर हमारा नाश कर रहे हैं। हम आपके हैं; अतः देवाधिदेव! आप हमारी रक्षा कीजिये’॥ ५६॥"},{"id":"7.10.57","number":57,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/57/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः।","शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत॥ ५७"],"iast":["athānugṛhya bhagavānmā bhaiṣṭeti surānvibhuḥ|","śaraṃ dhanuṣi sandhāya pureṣvastraṃ vyamuñcata|| 57"],"meaning":"उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकरने कृपापूर्ण शब्दोंमें कहा—‘डरो मत।’ फिर उन्होंने अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर तीनों पुरोंपर छोड़ दिया॥ ५७॥"},{"id":"7.10.58","number":58,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/58/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ततोऽग्‍निवर्णा इषव उत्पेतुः सूर्यमण्डलात्।","यथा मयूखसंदोहा नादृश्यन्त पुरो यतः॥ ५८"],"iast":["tato'gnivarṇā iṣava utpetuḥ sūryamaṇḍalāt|","yathā mayūkhasaṃdohā nādṛśyanta puro yataḥ|| 58"],"meaning":"उनके उस बाणसे सूर्यमण्डलसे निकलनेवाली किरणोंके समान अन्य बहुत-से बाण निकले। उनमेंसे मानो आगकी लपटें निकल रही थीं। उनके कारण उन पुरोंका दीखना बंद हो गया॥ ५८॥"},{"id":"7.10.59","number":59,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/59/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["तैः स्पृष्टा व्यसवः सर्वे निपेतुः स्म पुरौकसः।","तानानीय महायोगी मयः कूपरसेऽक्षिपत्॥ ५९"],"iast":["taiḥ spṛṣṭā vyasavaḥ sarve nipetuḥ sma puraukasaḥ|","tānānīya mahāyogī mayaḥ kūparase'kṣipat|| 59"],"meaning":"उनके स्पर्शसे सभी विमानवासी निष्प्राण होकर गिर पड़े। महामायावी मय बहुत-से उपाय जानता था, वह उन दैत्योंको उठा लाया और अपने बनाये हुए अमृतके कुएँमें डाल दिया॥ ५९॥"},{"id":"7.10.60","number":60,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/60/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["सिद्धामृतरसस्पृष्टा वज्रसारा महौजसः।","उत्तस्थुर्मेघदलना वैद्युता इव वह्नयः॥ ६०"],"iast":["siddhāmṛtarasaspṛṣṭā vajrasārā mahaujasaḥ|","uttasthurmeghadalanā vaidyutā iva vahnayaḥ|| 60"],"meaning":"उस सिद्ध अमृत-रसका स्पर्श होते ही असुरोंका शरीर अत्यन्त तेजस्वी और वज्रके समान सुदृढ़ हो गया। वे बादलोंको विदीर्ण करनेवाली बिजलीकी आगकी तरह उठ खड़े हुए॥ ६०॥"},{"id":"7.10.61","number":61,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/61/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["विलोक्य भग्नसङ्कल्पं विमनस्कं वृषध्वजम्।","तदायं भगवान्विष्णुस्तत्रोपायमकल्पयत्॥ ६१"],"iast":["vilokya bhagnasaṅkalpaṃ vimanaskaṃ vṛṣadhvajam|","tadāyaṃ bhagavānviṣṇustatropāyamakalpayat|| 61"],"meaning":"इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि महादेवजी तो अपना संकल्प पूरा न होनेके कारण उदास हो गये हैं, तब उन असुरोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये इन्होंने एक युक्ति की॥ ६१॥"},{"id":"7.10.62","number":62,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/62/","page":873,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["वत्स आसीत्तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः।","प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ॥ ६२"],"iast":["vatsa āsīttadā brahmā svayaṃ viṣṇurayaṃ hi gauḥ|","praviśya tripuraṃ kāle rasakūpāmṛtaṃ papau|| 62"],"meaning":"यही भगवान् विष्णु उस समय गौ बन गये और ब्रह्माजी बछड़ा बने। दोनों ही मध्याह्नके समय उन तीनों पुरोंमें गये और उस सिद्धरसके कुएँका सारा अमृत पी गये॥ ६२॥"},{"id":"7.10.63","number":63,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/63/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिताः।","तद् विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ॥ ६३"],"iast":["te'surā hyapi paśyanto na nyaṣedhanvimohitāḥ|","tad vijñāya mahāyogī rasapālānidaṃ jagau|| 63"],"meaning":"यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्‌की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत-रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है?’ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान् शंकरके युद्धकी सामग्री तैयार की॥ ६३—६५॥","meaning_covers":[63,65]},{"id":"7.10.64","number":64,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/64/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["स्वयं विशोकः शोकार्तान्स्मरन्दैवगतिं च ताम्।","देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्‍वरोऽस्तीह कश्‍चन॥ ६४"],"iast":["svayaṃ viśokaḥ śokārtānsmarandaivagatiṃ ca tām|","devo'suro naro'nyo vā neśvaro'stīha kaścana|| 64"],"meaning":"यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्‌की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत-रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है?’ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान् शंकरके युद्धकी सामग्री तैयार की॥ ६३—६५॥","meaning_covers":[63,65]},{"id":"7.10.65","number":65,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/65/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः।","अथासौ शक्तिभिः स्वाभिः शम्भोः प्राधानिकं व्यधात्॥ ६५"],"iast":["ātmano'nyasya vā diṣṭaṃ daivenāpohituṃ dvayoḥ|","athāsau śaktibhiḥ svābhiḥ śambhoḥ prādhānikaṃ vyadhāt|| 65"],"meaning":"यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्‌की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत-रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है?’ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान् शंकरके युद्धकी सामग्री तैयार की॥ ६३—६५॥","meaning_covers":[63,65]},{"id":"7.10.66","number":66,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/66/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["धर्मज्ञानविरक्त्यृद्धितपोविद्याक्रियादिभिः।","रथं सूतं ध्वजं वाहान्धनुर्वर्म शरादि यत्॥ ६६"],"iast":["dharmajñānaviraktyṛddhitapovidyākriyādibhiḥ|","rathaṃ sūtaṃ dhvajaṃ vāhāndhanurvarma śarādi yat|| 66"],"meaning":"उन्होंने धर्मसे रथ, ज्ञानसे सारथि, वैराग्यसे ध्वजा, ऐश्‍वर्यसे घोड़े, तपस्यासे धनुष, विद्यासे कवच, क्रियासे बाण और अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे अन्यान्य वस्तुओंका निर्माण किया॥ ६६॥"},{"id":"7.10.67","number":67,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/67/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["सन्‍नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे।","शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेऽभिजितीश्‍वरः॥ ६७"],"iast":["sannaddho rathamāsthāya śaraṃ dhanurupādade|","śaraṃ dhanuṣi sandhāya muhūrte'bhijitīśvaraḥ|| 67"],"meaning":"इन सामग्रियोंसे सज-धजकर भगवान् शंकर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान् शंकरने अभिजित् मुहूर्तमें धनुषपर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानोंको भस्म कर दिया। युधिष्ठिर! उसी समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैकड़ों विमानोंकी भीड़ लग गयी॥ ६७-६८॥","meaning_covers":[67,68]},{"id":"7.10.68","number":68,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/68/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["ददाह तेन दुर्भेद्या हरोऽथ त्रिपुरो नृप।","दिवि दुन्दुभयो नेदुर्विमानशतसङ्कुलाः॥ ६८"],"iast":["dadāha tena durbhedyā haro'tha tripuro nṛpa|","divi dundubhayo nedurvimānaśatasaṅkulāḥ|| 68"],"meaning":"इन सामग्रियोंसे सज-धजकर भगवान् शंकर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान् शंकरने अभिजित् मुहूर्तमें धनुषपर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानोंको भस्म कर दिया। युधिष्ठिर! उसी समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैकड़ों विमानोंकी भीड़ लग गयी॥ ६७-६८॥","meaning_covers":[67,68]},{"id":"7.10.69","number":69,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/69/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः।","अवाकिरञ्जगुर्हृष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६९"],"iast":["devarṣipitṛsiddheśā jayeti kusumotkaraiḥ|","avākirañjagurhṛṣṭā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ|| 69"],"meaning":"देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्‍वर आनन्दसे जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं॥ ६९॥"},{"id":"7.10.70","number":70,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/70/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["एवं दग्ध्वा पुरस्तिस्रो भगवान्पुरहा नृप।","ब्रह्मादिभिः स्तूयमानः स्वधाम प्रत्यपद्यत॥ ७०"],"iast":["evaṃ dagdhvā purastisro bhagavānpurahā nṛpa|","brahmādibhiḥ stūyamānaḥ svadhāma pratyapadyata|| 70"],"meaning":"युधिष्ठिर! इस प्रकार उन तीनों पुरोंको जलाकर भगवान् शंकरने ‘पुरारि’की पदवी प्राप्त की और ब्रह्मादिकोंकी स्तुति सुनते हुए अपने धामको चले गये॥ ७०॥"},{"id":"7.10.71","number":71,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/71/","page":874,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["एवंविधान्यस्य हरेः स्वमायया","विडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः।","वीर्याणि गीतान्यृषिभिर्जगद‍्गुरो-","र्लोकान् पुनानान्यपरं वदामि किम्॥ ७१"],"iast":["evaṃvidhānyasya hareḥ svamāyayā","viḍambamānasya nṛlokamātmanaḥ|","vīryāṇi gītānyṛṣibhirjagadguro-","rlokān punānānyaparaṃ vadāmi kim|| 71"],"meaning":"आत्मस्वरूप जगद‍्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनी मायासे जो मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करते हैं, ऋषिलोग उन्हीं अनेकों लोकपावन लीलाओंका गान किया करते हैं। बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ?॥ ७१॥"}],"text":[{"b":19513,"kind":"adhyaya_heading","page":867,"text":"अथ दशमोऽध्यायः"},{"b":19514,"kind":"topic_heading","page":867,"text":"प्रह्लादजीके राज्याभिषेक और त्रिपुरदहनकी कथा"},{"b":19515,"kind":"topic_heading","page":867,"text":"नारद उवाच"},{"b":19516,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.1"],"text":"भक्तियोगस्य तत् सर्वमन्तरायतयार्भकः।"},{"b":19517,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.1"],"text":"मन्यमानो हृषीकेशं स्मयमान उवाच ह॥ १"},{"b":19518,"kind":"hindi_commentary","page":867,"explains":["7.10.1"],"text":"नारदजी कहते हैं—प्रह्लादजीने बालक होनेपर भी यही समझा कि वरदान माँगना प्रेम-भक्तिका विघ्न है; इसलिये कुछ मुसकराते हुए वे भगवान्‌से बोले॥ १॥"},{"b":19519,"kind":"topic_heading","page":867,"text":"प्रह्राद उवाच"},{"b":19520,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.2"],"text":"मा मां प्रलोभयोत्पत्त्याऽऽसक्तं कामेषु तैर्वरैः।"},{"b":19521,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.2"],"text":"तत्सङ्गभीतो निर्विण्णो मुमुक्षुस्त्वामुपाश्रितः॥ २"},{"b":19522,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.3"],"text":"भृत्यलक्षणजिज्ञासुर्भक्तं कामेष्वचोदयत्।"},{"b":19523,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.3"],"text":"भवान् संसारबीजेषु हृदयग्रन्थिषु प्रभो॥ ३"},{"b":19524,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.4"],"text":"नान्यथा तेऽखिलगुरो घटेत करुणात्मनः।"},{"b":19525,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.4"],"text":"यस्त आशिष आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक्॥ ४"},{"b":19526,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.5"],"text":"आशासानो न वै भृत्यः स्वामिन्याशिष आत्मनः।"},{"b":19527,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.5"],"text":"न स्वामी भृत्यतः स्वाम्यमिच्छन् यो राति चाशिषः॥ ५"},{"b":19528,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.6"],"text":"अहं त्वकामस्त्वद्भक्तस्त्वं च स्वाम्यनपाश्रयः।"},{"b":19529,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.6"],"text":"नान्यथेहावयोरर्थो राजसेवकयोरिव॥ ६"},{"b":19530,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.7"],"text":"यदि रासीश मे कामान् वरांस्त्वं वरदर्षभ।"},{"b":19531,"kind":"sanskrit_shloka","page":867,"verses":["7.10.7"],"text":"कामानां हृद्यसंरोहं भवतस्तु वृणे वरम्॥ ७"},{"b":19532,"kind":"hindi_commentary","page":867,"explains":["7.10.2","7.10.3","7.10.4","7.10.5","7.10.6","7.10.7"],"text":"प्रह्लादजीने कहा—प्रभो! मैं जन्मसे ही विषय-भोगोंमें आसक्त हूँ, अब मुझे इन वरोंके द्वारा आप लुभाइये नहीं। मैं उन भोगोंके संगसे डरकर, उनके द्वारा होनेवाली तीव्र वेदनाका अनुभव कर उनसे छूटनेकी अभिलाषासे ही आपकी शरणमें आया हूँ॥ २॥ भगवन्! मुझमें भक्तके लक्षण हैं या नहीं—यह जाननेके लिये आपने अपने भक्तको वरदान माँगनेकी ओर प्रेरित किया है। ये विषय-भोग हृदयकी गाँठको और भी मजबूत करनेवाले तथा बार-बार जन्म-मृत्युके चक्करमें डालनेवाले हैं॥ ३॥ जगद‍्गुरो! परीक्षाके सिवा ऐसा कहनेका और कोई कारण नहीं दीखता; क्योंकि आप परम दयालु हैं। (अपने भक्तको भोगोंमें फँसानेवाला वर कैसे दे सकते हैं?) आपसे जो सेवक अपनी कामनाएँ पूर्ण करना चाहता है, वह सेवक नहीं; वह तो लेन-देन करनेवाला निरा बनिया है॥ ४॥ जो स्वामीसे अपनी कामनाओंकी पूर्ति चाहता है, वह सेवक नहीं; और जो सेवकसे सेवा करानेके लिये, उसका स्वामी बननेके लिये उसकी कामनाएँ पूर्ण करता है, वह स्वामी नहीं॥ ५॥ मैं आपका निष्काम सेवक हूँ और आप मेरे निरपेक्ष स्वामी हैं। जैसे राजा और उसके सेवकोंका प्रयोजनवश स्वामी-सेवकका सम्बन्ध रहता है, वैसा तो मेरा और आपका सम्बन्ध है नहीं॥ ६॥ मेरे वरदानिशिरोमणि स्वामी! यदि आप मुझे मुँहमाँगा वर देना ही चाहते हैं तो यह वर दीजिये कि मेरे हृदयमें कभी किसी कामनाका बीज अंकुरित ही न हो॥ ७॥"},{"b":19533,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.8"],"text":"इन्द्रियाणि मनः प्राण आत्मा धर्मो धृतिर्मतिः।"},{"b":19534,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.8"],"text":"ह्रीः श्रीस्तेजः स्मृतिः सत्यं यस्य नश्यन्ति जन्मना॥ ८"},{"b":19535,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.9"],"text":"विमुञ्चति यदा कामान्मानवो मनसि स्थितान्।"},{"b":19536,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.9"],"text":"तर्ह्येव पुण्डरीकाक्ष भगवत्त्वाय कल्पते॥ ९"},{"b":19537,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.10"],"text":"नमो भगवते तुभ्यं पुरुषाय महात्मने।"},{"b":19538,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.10"],"text":"हरयेऽद्भुतसिंहाय ब्रह्मणे परमात्मने॥ १०"},{"b":19539,"kind":"hindi_commentary","page":868,"explains":["7.10.8","7.10.9","7.10.10"],"text":"हृदयमें किसी भी कामनाके उदय होते ही इन्द्रिय, मन, प्राण, देह, धर्म, धैर्य, बुद्धि, लज्जा, श्री, तेज, स्मृति और सत्य—ये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं॥ ८॥ कमलनयन! जिस समय मनुष्य अपने मनमें रहनेवाली कामनाओंका परित्याग कर देता है, उसी समय वह भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेता है॥ ९॥ भगवन्! आपको नमस्कार है। आप सबके हृदयमें विराजमान, उदारशिरोमणि स्वयं परब्रह्म परमात्मा हैं। अद्भुत नृसिंहरूपधारी श्रीहरिके चरणोंमें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ॥ १०॥"},{"b":19540,"kind":"topic_heading","page":868,"text":"नृसिंह उवाच"},{"b":19541,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.11"],"text":"नैकान्तिनो मे मयि जात्विहाशिष"},{"b":19542,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.11"],"text":"आशासतेऽमुत्र च ये भवद्विधाः।"},{"b":19543,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.11"],"text":"अथापि मन्वन्तरमेतदत्र"},{"b":19544,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.11"],"text":"दैत्येश्‍वराणामनुभुङ्क्ष्व भोगान्॥ ११"},{"b":19545,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.12"],"text":"कथा मदीया जुषमाणः प्रियास्त्व-"},{"b":19546,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.12"],"text":"मावेश्य मामात्मनि सन्तमेकम्।"},{"b":19547,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.12"],"text":"सर्वेषु भूतेष्वधियज्ञमीशं"},{"b":19548,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.12"],"text":"यजस्व योगेन च कर्म हिन्वन्॥ १२"},{"b":19549,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.13"],"text":"भोगेन पुण्यं कुशलेन पापं"},{"b":19550,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.13"],"text":"कलेवरं कालजवेन हित्वा।"},{"b":19551,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.13"],"text":"कीर्तिं विशुद्धां सुरलोकगीतां"},{"b":19552,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.13"],"text":"विताय मामेष्यसि मुक्तबन्धः॥ १३"},{"b":19553,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.14"],"text":"य एतत् कीर्तयेन्मह्यं त्वया गीतमिदं नरः।"},{"b":19554,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.14"],"text":"त्वां च मां च स्मरन्काले कर्मबन्धात् प्रमुच्यते॥ १४"},{"b":19555,"kind":"hindi_commentary","page":868,"explains":["7.10.11","7.10.12","7.10.13","7.10.14"],"text":"श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—प्रह्लाद! तुम्हारे-जैसे मेरे एकान्तप्रेमी इस लोक अथवा परलोककी किसी भी वस्तुके लिये कभी कोई कामना नहीं करते। फिर भी अधिक नहीं, केवल एक मन्वन्तरतक मेरी प्रसन्‍नताके लिये तुम इस लोकमें दैत्याधिपतियोंके समस्त भोग स्वीकार कर लो॥ ११॥ समस्त प्राणियोंके हृदयमें यज्ञोंके भोक्ता ईश्‍वरके रूपमें मैं ही विराजमान हूँ। तुम अपने हृदयमें मुझे देखते रहना और मेरी लीला-कथाएँ, जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं, सुनते रहना। समस्त कर्मोंके द्वारा मेरी ही आराधना करना और इस प्रकार अपने प्रारब्ध-कर्मका क्षय कर देना॥ १२॥ भोगके द्वारा पुण्यकर्मोंके फल और निष्काम पुण्यकर्मोंके द्वारा पापका नाश करते हुए समयपर शरीरका त्याग करके समस्त बन्धनोंसे मुक्त होकर तुम मेरे पास आ जाओगे। देवलोकमें भी लोग तुम्हारी विशुद्ध कीर्तिका गान करेंगे॥ १३॥ तुम्हारे द्वारा की हुई मेरी इस स्तुतिका जो मनुष्य कीर्तन करेगा और साथ ही मेरा और तुम्हारा स्मरण भी करेगा, वह समयपर कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जायगा॥ १४॥"},{"b":19556,"kind":"topic_heading","page":868,"text":"प्रह्राद उवाच"},{"b":19557,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.15"],"text":"वरं वरय एतत् ते वरदेशान्महेश्‍वर।"},{"b":19558,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.15"],"text":"यदनिन्दत् पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्‍वरम्॥ १५"},{"b":19559,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.16"],"text":"विद्धामर्षाशयः साक्षात् सर्वलोकगुरुं प्रभुम्।"},{"b":19560,"kind":"sanskrit_shloka","page":868,"verses":["7.10.16"],"text":"भ्रातृहेति मृषादृष्टिस्त्वद्भक्ते मयि चाघवान्॥ १६"},{"b":19561,"kind":"hindi_commentary","page":868,"explains":["7.10.15","7.10.16"],"text":"प्रह्लादजीने कहा—महेश्‍वर! आप वर देनेवालोंके स्वामी हैं। आपसे मैं एक वर और माँगता हूँ। मेरे पिताने आपके ईश्‍वरीय तेजको और सर्वशक्तिमान् चराचरगुरु स्वयं आपको न जानकर आपकी बड़ी निन्दा की है। ‘इस विष्णुने मेरे भाईको मार डाला है’ ऐसी मिथ्यादृष्टि रखनेके कारण पिताजी क्रोधके वेगको सहन करनेमें असमर्थ हो गये थे। इसीसे उन्होंने आपका भक्त होनेके कारण मुझसे भी द्रोह किया॥ १५-१६॥"},{"b":19562,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.17"],"text":"तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्।"},{"b":19563,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.17"],"text":"पूतस्तेऽपाङ्गसंदृष्टस्तदा कृपणवत्सल॥ १७"},{"b":19564,"kind":"hindi_commentary","page":869,"explains":["7.10.17"],"text":"दीनबन्धो! यद्यपि आपकी दृष्टि पड़ते ही वे पवित्र हो चुके, फिर भी मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उस जल्दी नाश न होनेवाले दुस्तर दोषसे मेरे पिता शुद्ध हो जायँ॥ १७॥"},{"b":19565,"kind":"topic_heading","page":869,"text":"श्रीभगवानुवाच"},{"b":19566,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.18"],"text":"त्रिःसप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ।"},{"b":19567,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.18"],"text":"यत् साधोऽस्य गृहे जातो भवान्वै कुलपावनः॥ १८"},{"b":19568,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.19"],"text":"यत्र यत्र च मद्भक्ताः प्रशान्ताः समदर्शिनः।"},{"b":19569,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.19"],"text":"साधवः समुदाचारास्ते पूयन्त्यपि कीकटाः॥ १९"},{"b":19570,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.20"],"text":"सर्वात्मना न हिंसन्ति भूतग्रामेषु किञ्चन।"},{"b":19571,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.20"],"text":"उच्चावचेषु दैत्येन्द्र मद्भावेन गतस्पृहाः॥ २०"},{"b":19572,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.21"],"text":"भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः।"},{"b":19573,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.21"],"text":"भवान्मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक्॥ २१"},{"b":19574,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.22"],"text":"कुरु त्वं प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः।"},{"b":19575,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.22"],"text":"मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान्यास्यति सुप्रजाः॥ २२"},{"b":19576,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.23"],"text":"पित्र्यं च स्थानमातिष्ठ यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः।"},{"b":19577,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.23"],"text":"मय्यावेश्य मनस्तात कुरु कर्माणि मत्परः॥ २३"},{"b":19578,"kind":"hindi_commentary","page":869,"explains":["7.10.18","7.10.19","7.10.20","7.10.21","7.10.22","7.10.23"],"text":"श्रीनृसिंहभगवान्‌ने कहा—निष्पाप प्रह्लाद! तुम्हारे पिता स्वयं पवित्र होकर तर गये, इसकी तो बात ही क्या है, यदि उनकी इक्कीस पीढ़ियोंके पितर होते तो उन सबके साथ भी वे तर जाते; क्योंकि तुम्हारे-जैसा कुलको पवित्र करनेवाला पुत्र उनको प्राप्त हुआ॥ १८॥ मेरे शान्त, समदर्शी और सुखसे सदाचार पालन करनेवाले प्रेमी भक्तजन जहाँ-जहाँ निवास करते हैं, वे स्थान चाहे कीकट ही क्यों न हों, पवित्र हो जाते हैं॥ १९॥ दैत्यराज! मेरे भक्तिभावसे जिनकी कामनाएँ नष्ट हो गयी हैं, वे सर्वत्र आत्मभाव हो जानेके कारण छोटे-बड़े किसी भी प्राणीको किसी भी प्रकारसे कष्ट नहीं पहुँचाते॥ २०॥ संसारमें जो लोग तुम्हारे अनुयायी होंगे, वे भी मेरे भक्त हो जायँगे। बेटा! तुम मेरे सभी भक्तोंके आदर्श हो॥ २१॥ यद्यपि मेरे अंगोंका स्पर्श होनेसे तुम्हारे पिता पूर्णरूपसे पवित्र हो गये हैं, तथापि तुम उनकी अन्त्येष्टि-क्रिया करो। तुम्हारे-जैसी सन्तानके कारण उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होगी॥ २२॥ वत्स! तुम अपने पिताके पदपर स्थित हो जाओ और वेदवादी मुनियोंकी आज्ञाके अनुसार मुझमें अपना मन लगाकर और मेरी शरणमें रहकर मेरी सेवाके लिये ही अपने सारे कार्य करो॥ २३॥"},{"b":19579,"kind":"topic_heading","page":869,"text":"नारद उवाच"},{"b":19580,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.24"],"text":"प्रह्रादोऽपि तथा चक्रे पितुर्यत्साम्परायिकम्।"},{"b":19581,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.24"],"text":"यथाऽऽह भगवान् राजन्‍नभिषिक्तो द्विजोत्तमैः॥ २४"},{"b":19582,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.25"],"text":"प्रसादसुमुखं दृष्ट्वा ब्रह्मा नरहरिं हरिम्।"},{"b":19583,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.25"],"text":"स्तुत्वा वाग्भिः पवित्राभिः प्राह देवादिभिर्वृतः॥ २५"},{"b":19584,"kind":"hindi_commentary","page":869,"explains":["7.10.24","7.10.25"],"text":"नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार प्रह्लादजीने अपने पिताकी अन्त्येष्टि-क्रिया की, इसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने उनका राज्याभिषेक किया॥ २४॥ इसी समय देवता, ऋषि आदिके साथ ब्रह्माजीने नृसिंहभगवान्‌को प्रसन्‍नवदन देखकर पवित्र वचनोंके द्वारा उनकी स्तुति की और उनसे यह बात कही॥ २५॥"},{"b":19585,"kind":"topic_heading","page":869,"text":"ब्रह्मोवाच"},{"b":19586,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.26"],"text":"देवदेवाखिलाध्यक्ष भूतभावन पूर्वज।"},{"b":19587,"kind":"sanskrit_shloka","page":869,"verses":["7.10.26"],"text":"दिष्ट्या ते निहतः पापो लोकसन्तापनोऽसुरः॥ २६"},{"b":19588,"kind":"hindi_commentary","page":869,"explains":["7.10.26"],"text":"ब्रह्माजीने कहा—देवताओंके आराध्यदेव! आप सर्वान्तर्यामी, जीवोंके जीवनदाता और मेरे भी पिता हैं। यह पापी दैत्य लोगोंको बहुत ही सता रहा था। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपने इसे मार डाला॥ २६॥"},{"b":19589,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.27"],"text":"योऽसौ लब्धवरो मत्तो न वध्यो मम सृष्टिभिः।"},{"b":19590,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.27"],"text":"तपोयोगबलोन्‍नद्धः समस्तनिगमानहन्॥ २७"},{"b":19591,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.28"],"text":"दिष्ट्यास्य तनयः साधुर्महाभागवतोऽर्भकः।"},{"b":19592,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.28"],"text":"त्वया विमोचितो मृत्योर्दिष्ट्या त्वां समितोऽधुना॥ २८"},{"b":19593,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.29"],"text":"एतद् वपुस्ते भगवन्ध्यायतः प्रयतात्मनः।"},{"b":19594,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.29"],"text":"सर्वतो गोप्तृ संत्रासान्मृत्योरपि जिघांसतः॥ २९"},{"b":19595,"kind":"hindi_commentary","page":870,"explains":["7.10.27","7.10.28","7.10.29"],"text":"मैंने इसे वर दे दिया था कि मेरी सृष्टिका कोई भी प्राणी तुम्हारा वध न कर सकेगा। इससे यह मतवाला हो गया था। तपस्या, योग और बलके कारण उच्छृङ्खल होकर इसने वेदविधियोंका उच्छेद कर दिया था॥ २७॥ यह भी बड़े सौभाग्यकी बात है कि इसके पुत्र परमभागवत शुद्धहृदय नन्हे-से शिशु प्रह्लादको आपने मृत्युके मुखसे छुड़ा दिया; तथा यह भी बड़े आनन्द और मंगलकी बात है कि वह अब आपकी शरणमें है॥ २८॥ भगवन्! आपके इस नृसिंहरूपका ध्यान जो कोई एकाग्र मनसे करेगा, उसे यह सब प्रकारके भयोंसे बचा लेगा। यहाँतक कि मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्यु भी उसका कुछ न बिगाड़ सकेगी॥ २९॥"},{"b":19596,"kind":"topic_heading","page":870,"text":"नृसिंह उवाच"},{"b":19597,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.30"],"text":"मैवं वरोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव।"},{"b":19598,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.30"],"text":"वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा॥ ३०"},{"b":19599,"kind":"hindi_commentary","page":870,"explains":["7.10.30"],"text":"श्रीनृसिंहभगवान् बोले—ब्रह्माजी! आप दैत्योंको ऐसा वर न दिया करें। जो स्वभावसे ही क्रूर हैं, उनको दिया हुआ वर तो वैसा ही है जैसा साँपोंको दूध पिलाना॥ ३०॥"},{"b":19600,"kind":"topic_heading","page":869,"text":"नारद उवाच"},{"b":19601,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.31"],"text":"इत्युक्‍त्वा भगवान्राजंस्तत्रैवान्तर्दधे हरिः।"},{"b":19602,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.31"],"text":"अदृश्यः सर्वभूतानां पूजितः परमेष्ठिना॥ ३१"},{"b":19603,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.32"],"text":"ततः सम्पूज्य शिरसा ववन्दे परमेष्ठिनम्।"},{"b":19604,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.32"],"text":"भवं प्रजापतीन्देवान्प्रह्रादो भगवत्कलाः॥ ३२"},{"b":19605,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.33"],"text":"ततः काव्यादिभिः सार्धं मुनिभिः कमलासनः।"},{"b":19606,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.33"],"text":"दैत्यानां दानवानां च प्रह्रादमकरोत् पतिम्॥ ३३"},{"b":19607,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.34"],"text":"प्रतिनन्द्य ततो देवाः प्रयुज्य परमाशिषः।"},{"b":19608,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.34"],"text":"स्वधामानि ययू राजन्ब्रह्माद्याः प्रतिपूजिताः॥ ३४"},{"b":19609,"kind":"hindi_commentary","page":870,"explains":["7.10.31","7.10.32","7.10.33","7.10.34"],"text":"नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नृसिंहभगवान् इतना कहकर और ब्रह्माजीके द्वारा की हुई पूजाको स्वीकार करके वहीं अन्तर्धान—समस्त प्राणियोंके लिये अदृश्य हो गये॥ ३१॥ इसके बाद प्रह्लादजीने भगवत्स्वरूप ब्रह्मा-शंकरकी तथा प्रजापति और देवताओंकी पूजा करके उन्हें माथा टेककर प्रणाम किया॥ ३२॥ तब शुक्राचार्य आदि मुनियोंके साथ ब्रह्माजीने प्रह्लादजीको समस्त दानव और दैत्योंका अधिपति बना दिया॥ ३३॥ फिर ब्रह्मादि देवताओंने प्रह्लादका अभिनन्दन किया और उन्हें शुभाशीर्वाद दिये। प्रह्लादजीने भी यथायोग्य सबका सत्कार किया और वे लोग अपने-अपने लोकोंको चले गये॥ ३४॥"},{"b":19610,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.35"],"text":"एवं तौ पार्षदौ विष्णोः पुत्रत्वं प्रापितौ दितेः।"},{"b":19611,"kind":"sanskrit_shloka","page":870,"verses":["7.10.35"],"text":"हृदि स्थितेन हरिणा वैरभावेन तौ हतौ॥ ३५"},{"b":19612,"kind":"hindi_commentary","page":870,"explains":["7.10.35"],"text":"युधिष्ठिर! इस प्रकार भगवान्‌के वे दोनों पार्षद जय और विजय दितिके पुत्र दैत्य हो गये थे। वे भगवान्‌से वैरभाव रखते थे। उनके हृदयमें रहनेवाले भगवान्‌ने उनका उद्धार करनेके लिये उन्हें मार डाला॥ ३५॥"},{"b":19613,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.36"],"text":"पुनश्‍च विप्रशापेन राक्षसौ तौ बभूवतुः।"},{"b":19614,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.36"],"text":"कुम्भकर्णदशग्रीवौ हतौ तौ रामविक्रमैः॥ ३६"},{"b":19615,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.37"],"text":"शयानौ युधि निर्भिन्‍नहृदयौ रामसायकैः।"},{"b":19616,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.37"],"text":"तच्चित्तौ जहतुर्देहं यथा प्राक्तनजन्मनि॥ ३७"},{"b":19617,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.38"],"text":"ताविहाथ पुनर्जातौ शिशुपालकरूषजौ।"},{"b":19618,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.38"],"text":"हरौ वैरानुबन्धेन पश्यतस्ते समीयतुः॥ ३८"},{"b":19619,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.39"],"text":"एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः।"},{"b":19620,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.39"],"text":"जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा॥ ३९"},{"b":19621,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.40"],"text":"यथा यथा भगवतो भक्‍त्या परमयाभिदा।"},{"b":19622,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.40"],"text":"नृपाश्चैद्यादयः सात्म्यं हरेस्तच्चिन्तया ययुः॥ ४०"},{"b":19623,"kind":"hindi_commentary","page":871,"explains":["7.10.36","7.10.37","7.10.38","7.10.39","7.10.40"],"text":"ऋषियोंके शापके कारण उनकी मुक्ति नहीं हुई, वे फिरसे कुम्भकर्ण और रावणके रूपमें राक्षस हुए। उस समय भगवान् श्रीरामके पराक्रमसे उनका अन्त हुआ॥ ३६॥ युद्धमें भगवान् रामके बाणोंसे उनका कलेजा फट गया। वहीं पड़े-पड़े पूर्वजन्मकी भाँति भगवान्‌का स्मरण करते-करते उन्होंने अपने शरीर छोड़े॥ ३७॥ वे ही अब इस युगमें शिशुपाल और दन्तवक्‍त्रके रूपमें पैदा हुए थे। भगवान्‌के प्रति वैरभाव होनेके कारण तुम्हारे सामने ही वे उनमें समा गये॥ ३८॥ युधिष्ठिर! श्रीकृष्णसे शत्रुता रखनेवाले सभी राजा अन्तसमयमें श्रीकृष्णके स्मरणसे तद्रूप होकर अपने पूर्वकृत पापोंसे सदाके लिये मुक्त हो गये। जैसे भृंगीके द्वारा पकड़ा हुआ कीड़ा भयसे ही उसका स्वरूप प्राप्त कर लेता है॥ ३९॥ जिस प्रकार भगवान्‌के प्यारे भक्त अपनी भेद-भावरहित अनन्य भक्तिके द्वारा भगवत्स्वरूपको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही शिशुपाल आदि नरपति भी भगवान्‌के वैरभावजनित अनन्य चिन्तनसे भगवान्‌के सारूप्यको प्राप्त हो गये॥ ४०॥"},{"b":19624,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.41"],"text":"आख्यातं सर्वमेतत् ते यन्मां त्वं परिपृष्टवान्।"},{"b":19625,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.41"],"text":"दमघोषसुतादीनां हरेः सात्म्यमपि द्विषाम्॥ ४१"},{"b":19626,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.42"],"text":"एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः।"},{"b":19627,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.42"],"text":"अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः॥ ४२"},{"b":19628,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.43"],"text":"प्रह्रादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च।"},{"b":19629,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.43"],"text":"भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्‍च याथात्म्यं चास्य वै हरेः॥ ४३"},{"b":19630,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.44"],"text":"सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम्।"},{"b":19631,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.44"],"text":"परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान्॥ ४४"},{"b":19632,"kind":"hindi_commentary","page":871,"explains":["7.10.41","7.10.42","7.10.43","7.10.44"],"text":"युधिष्ठिर! तुमने मुझसे पूछा था कि भगवान्‌से द्वेष करनेवाले शिशुपाल आदिको उनके सारूप्यकी प्राप्ति कैसे हुई। उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया॥ ४१॥ ब्रह्मण्यदेव परमात्मा श्रीकृष्णका यह परम पवित्र अवतार-चरित्र है। इसमें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु इन दोनों दैत्योंके वधका वर्णन है॥ ४२॥ इस प्रसंगमें भगवान्‌के परम भक्त प्रह्लादका चरित्र, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके स्वामी श्रीहरिके यथार्थ स्वरूप तथा उनके दिव्य गुण एवं लीलाओंका वर्णन है। इस आख्यानमें देवता और दैत्योंके पदोंमें कालक्रमसे जो महान् परिवर्तन होता है, उसका भी निरूपण किया गया है॥ ४३-४४॥"},{"b":19633,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.45"],"text":"धर्मो भागवतानां च भगवान्येन गम्यते।"},{"b":19634,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.45"],"text":"आख्यानेऽस्मिन्समाम्नातमाध्यात्मिकमशेषतः॥ ४५"},{"b":19635,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.46"],"text":"य एतत् पुण्यमाख्यानं विष्णोर्वीर्योपबृंहितम्।"},{"b":19636,"kind":"sanskrit_shloka","page":871,"verses":["7.10.46"],"text":"कीर्तयेच्छ्रद्धया श्रुत्वा कर्मपाशैर्विमुच्यते॥ ४६"},{"b":19637,"kind":"hindi_commentary","page":871,"explains":["7.10.45","7.10.46"],"text":"जिसके द्वारा भगवान्‌की प्राप्ति होती है, उस भागवत-धर्मका भी वर्णन है। अध्यात्मके सम्बन्धमें भी सभी जाननेयोग्य बातें इसमें हैं॥ ४५॥ भगवान्‌के पराक्रमसे पूर्ण इस पवित्र आख्यानको जो कोई पुरुष श्रद्धासे कीर्तन करता और सुनता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ४६॥"},{"b":19638,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.47"],"text":"एतद् य आदिपुरुषस्य मृगेन्द्रलीलां"},{"b":19639,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.47"],"text":"दैत्येन्द्रयूथपवधं प्रयतः पठेत।"},{"b":19640,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.47"],"text":"दैत्यात्मजस्य च सतां प्रवरस्य पुण्यं"},{"b":19641,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.47"],"text":"श्रुत्वानुभावमकुतोभयमेति लोकम्॥ ४७"},{"b":19642,"kind":"hindi_commentary","page":872,"explains":["7.10.47"],"text":"जो मनुष्य परम पुरुष परमात्माकी यह श्रीनृसिंह-लीला, सेनापतियोंसहित हिरण्यकशिपुका वध और संतशिरोमणि प्रह्लादजीका पावन प्रभाव एकाग्र मनसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान्‌के अभयपद वैकुण्ठको प्राप्त होता है॥ ४७॥"},{"b":19643,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.48"],"text":"यूयं नृलोके बत भूरिभागा"},{"b":19644,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.48"],"text":"लोकं पुनाना मुनयोऽभियन्ति।"},{"b":19645,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.48"],"text":"येषां गृहानावसतीति साक्षाद्"},{"b":19646,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.48"],"text":"गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्॥ ४८"},{"b":19647,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.49"],"text":"स वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्य-"},{"b":19648,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.49"],"text":"कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।"},{"b":19649,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.49"],"text":"प्रियः सुहृद‍् वः खलु मातुलेय"},{"b":19650,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.49"],"text":"आत्मार्हणीयो विधिकृद् गुरुश्‍च॥ ४९"},{"b":19651,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.50"],"text":"न यस्य साक्षाद् भवपद्मजादिभी"},{"b":19652,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.50"],"text":"रूपं धिया वस्तुतयोपवर्णितम्।"},{"b":19653,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.50"],"text":"मौनेन भक्त्योपशमेन पूजितः"},{"b":19654,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.50"],"text":"प्रसीदतामेष स सात्वतां पतिः॥ ५०"},{"b":19655,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.51"],"text":"स एष भगवान्राजन्व्यतनोद् विहतं यशः।"},{"b":19656,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.51"],"text":"पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना॥ ५१"},{"b":19657,"kind":"hindi_commentary","page":872,"explains":["7.10.48","7.10.49","7.10.50","7.10.51"],"text":"युधिष्ठिर! इस मनुष्यलोकमें तुमलोगोंके भाग्य अत्यन्त प्रशंसनीय हैं, क्योंकि तुम्हारे घरमें साक्षात् परब्रह्म परमात्मा मनुष्यका रूप धारण करके गुप्तरूपसे निवास करते हैं। इसीसे सारे संसारको पवित्र कर देनेवाले ऋषि-मुनि बार-बार उनका दर्शन करनेके लिये चारों ओरसे तुम्हारे पास आया करते हैं॥ ४८॥ बड़े-बड़े महापुरुष निरन्तर जिनको ढूँढ़ते रहते हैं, जो मायाके लेशसे रहित परम शान्त परमानन्दानुभव-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा हैं—वे ही तुम्हारे प्रिय, हितैषी, ममेरे भाई, पूज्य, आज्ञाकारी, गुरु और स्वयं आत्मा श्रीकृष्ण हैं॥ ४९॥ शंकर, ब्रह्मा आदि भी अपनी सारी बुद्धि लगाकर ‘वे यह हैं’—इस रूपमें उनका वर्णन नहीं कर सके, फिर हम तो कर ही कैसे सकते हैं। हम तो मौन, भक्ति और संयमके द्वारा ही उनकी पूजा करते हैं। कृपया हमारी यह पूजा स्वीकार करके भक्तवत्सल भगवान् हमपर प्रसन्‍न हों॥ ५०॥ युधिष्ठिर! यही एकमात्र आराध्यदेव हैं। प्राचीन कालमें बहुत बड़े मायावी मयासुरने जब रुद्रदेवकी कमनीय कीर्तिमें कलंक लगाना चाहा था, तब इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने फिरसे उनके यशकी रक्षा और विस्तार किया था॥ ५१॥"},{"b":19658,"kind":"topic_heading","page":872,"text":"राजोवाच"},{"b":19659,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.52"],"text":"कस्मिन् कर्मणि देवस्य मयोऽहञ्जगदीशितुः।"},{"b":19660,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.52"],"text":"यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम्॥ ५२"},{"b":19661,"kind":"hindi_commentary","page":872,"explains":["7.10.52"],"text":"राजा युधिष्ठिरने पूछा—नारदजी! मयदानव किस कार्यमें जगदीश्‍वर रुद्रदेवका यश नष्ट करना चाहता था और भगवान् श्रीकृष्णने किस प्रकार उनके यशकी रक्षा की? आप कृपा करके बतलाइये॥ ५२॥"},{"b":19662,"kind":"topic_heading","page":872,"text":"नारद उवाच"},{"b":19663,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.53"],"text":"निर्जिता असुरा देवैर्युध्यनेनोपबृंहितैः।"},{"b":19664,"kind":"sanskrit_shloka","page":872,"verses":["7.10.53"],"text":"मायिनां परमाचार्यं मयं शरणमाययुः॥ ५३"},{"b":19665,"kind":"hindi_commentary","page":872,"explains":["7.10.53"],"text":"नारदजीने कहा—एक बार इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णसे शक्ति प्राप्त करके देवताओंने युद्धमें असुरोंको जीत लिया था। उस समय सब-के-सब असुर मायावियोंके परमगुरु मयदानवकी शरणमें गये॥ ५३॥"},{"b":19666,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.54"],"text":"स निर्माय पुरस्तिस्रो हैमीरौप्यायसीर्विभुः।"},{"b":19667,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.54"],"text":"दुर्लक्ष्यापायसंयोगा दुर्वितर्क्यपरिच्छदाः॥ ५४"},{"b":19668,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.55"],"text":"ताभिस्तेऽसुरसेनान्यो लोकांस्त्रीन् सेश्‍वरान् नृप।"},{"b":19669,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.55"],"text":"स्मरन्तो नाशयाञ्चक्रुः पूर्ववैरमलक्षिताः॥ ५५"},{"b":19670,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.56"],"text":"ततस्ते सेश्‍वरा लोका उपासाद्येश्‍वरं विभो।"},{"b":19671,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.56"],"text":"त्राहि नस्तावकान्देव विनष्टांस्त्रिपुरालयैः॥ ५६"},{"b":19672,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.54","7.10.55","7.10.56"],"text":"शक्तिशाली मयासुरने सोने, चाँदी और लोहेके तीन विमान बना दिये। वे विमान क्या थे, तीन पुर ही थे। वे इतने विलक्षण थे कि उनका आना-जाना जान नहीं पड़ता था। उनमें अपरिमित सामग्रियाँ भरी हुई थीं॥ ५४॥ युधिष्ठिर! दैत्यसेनापतियोंके मनमें तीनों लोक और लोकपतियोंके प्रति वैरभाव तो था ही, अब उसकी याद करके उन तीनों विमानोंके द्वारा वे उनमें छिपे रहकर सबका नाश करने लगे॥ ५५॥ तब लोकपालोंके साथ सारी प्रजा भगवान् शंकरकी शरणमें गयी और उनसे प्रार्थना की कि ‘प्रभो! त्रिपुरमें रहनेवाले असुर हमारा नाश कर रहे हैं। हम आपके हैं; अतः देवाधिदेव! आप हमारी रक्षा कीजिये’॥ ५६॥"},{"b":19673,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.57"],"text":"अथानुगृह्य भगवान्मा भैष्टेति सुरान्विभुः।"},{"b":19674,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.57"],"text":"शरं धनुषि सन्धाय पुरेष्वस्त्रं व्यमुञ्चत॥ ५७"},{"b":19675,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.57"],"text":"उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान् शंकरने कृपापूर्ण शब्दोंमें कहा—‘डरो मत।’ फिर उन्होंने अपने धनुषपर बाण चढ़ाकर तीनों पुरोंपर छोड़ दिया॥ ५७॥"},{"b":19676,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.58"],"text":"ततोऽग्‍निवर्णा इषव उत्पेतुः सूर्यमण्डलात्।"},{"b":19677,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.58"],"text":"यथा मयूखसंदोहा नादृश्यन्त पुरो यतः॥ ५८"},{"b":19678,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.58"],"text":"उनके उस बाणसे सूर्यमण्डलसे निकलनेवाली किरणोंके समान अन्य बहुत-से बाण निकले। उनमेंसे मानो आगकी लपटें निकल रही थीं। उनके कारण उन पुरोंका दीखना बंद हो गया॥ ५८॥"},{"b":19679,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.59"],"text":"तैः स्पृष्टा व्यसवः सर्वे निपेतुः स्म पुरौकसः।"},{"b":19680,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.59"],"text":"तानानीय महायोगी मयः कूपरसेऽक्षिपत्॥ ५९"},{"b":19681,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.59"],"text":"उनके स्पर्शसे सभी विमानवासी निष्प्राण होकर गिर पड़े। महामायावी मय बहुत-से उपाय जानता था, वह उन दैत्योंको उठा लाया और अपने बनाये हुए अमृतके कुएँमें डाल दिया॥ ५९॥"},{"b":19682,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.60"],"text":"सिद्धामृतरसस्पृष्टा वज्रसारा महौजसः।"},{"b":19683,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.60"],"text":"उत्तस्थुर्मेघदलना वैद्युता इव वह्नयः॥ ६०"},{"b":19684,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.60"],"text":"उस सिद्ध अमृत-रसका स्पर्श होते ही असुरोंका शरीर अत्यन्त तेजस्वी और वज्रके समान सुदृढ़ हो गया। वे बादलोंको विदीर्ण करनेवाली बिजलीकी आगकी तरह उठ खड़े हुए॥ ६०॥"},{"b":19685,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.61"],"text":"विलोक्य भग्नसङ्कल्पं विमनस्कं वृषध्वजम्।"},{"b":19686,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.61"],"text":"तदायं भगवान्विष्णुस्तत्रोपायमकल्पयत्॥ ६१"},{"b":19687,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.61"],"text":"इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि महादेवजी तो अपना संकल्प पूरा न होनेके कारण उदास हो गये हैं, तब उन असुरोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये इन्होंने एक युक्ति की॥ ६१॥"},{"b":19688,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.62"],"text":"वत्स आसीत्तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः।"},{"b":19689,"kind":"sanskrit_shloka","page":873,"verses":["7.10.62"],"text":"प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ॥ ६२"},{"b":19690,"kind":"hindi_commentary","page":873,"explains":["7.10.62"],"text":"यही भगवान् विष्णु उस समय गौ बन गये और ब्रह्माजी बछड़ा बने। दोनों ही मध्याह्नके समय उन तीनों पुरोंमें गये और उस सिद्धरसके कुएँका सारा अमृत पी गये॥ ६२॥"},{"b":19691,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.63"],"text":"तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिताः।"},{"b":19692,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.63"],"text":"तद् विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ॥ ६३"},{"b":19693,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.64"],"text":"स्वयं विशोकः शोकार्तान्स्मरन्दैवगतिं च ताम्।"},{"b":19694,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.64"],"text":"देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्‍वरोऽस्तीह कश्‍चन॥ ६४"},{"b":19695,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.65"],"text":"आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः।"},{"b":19696,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.65"],"text":"अथासौ शक्तिभिः स्वाभिः शम्भोः प्राधानिकं व्यधात्॥ ६५"},{"b":19697,"kind":"hindi_commentary","page":874,"explains":["7.10.63","7.10.64","7.10.65"],"text":"यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनोंको देख रहे थे, फिर भी भगवान्‌की मायासे वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके। जब उपाय जाननेवालोंमें श्रेष्ठ मयासुरको यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌की इस लीलाका स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करनेवाले अमृत-रक्षकोंसे उसने कहा—‘भाई! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनोंके लिये जो प्रारब्धका विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है?’ इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपनी शक्तियोंके द्वारा भगवान् शंकरके युद्धकी सामग्री तैयार की॥ ६३—६५॥"},{"b":19698,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.66"],"text":"धर्मज्ञानविरक्त्यृद्धितपोविद्याक्रियादिभिः।"},{"b":19699,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.66"],"text":"रथं सूतं ध्वजं वाहान्धनुर्वर्म शरादि यत्॥ ६६"},{"b":19700,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.67"],"text":"सन्‍नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे।"},{"b":19701,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.67"],"text":"शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेऽभिजितीश्‍वरः॥ ६७"},{"b":19702,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.68"],"text":"ददाह तेन दुर्भेद्या हरोऽथ त्रिपुरो नृप।"},{"b":19703,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.68"],"text":"दिवि दुन्दुभयो नेदुर्विमानशतसङ्कुलाः॥ ६८"},{"b":19704,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.69"],"text":"देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः।"},{"b":19705,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.69"],"text":"अवाकिरञ्जगुर्हृष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६९"},{"b":19706,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.70"],"text":"एवं दग्ध्वा पुरस्तिस्रो भगवान्पुरहा नृप।"},{"b":19707,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.70"],"text":"ब्रह्मादिभिः स्तूयमानः स्वधाम प्रत्यपद्यत॥ ७०"},{"b":19708,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.71"],"text":"एवंविधान्यस्य हरेः स्वमायया"},{"b":19709,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.71"],"text":"विडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः।"},{"b":19710,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.71"],"text":"वीर्याणि गीतान्यृषिभिर्जगद‍्गुरो-"},{"b":19711,"kind":"sanskrit_shloka","page":874,"verses":["7.10.71"],"text":"र्लोकान् पुनानान्यपरं वदामि किम्॥ ७१"},{"b":19712,"kind":"hindi_commentary","page":874,"explains":["7.10.66","7.10.67","7.10.68","7.10.69","7.10.70","7.10.71"],"text":"उन्होंने धर्मसे रथ, ज्ञानसे सारथि, वैराग्यसे ध्वजा, ऐश्‍वर्यसे घोड़े, तपस्यासे धनुष, विद्यासे कवच, क्रियासे बाण और अपनी अन्यान्य शक्तियोंसे अन्यान्य वस्तुओंका निर्माण किया॥ ६६॥ इन सामग्रियोंसे सज-धजकर भगवान् शंकर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान् शंकरने अभिजित् मुहूर्तमें धनुषपर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानोंको भस्म कर दिया। युधिष्ठिर! उसी समय स्वर्गमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैकड़ों विमानोंकी भीड़ लग गयी॥ ६७-६८॥ देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्‍वर आनन्दसे जय-जयकार करते हुए पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं॥ ६९॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार उन तीनों पुरोंको जलाकर भगवान् शंकरने ‘पुरारि’की पदवी प्राप्त की और ब्रह्मादिकोंकी स्तुति सुनते हुए अपने धामको चले गये॥ ७०॥ आत्मस्वरूप जगद‍्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनी मायासे जो मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करते हैं, ऋषिलोग उन्हीं अनेकों लोकपावन लीलाओंका गान किया करते हैं। बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ?॥ ७१॥"},{"b":19713,"kind":"hindi_translation","page":874,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां सप्तमस्कन्धे युधिष्ठिरनारदसंवादे त्रिपुरविजयो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥"}],"notes":[{"id":"v1:907","mark":"१","page":867,"after_verse":"7.10.2","text":"प्रा० पा०—नैतेषु।"},{"id":"v1:908","mark":"२","page":867,"after_verse":"7.10.4","text":"प्रा० पा०—घटते।"},{"id":"v1:909","mark":"३","page":867,"after_verse":"7.10.6","text":"प्रा० पा०—रिह।"},{"id":"v1:910","mark":"४","page":867,"after_verse":"7.10.7","text":"प्रा० पा०—दास्यसि।"},{"id":"v1:911","mark":"१","page":870,"after_verse":"7.10.27","text":"प्रा० पा०—बलोन्मत्तः।"},{"id":"v1:912","mark":"२","page":870,"after_verse":"7.10.28","text":"प्रा० पा०—ते।"},{"id":"v1:913","mark":"३","page":870,"after_verse":"7.10.28","text":"प्रा० पा०—तन्‍नियतोऽधुना।"},{"id":"v1:914","mark":"१","page":872,"after_verse":"7.10.47","text":"प्रा० पा०—लोकान्।"},{"id":"v1:915","mark":"२","page":872,"after_verse":"7.10.48","text":"प्रा० पा०—यान्ति।"},{"id":"v1:916","mark":"३","page":872,"after_verse":"7.10.49","text":"प्रा० पा०—सर्वाश्रयं ब्रह्म।"},{"id":"v1:917","mark":"४","page":872,"after_verse":"7.10.50","text":"प्रा० पा०—वस्तु तदानुव०।"}],"corrections":{"count":12,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}