{"id":"6.7","title":"षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7","part":"षष्ठ स्कन्ध","heading":"अथ सप्तमोऽध्यायः","topics":["बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्‍वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[734,738]},"verses":[{"id":"6.7.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/1/","page":734,"speaker":"राजोवाच","sanskrit":["कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः।","एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ॥ १"],"iast":["kasya hetoḥ parityaktā ācāryeṇātmanaḥ surāḥ|","etadācakṣva bhagavañchiṣyāṇāmakramaṃ gurau|| 1"],"meaning":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय शिष्य देवताओंको किस कारण त्याग दिया था? देवताओंने अपने गुरुदेवका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये॥ १॥"},{"id":"6.7.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/2/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["इन्द्रस्त्रिभुवनैश्‍वर्यमदोल्लङ्घितसत्पथः ।","मरुद्भिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप॥ २"],"iast":["indrastribhuvanaiśvaryamadollaṅghitasatpathaḥ |","marudbhirvasubhī rudrairādityair:ṛbhubhirnṛpa|| 2"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥","meaning_covers":[2,6]},{"id":"6.7.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/3/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विश्वेदेवैश्‍च साध्यैश्‍च नासत्याभ्यां परिश्रितः।","सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ३"],"iast":["viśvedevaiśca sādhyaiśca nāsatyābhyāṃ pariśritaḥ|","siddhacāraṇagandharvairmunibhirbrahmavādibhiḥ || 3"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥","meaning_covers":[2,6]},{"id":"6.7.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/4/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["विद्याधराप्सरोभिश्‍च किन्‍नरैः पतगोरगैः।","निषेव्यमाणो मघवान् स्तूयमानश्‍च भारत॥ ४"],"iast":["vidyādharāpsarobhiśca kinnaraiḥ patagoragaiḥ|","niṣevyamāṇo maghavān stūyamānaśca bhārata|| 4"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥","meaning_covers":[2,6]},{"id":"6.7.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/5/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाश्रितः।","पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा॥ ५"],"iast":["upagīyamāno lalitamāsthānādhyāsanāśritaḥ|","pāṇḍureṇātapatreṇa candramaṇḍalacāruṇā|| 5"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥","meaning_covers":[2,6]},{"id":"6.7.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/6/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["युक्तश्चान्यैः पारमेष्ठ्यैश्चामरव्यजनादिभिः।","विराजमानः पौलोम्या सहार्धासनया भृशम्॥ ६"],"iast":["yuktaścānyaiḥ pārameṣṭhyaiścāmaravyajanādibhiḥ|","virājamānaḥ paulomyā sahārdhāsanayā bhṛśam|| 6"],"meaning":"श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥","meaning_covers":[2,6]},{"id":"6.7.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/7/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्‍च ह।","नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः॥ ७"],"iast":["sa yadā paramācāryaṃ devānāmātmanaśca ha|","nābhyanandata saṃprāptaṃ pratyutthānāsanādibhiḥ|| 7"],"meaning":"इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये। उन्हें सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं। इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परन्तु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरुका सत्कार ही किया। यहाँतक कि वे अपने आसनसे हिले-डुलेतक नहीं॥ ७-८॥","meaning_covers":[7,8]},{"id":"6.7.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/8/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्।","नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्‍नपि सभागतम्॥ ८"],"iast":["vācaspatiṃ munivaraṃ surāsuranamaskṛtam|","noccacālāsanādindraḥ paśyannapi sabhāgatam|| 8"],"meaning":"इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये। उन्हें सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं। इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परन्तु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरुका सत्कार ही किया। यहाँतक कि वे अपने आसनसे हिले-डुलेतक नहीं॥ ७-८॥","meaning_covers":[7,8]},{"id":"6.7.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/9/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरसः प्रभुः।","आययौ स्वगृहं तूष्णीं विद्वान् श्रीमदविक्रियाम्॥ ९"],"iast":["tato nirgatya sahasā kavirāṅgirasaḥ prabhuḥ|","āyayau svagṛhaṃ tūṣṇīṃ vidvān śrīmadavikriyām|| 9"],"meaning":"त्रिकालदर्शी समर्थ बृहस्पतिजीने देखा कि यह ऐश्‍वर्यमदका दोष है! बस, वे झटपट वहाँसे निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये॥ ९॥"},{"id":"6.7.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/10/","page":734,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तर्ह्येव प्रतिबुद्ध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः।","गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना॥ १०"],"iast":["tarhyeva pratibuddhyendro guruhelanamātmanaḥ|","garhayāmāsa sadasi svayamātmānamātmanā|| 10"],"meaning":"परीक्षित्! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है। वे भरी सभामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे॥ १०॥"},{"id":"6.7.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/11/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अहो बत ममासाधु कृतं वै दभ्रबुद्धिना।","यन्मयैश्‍वर्यमत्तेन गुरुः सदसि कात्कृतः॥ ११"],"iast":["aho bata mamāsādhu kṛtaṃ vai dabhrabuddhinā|","yanmayaiśvaryamattena guruḥ sadasi kātkṛtaḥ|| 11"],"meaning":"‘हाय-हाय! बड़े खेदकी बात है कि भरी सभामें मूर्खतावश मैंने ऐश्‍वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेवका तिरस्कार कर दिया। सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है॥ ११॥"},{"id":"6.7.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/12/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["को गृध्येत् पण्डितो लक्ष्मीं त्रिविष्टपपतेरपि।","ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्‍वरः॥ १२"],"iast":["ko gṛdhyet paṇḍito lakṣmīṃ triviṣṭapapaterapi|","yayāhamāsuraṃ bhāvaṃ nīto'dya vibudheśvaraḥ|| 12"],"meaning":"भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्गकी राजलक्ष्मीको पानेकी इच्छा करेगा? देखो तो सही, आज इसीने मुझ देवराजको भी असुरोंके-से रजोगुणी भावसे भर दिया॥ १२॥"},{"id":"6.7.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/13/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["ये पारमेष्ठ्यं धिषणमधितिष्ठन् न कञ्चन।","प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्मं ते न परं विदुः॥ १३"],"iast":["ye pārameṣṭhyaṃ dhiṣaṇamadhitiṣṭhan na kañcana|","pratyuttiṣṭhediti brūyurdharmaṃ te na paraṃ viduḥ|| 13"],"meaning":"जो लोग यह कहते हैं कि सार्वभौम राजसिंहासनपर बैठा हुआ सम्राट् किसीके आनेपर राजसिंहासनसे न उठे, वे धर्मका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते॥ १३॥"},{"id":"6.7.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/14/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेषां कुपथदेष्टॄणां पततां तमसि ह्यधः।","ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इव॥ १४"],"iast":["teṣāṃ kupathadeṣṭṝṇāṃ patatāṃ tamasi hyadhaḥ|","ye śraddadhyurvacaste vai majjantyaśmaplavā iva|| 14"],"meaning":"ऐसा उपदेश करनेवाले कुमार्गकी ओर ले जानेवाले हैं। वे स्वयं घोर नरकमें गिरते हैं। उनकी बातपर जो लोग विश्वास करते हैं, वे पत्थरकी नावकी तरह डूब जाते हैं॥ १४॥"},{"id":"6.7.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/15/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम्।","प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन्॥ १५"],"iast":["athāhamamarācāryamagādhadhiṣaṇaṃ dvijam|","prasādayiṣye niśaṭhaḥ śīrṣṇā taccaraṇaṃ spṛśan|| 15"],"meaning":"मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा’॥ १५॥"},{"id":"6.7.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/16/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान् गृहात्।","बृहस्पतिर्गतोऽदृष्टां गतिमध्यात्ममायया॥ १६"],"iast":["evaṃ cintayatastasya maghono bhagavān gṛhāt|","bṛhaspatirgato'dṛṣṭāṃ gatimadhyātmamāyayā|| 16"],"meaning":"परीक्षित्! देवराज इन्द्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् बृहस्पतिजी अपने घरसे निकलकर योगबलसे अन्तर्धान हो गये॥ १६॥"},{"id":"6.7.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/17/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन् भगवान् स्वराट्।","ध्यायन् धिया सुरैर्युक्तः शर्म नालभतात्मनः॥ १७"],"iast":["gurornādhigataḥ saṃjñāṃ parīkṣan bhagavān svarāṭ|","dhyāyan dhiyā surairyuktaḥ śarma nālabhatātmanaḥ|| 17"],"meaning":"देवराज इन्द्रने अपने गुरुदेवको बहुत ढूँढ़ा-ढुँढ़वाया; परन्तु उनका कहीं पता न चला। तब वे गुरुके बिना अपनेको सुरक्षित न समझकर देवताओंके साथ अपनी बुद्धिके अनुसार स्वर्गकी रक्षाका उपाय सोचने लगे, परन्तु वे कुछ भी सोच न सके! उनका चित्त अशान्त ही बना रहा॥ १७॥"},{"id":"6.7.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/18/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तच्छ्रुत्वैवासुराः सर्व आश्रित्यौशनसं मतम्।","देवान् प्रत्युद्यमं चक्रुर्दुर्मदा आततायिनः॥ १८"],"iast":["tacchrutvaivāsurāḥ sarva āśrityauśanasaṃ matam|","devān pratyudyamaṃ cakrurdurmadā ātatāyinaḥ|| 18"],"meaning":"परीक्षित्! दैत्योंको भी देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्रकी अनबनका पता लग गया। तब उन मदोन्मत्त और आततायी असुरोंने अपने गुरु शुक्राचार्यके आदेशानुसार देवताओंपर विजय पानेके लिये धावा बोल दिया॥ १८॥"},{"id":"6.7.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/19/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तैर्विसृष्टेषुभिस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्‍नाङ्गोरुबाहवः।","ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहेन्द्रा नतकन्धराः॥ १९"],"iast":["tairvisṛṣṭeṣubhistīkṣṇairnirbhinnāṅgorubāhavaḥ|","brahmāṇaṃ śaraṇaṃ jagmuḥ sahendrā natakandharāḥ|| 19"],"meaning":"उन्होंने देवताओंपर इतने तीखे-तीखे बाणोंकी वर्षा की कि उनके मस्तक, जंघा, बाहु आदि अंग कट-कटकर गिरने लगे। तब इन्द्रके साथ सभी देवता सिर झुकाकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये॥ १९॥"},{"id":"6.7.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/20/","page":735,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तांस्तथाभ्यर्दितान् वीक्ष्य भगवानात्मभूरजः।","कृपया परया देव उवाच परिसान्त्वयन्॥ २०"],"iast":["tāṃstathābhyarditān vīkṣya bhagavānātmabhūrajaḥ|","kṛpayā parayā deva uvāca parisāntvayan|| 20"],"meaning":"स्वयम्भू एवं समर्थ ब्रह्माजीने देखा कि देवताओंकी तो सचमुच बड़ी दुर्दशा हो रही है। अतः उनका हृदय अत्यन्त करुणासे भर गया। वे देवताओंको धीरज बँधाते हुए कहने लगे॥ २०॥"},{"id":"6.7.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/21/","page":736,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["अहो बत सुरश्रेष्ठ ह्यभद्रं वः कृतं महत्।","ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं दान्तमैश्‍वर्यान्‍नाभ्यनन्दत॥ २१"],"iast":["aho bata suraśreṣṭha hyabhadraṃ vaḥ kṛtaṃ mahat|","brahmiṣṭhaṃ brāhmaṇaṃ dāntamaiśvaryānnābhyanandata|| 21"],"meaning":"ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! यह बड़े खेदकी बात है। सचमुच तुमलोगोंने बहुत बुरा काम किया। हरे, हरे! तुमलोगोंने ऐश्‍वर्यके मदसे अंधे होकर ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ एवं संयमी ब्राह्मणका सत्कार नहीं किया॥ २१॥"},{"id":"6.7.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/22/","page":736,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["तस्यायमनयस्यासीत् परेभ्यो वः पराभवः।","प्रक्षीणेभ्यः स्ववैरिभ्यः समृद्धानां च यत् सुराः॥ २२"],"iast":["tasyāyamanayasyāsīt parebhyo vaḥ parābhavaḥ|","prakṣīṇebhyaḥ svavairibhyaḥ samṛddhānāṃ ca yat surāḥ|| 22"],"meaning":"देवताओ! तुम्हारी उसी अनीतिका यह फल है कि आज समृद्धिशाली होनेपर भी तुम्हें अपने निर्बल शत्रुओंके सामने नीचा देखना पड़ा॥ २२॥"},{"id":"6.7.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/23/","page":736,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["मघवन् द्विषतः पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात्।","सम्प्रत्युपचितान् भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः।","आददीरन् निलयनं ममापि भृगुदेवताः॥ २३"],"iast":["maghavan dviṣataḥ paśya prakṣīṇān gurvatikramāt|","sampratyupacitān bhūyaḥ kāvyamārādhya bhaktitaḥ|","ādadīran nilayanaṃ mamāpi bhṛgudevatāḥ|| 23"],"meaning":"देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परन्तु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन-जनसे सम्पन्‍न हो गये हैं। देवताओ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे॥ २३॥"},{"id":"6.7.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/24/","page":736,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["त्रिविष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य-","मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षितार्थाः।","न विप्रगोविन्दगवीश्‍वराणां","भवन्त्यभद्राणि नरेश्‍वराणाम्॥ २४"],"iast":["triviṣṭapaṃ kiṃ gaṇayantyabhedya-","mantrā bhṛgūṇāmanuśikṣitārthāḥ|","na vipragovindagavīśvarāṇāṃ","bhavantyabhadrāṇi nareśvarāṇām|| 24"],"meaning":"भृगुवंशियोंने इन्हें अर्थशास्त्रकी पूरी-पूरी शिक्षा दे रखी है। ये जो कुछ करना चाहते हैं, उसका भेद तुमलोगोंको नहीं मिल पाता। उनकी सलाह बहुत गुप्त होती है। ऐसी स्थितिमें वे स्वर्गको तो समझते ही क्या हैं, वे चाहे जिस लोकको जीत सकते हैं। सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गोविन्द और गौओंको अपना सर्वस्व मानते हैं और जिनपर उनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमंगल नहीं होता॥ २४॥"},{"id":"6.7.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/25/","page":736,"speaker":"ब्रह्मोवाच","sanskrit":["तद् विश्‍वरूपं भजताशु विप्रं","तपस्विनं त्वाष्ट्रमथात्मवन्तम्।","सभाजितोऽर्थान् स विधास्यते वो","यदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म॥ २५"],"iast":["tad viśvarūpaṃ bhajatāśu vipraṃ","tapasvinaṃ tvāṣṭramathātmavantam|","sabhājito'rthān sa vidhāsyate vo","yadi kṣamiṣyadhvamutāsya karma|| 25"],"meaning":"इसलिये अब तुमलोग शीघ्र ही त्वष्टाके पुत्र विश्‍वरूपके पास जाओ और उन्हींकी सेवा करो। वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं। यदि तुमलोग उनके असुरोंके प्रति प्रेमको क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे॥ २५॥"},{"id":"6.7.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/26/","page":736,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["त एवमुदिता राजन् ब्रह्मणा विगतज्वराः।","ऋषिं त्वाष्ट्रमुपव्रज्य परिष्वज्येदमब्रुवन्॥ २६"],"iast":["ta evamuditā rājan brahmaṇā vigatajvarāḥ|","ṛṣiṃ tvāṣṭramupavrajya pariṣvajyedamabruvan|| 26"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब ब्रह्माजीने देवताओंसे इस प्रकार कहा, तब उनकी चिन्ता दूर हो गयी। वे त्वष्टाके पुत्र विश्‍वरूप ऋषिके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर यों कहने लगे॥ २६॥"},{"id":"6.7.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/27/","page":736,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते।","कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः॥ २७"],"iast":["vayaṃ te'tithayaḥ prāptā āśramaṃ bhadramastu te|","kāmaḥ sampādyatāṃ tāta pitṝṇāṃ samayocitaḥ|| 27"],"meaning":"देवताओंने कहा—बेटा विश्‍वरूप! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं। हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित्त अभिलाषा पूर्ण करो॥ २७॥"},{"id":"6.7.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/28/","page":737,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम्।","अपि पुत्रवतां ब्रह्मन् किमुत ब्रह्मचारिणाम्॥ २८"],"iast":["putrāṇāṃ hi paro dharmaḥ pitṛśuśrūṣaṇaṃ satām|","api putravatāṃ brahman kimuta brahmacāriṇām|| 28"],"meaning":"जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है॥ २८॥"},{"id":"6.7.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/29/","page":737,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः।","भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनुः॥ २९"],"iast":["ācāryo brahmaṇo mūrtiḥ pitā mūrtiḥ prajāpateḥ|","bhrātā marutpatermūrtirmātā sākṣāt kṣitestanuḥ|| 29"],"meaning":"वत्स! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजीकी, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वीकी मूर्ति होती है॥ २९॥"},{"id":"6.7.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/30/","page":737,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम्।","अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः॥ ३०"],"iast":["dayāyā bhaginī mūrtirdharmasyātmātithiḥ svayam|","agnerabhyāgato mūrtiḥ sarvabhūtāni cātmanaḥ|| 30"],"meaning":"(इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्‍निकी और जगत‍्के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं॥ ३०॥"},{"id":"6.7.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/31/","page":737,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["तस्मात् पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम्।","तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि॥ ३१"],"iast":["tasmāt pitṝṇāmārtānāmārtiṃ paraparābhavam|","tapasāpanayaṃstāta sandeśaṃ kartumarhasi|| 31"],"meaning":"पुत्र! हम तुम्हारे पितर हैं। इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है। हम बड़े दुःखी हो रहे हैं। तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दुःख, दारिद्र्य, पराजय टाल दो। पुत्र! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये॥ ३१॥"},{"id":"6.7.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/32/","page":737,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम्।","यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा॥ ३२"],"iast":["vṛṇīmahe tvopādhyāyaṃ brahmiṣṭhaṃ brāhmaṇaṃ gurum|","yathāñjasā vijeṣyāmaḥ sapatnāṃstava tejasā|| 32"],"meaning":"तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अतः जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे॥ ३२॥"},{"id":"6.7.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/33/","page":737,"speaker":"देवा ऊचुः","sanskrit":["न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्र्यभिवादनम्।","छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन् वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम्॥ ३३"],"iast":["na garhayanti hyartheṣu yaviṣṭhāṅghryabhivādanam|","chandobhyo'nyatra na brahman vayo jyaiṣṭhyasya kāraṇam|| 33"],"meaning":"पुत्र! आवश्यकता पड़नेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है। वेदज्ञानको छोड़कर केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है॥ ३३॥"},{"id":"6.7.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/34/","page":737,"speaker":"ऋषिरुवाच","sanskrit":["अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः।","स विश्‍वरूपस्तानाह प्रसन्‍नः श्लक्ष्णया गिरा॥ ३४"],"iast":["abhyarthitaḥ suragaṇaiḥ paurohitye mahātapāḥ|","sa viśvarūpastānāha prasannaḥ ślakṣṇayā girā|| 34"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने इस प्रकार विश्‍वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्‍वरूपने प्रसन्‍न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा॥ ३४॥"},{"id":"6.7.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/35/","page":737,"speaker":"विश्‍वरूप उवाच","sanskrit":["विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्च उपव्ययम्।","कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम्।","प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते॥ ३५"],"iast":["vigarhitaṃ dharmaśīlairbrahmavarca upavyayam|","kathaṃ nu madvidho nāthā lokeśairabhiyācitam|","pratyākhyāsyati tacchiṣyaḥ sa eva svārtha ucyate|| 35"],"meaning":"विश्‍वरूपने कहा—पुरोहितीका काम ब्रह्मतेजको क्षीण करनेवाला है। इसलिये धर्मशील महात्माओंने उसकी निन्दा की है। किन्तु आप मेरे स्वामी हैं और लोकेश्‍वर होकर भी मुझसे उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे-जैसा व्यक्ति भला, आपलोगोंको कोरा जवाब कैसे दे सकता है? मैं तो आपलोगोंका सेवक हूँ। आपकी आज्ञाओंका पालन करना ही मेरा स्वार्थ है॥ ३५॥"},{"id":"6.7.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/36/","page":737,"speaker":"विश्‍वरूप उवाच","sanskrit":["अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं","तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः।","कथं विगर्ह्यं नु करोम्यधीश्‍वराः","पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मतिः॥ ३६"],"iast":["akiñcanānāṃ hi dhanaṃ śiloñchanaṃ","teneha nirvartitasādhusatkriyaḥ|","kathaṃ vigarhyaṃ nu karomyadhīśvarāḥ","paurodhasaṃ hṛṣyati yena durmatiḥ|| 36"],"meaning":"देवगण! हम अकिंचन हैं। खेती कट जानेपर अथवा अनाजकी हाट उठ जानेपर उसमेंसे गिरे हुए कुछ दाने चुन लाते हैं और उसीसे अपने देवकार्य तथा पितृकार्य सम्पन्‍न कर लेते हैं। लोकपालो! इस प्रकार जब मेरी जीविका चल ही रही है, तब मैं पुरोहितीकी निन्दनीय वृत्ति क्यों करूँ? उससे तो केवल वे ही लोग प्रसन्‍न होते हैं, जिनकी बुद्धि बिगड़ गयी है॥ ३६॥"},{"id":"6.7.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/37/","page":738,"speaker":"विश्‍वरूप उवाच","sanskrit":["तथापि न प्रतिब्रूयां गुरुभिः प्रार्थितं कियत्।","भवतां प्रार्थितं सर्वं प्राणैरर्थैश्‍च साधये॥ ३७"],"iast":["tathāpi na pratibrūyāṃ gurubhiḥ prārthitaṃ kiyat|","bhavatāṃ prārthitaṃ sarvaṃ prāṇairarthaiśca sādhaye|| 37"],"meaning":"जो काम आपलोग मुझसे कराना चाहते हैं वह निन्दनीय है—फिर भी मैं आपके कामसे मुँह नहीं मोड़ सकता; क्योंकि आपलोगोंकी माँग ही कितनी है। इसलिये आपलोगोंका मनोरथ मैं तन-मन-धनसे पूरा करूँगा॥ ३७॥"},{"id":"6.7.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/38/","page":738,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["तेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्‍वरूपो महातपाः।","पौरोहित्यं वृतश्‍चक्रे परमेण समाधिना॥ ३८"],"iast":["tebhya evaṃ pratiśrutya viśvarūpo mahātapāḥ|","paurohityaṃ vṛtaścakre parameṇa samādhinā|| 38"],"meaning":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्‍वरूप बड़े तपस्वी थे। देवताओंसे ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगनके साथ उनकी पुरोहिती करने लगे॥ ३८॥"},{"id":"6.7.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/39/","page":738,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["सुरद्विषां श्रियं गुप्तामौशनस्यापि विद्यया।","आच्छिद्यादान्महेन्द्राय वैष्णव्या विद्यया विभुः॥ ३९"],"iast":["suradviṣāṃ śriyaṃ guptāmauśanasyāpi vidyayā|","ācchidyādānmahendrāya vaiṣṇavyā vidyayā vibhuḥ|| 39"],"meaning":"यद्यपि शुक्राचार्यने अपने नीतिबलसे असुरोंकी सम्पत्ति सुरक्षित कर दी थी, फिर भी समर्थ विश्‍वरूपने वैष्णवी विद्याके प्रभावसे उनसे वह सम्पत्ति छीनकर देवराज इन्द्रको दिला दी॥ ३९॥"},{"id":"6.7.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/40/","page":738,"speaker":"श्रीशुक उवाच","sanskrit":["यया गुप्तः सहस्राक्षो जिग्येऽसुरचमूर्विभुः।","तां प्राह स महेन्द्राय विश्‍वरूप उदारधीः॥ ४०"],"iast":["yayā guptaḥ sahasrākṣo jigye'suracamūrvibhuḥ|","tāṃ prāha sa mahendrāya viśvarūpa udāradhīḥ|| 40"],"meaning":"राजन्! जिस विद्यासे सुरक्षित होकर इन्द्रने असुरोंकी सेनापर विजय प्राप्त की थी, उसका उदारबुद्धि विश्‍वरूपने ही उन्हें उपदेश किया था॥ ४०॥"}],"text":[{"b":16380,"kind":"adhyaya_heading","page":734,"text":"अथ सप्तमोऽध्यायः"},{"b":16381,"kind":"topic_heading","page":734,"text":"बृहस्पतिजीके द्वारा देवताओंका त्याग और विश्‍वरूपका देवगुरुके रूपमें वरण"},{"b":16382,"kind":"topic_heading","page":734,"text":"राजोवाच"},{"b":16383,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.1"],"text":"कस्य हेतोः परित्यक्ता आचार्येणात्मनः सुराः।"},{"b":16384,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.1"],"text":"एतदाचक्ष्व भगवञ्छिष्याणामक्रमं गुरौ॥ १"},{"b":16385,"kind":"hindi_commentary","page":734,"explains":["6.7.1"],"text":"राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! देवाचार्य बृहस्पतिजीने अपने प्रिय शिष्य देवताओंको किस कारण त्याग दिया था? देवताओंने अपने गुरुदेवका ऐसा कौन-सा अपराध कर दिया था, आप कृपा करके मुझे बतलाइये॥ १॥"},{"b":16386,"kind":"topic_heading","page":734,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":16387,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.2"],"text":"इन्द्रस्त्रिभुवनैश्‍वर्यमदोल्लङ्घितसत्पथः ।"},{"b":16388,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.2"],"text":"मरुद्भिर्वसुभी रुद्रैरादित्यैर्ऋभुभिर्नृप॥ २"},{"b":16389,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.3"],"text":"विश्वेदेवैश्‍च साध्यैश्‍च नासत्याभ्यां परिश्रितः।"},{"b":16390,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.3"],"text":"सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ३"},{"b":16391,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.4"],"text":"विद्याधराप्सरोभिश्‍च किन्‍नरैः पतगोरगैः।"},{"b":16392,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.4"],"text":"निषेव्यमाणो मघवान् स्तूयमानश्‍च भारत॥ ४"},{"b":16393,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.5"],"text":"उपगीयमानो ललितमास्थानाध्यासनाश्रितः।"},{"b":16394,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.5"],"text":"पाण्डुरेणातपत्रेण चन्द्रमण्डलचारुणा॥ ५"},{"b":16395,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.6"],"text":"युक्तश्चान्यैः पारमेष्ठ्यैश्चामरव्यजनादिभिः।"},{"b":16396,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.6"],"text":"विराजमानः पौलोम्या सहार्धासनया भृशम्॥ ६"},{"b":16397,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.7"],"text":"स यदा परमाचार्यं देवानामात्मनश्‍च ह।"},{"b":16398,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.7"],"text":"नाभ्यनन्दत संप्राप्तं प्रत्युत्थानासनादिभिः॥ ७"},{"b":16399,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.8"],"text":"वाचस्पतिं मुनिवरं सुरासुरनमस्कृतम्।"},{"b":16400,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.8"],"text":"नोच्चचालासनादिन्द्रः पश्यन्‍नपि सभागतम्॥ ८"},{"b":16401,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.9"],"text":"ततो निर्गत्य सहसा कविराङ्गिरसः प्रभुः।"},{"b":16402,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.9"],"text":"आययौ स्वगृहं तूष्णीं विद्वान् श्रीमदविक्रियाम्॥ ९"},{"b":16403,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.10"],"text":"तर्ह्येव प्रतिबुद्ध्येन्द्रो गुरुहेलनमात्मनः।"},{"b":16404,"kind":"sanskrit_shloka","page":734,"verses":["6.7.10"],"text":"गर्हयामास सदसि स्वयमात्मानमात्मना॥ १०"},{"b":16405,"kind":"hindi_commentary","page":734,"explains":["6.7.2","6.7.3","6.7.4","6.7.5","6.7.6","6.7.7","6.7.8","6.7.9","6.7.10"],"text":"श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! इन्द्रको त्रिलोकीका ऐश्‍वर्य पाकर घमण्ड हो गया था। इस घमण्डके कारण वे धर्ममर्यादाका, सदाचारका उल्लंघन करने लगे थे। एक दिनकी बात है, वे भरी सभामें अपनी पत्‍नी शचीके साथ ऊँचे सिंहासनपर बैठे हुए थे, उनचास मरुद्गण, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, आदित्य, ऋभुगण, विश्वेदेव, साध्यगण और दोनों अश्विनीकुमार उनकी सेवामें उपस्थित थे। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, ब्रह्मवादी मुनिगण, विद्याधर, अप्सराएँ, किन्‍नर, पक्षी और नाग उनकी सेवा और स्तुति कर रहे थे। सब ओर ललित स्वरसे देवराज इन्द्रकी कीर्तिका गान हो रहा था। ऊपरकी ओर चन्द्रमण्डलके समान सुन्दर श्वेत छत्र शोभायमान था। चँवर, पंखे आदि महाराजोचित सामग्रियाँ यथास्थान सुसज्जित थीं। इस दिव्य समाजमें देवराज बड़े ही सुशोभित हो रहे थे॥ २—६॥ इसी समय देवराज इन्द्र और समस्त देवताओंके परम आचार्य बृहस्पतिजी वहाँ आये। उन्हें सुर-असुर सभी नमस्कार करते हैं। इन्द्रने देख लिया कि वे सभामें आये हैं, परन्तु वे न तो खड़े हुए और न आसन आदि देकर गुरुका सत्कार ही किया। यहाँतक कि वे अपने आसनसे हिले-डुलेतक नहीं॥ ७-८॥ त्रिकालदर्शी समर्थ बृहस्पतिजीने देखा कि यह ऐश्‍वर्यमदका दोष है! बस, वे झटपट वहाँसे निकलकर चुपचाप अपने घर चले आये॥ ९॥ परीक्षित्! उसी समय देवराज इन्द्रको चेत हुआ। वे समझ गये कि मैंने अपने गुरुदेवकी अवहेलना की है। वे भरी सभामें स्वयं ही अपनी निन्दा करने लगे॥ १०॥"},{"b":16406,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.11"],"text":"अहो बत ममासाधु कृतं वै दभ्रबुद्धिना।"},{"b":16407,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.11"],"text":"यन्मयैश्‍वर्यमत्तेन गुरुः सदसि कात्कृतः॥ ११"},{"b":16408,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.12"],"text":"को गृध्येत् पण्डितो लक्ष्मीं त्रिविष्टपपतेरपि।"},{"b":16409,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.12"],"text":"ययाहमासुरं भावं नीतोऽद्य विबुधेश्‍वरः॥ १२"},{"b":16410,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.13"],"text":"ये पारमेष्ठ्यं धिषणमधितिष्ठन् न कञ्चन।"},{"b":16411,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.13"],"text":"प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्मं ते न परं विदुः॥ १३"},{"b":16412,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.14"],"text":"तेषां कुपथदेष्टॄणां पततां तमसि ह्यधः।"},{"b":16413,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.14"],"text":"ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इव॥ १४"},{"b":16414,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.15"],"text":"अथाहममराचार्यमगाधधिषणं द्विजम्।"},{"b":16415,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.15"],"text":"प्रसादयिष्ये निशठः शीर्ष्णा तच्चरणं स्पृशन्॥ १५"},{"b":16416,"kind":"hindi_commentary","page":735,"explains":["6.7.11","6.7.12","6.7.13","6.7.14","6.7.15"],"text":"‘हाय-हाय! बड़े खेदकी बात है कि भरी सभामें मूर्खतावश मैंने ऐश्‍वर्यके नशेमें चूर होकर अपने गुरुदेवका तिरस्कार कर दिया। सचमुच मेरा यह कर्म अत्यन्त निन्दनीय है॥ ११॥ भला, कौन विवेकी पुरुष इस स्वर्गकी राजलक्ष्मीको पानेकी इच्छा करेगा? देखो तो सही, आज इसीने मुझ देवराजको भी असुरोंके-से रजोगुणी भावसे भर दिया॥ १२॥ जो लोग यह कहते हैं कि सार्वभौम राजसिंहासनपर बैठा हुआ सम्राट् किसीके आनेपर राजसिंहासनसे न उठे, वे धर्मका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते॥ १३॥ ऐसा उपदेश करनेवाले कुमार्गकी ओर ले जानेवाले हैं। वे स्वयं घोर नरकमें गिरते हैं। उनकी बातपर जो लोग विश्वास करते हैं, वे पत्थरकी नावकी तरह डूब जाते हैं॥ १४॥ मेरे गुरुदेव बृहस्पतिजी ज्ञानके अथाह समुद्र हैं। मैंने बड़ी शठता की। अब मैं उनके चरणोंमें अपना माथा टेककर उन्हें मनाऊँगा’॥ १५॥"},{"b":16417,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.16"],"text":"एवं चिन्तयतस्तस्य मघोनो भगवान् गृहात्।"},{"b":16418,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.16"],"text":"बृहस्पतिर्गतोऽदृष्टां गतिमध्यात्ममायया॥ १६"},{"b":16419,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.17"],"text":"गुरोर्नाधिगतः संज्ञां परीक्षन् भगवान् स्वराट्।"},{"b":16420,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.17"],"text":"ध्यायन् धिया सुरैर्युक्तः शर्म नालभतात्मनः॥ १७"},{"b":16421,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.18"],"text":"तच्छ्रुत्वैवासुराः सर्व आश्रित्यौशनसं मतम्।"},{"b":16422,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.18"],"text":"देवान् प्रत्युद्यमं चक्रुर्दुर्मदा आततायिनः॥ १८"},{"b":16423,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.19"],"text":"तैर्विसृष्टेषुभिस्तीक्ष्णैर्निर्भिन्‍नाङ्गोरुबाहवः।"},{"b":16424,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.19"],"text":"ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहेन्द्रा नतकन्धराः॥ १९"},{"b":16425,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.20"],"text":"तांस्तथाभ्यर्दितान् वीक्ष्य भगवानात्मभूरजः।"},{"b":16426,"kind":"sanskrit_shloka","page":735,"verses":["6.7.20"],"text":"कृपया परया देव उवाच परिसान्त्वयन्॥ २०"},{"b":16427,"kind":"hindi_commentary","page":735,"explains":["6.7.16","6.7.17","6.7.18","6.7.19","6.7.20"],"text":"परीक्षित्! देवराज इन्द्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् बृहस्पतिजी अपने घरसे निकलकर योगबलसे अन्तर्धान हो गये॥ १६॥ देवराज इन्द्रने अपने गुरुदेवको बहुत ढूँढ़ा-ढुँढ़वाया; परन्तु उनका कहीं पता न चला। तब वे गुरुके बिना अपनेको सुरक्षित न समझकर देवताओंके साथ अपनी बुद्धिके अनुसार स्वर्गकी रक्षाका उपाय सोचने लगे, परन्तु वे कुछ भी सोच न सके! उनका चित्त अशान्त ही बना रहा॥ १७॥ परीक्षित्! दैत्योंको भी देवगुरु बृहस्पति और देवराज इन्द्रकी अनबनका पता लग गया। तब उन मदोन्मत्त और आततायी असुरोंने अपने गुरु शुक्राचार्यके आदेशानुसार देवताओंपर विजय पानेके लिये धावा बोल दिया॥ १८॥ उन्होंने देवताओंपर इतने तीखे-तीखे बाणोंकी वर्षा की कि उनके मस्तक, जंघा, बाहु आदि अंग कट-कटकर गिरने लगे। तब इन्द्रके साथ सभी देवता सिर झुकाकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये॥ १९॥ स्वयम्भू एवं समर्थ ब्रह्माजीने देखा कि देवताओंकी तो सचमुच बड़ी दुर्दशा हो रही है। अतः उनका हृदय अत्यन्त करुणासे भर गया। वे देवताओंको धीरज बँधाते हुए कहने लगे॥ २०॥"},{"b":16428,"kind":"topic_heading","page":736,"text":"ब्रह्मोवाच"},{"b":16429,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.21"],"text":"अहो बत सुरश्रेष्ठ ह्यभद्रं वः कृतं महत्।"},{"b":16430,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.21"],"text":"ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं दान्तमैश्‍वर्यान्‍नाभ्यनन्दत॥ २१"},{"b":16431,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.22"],"text":"तस्यायमनयस्यासीत् परेभ्यो वः पराभवः।"},{"b":16432,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.22"],"text":"प्रक्षीणेभ्यः स्ववैरिभ्यः समृद्धानां च यत् सुराः॥ २२"},{"b":16433,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.23"],"text":"मघवन् द्विषतः पश्य प्रक्षीणान् गुर्वतिक्रमात्।"},{"b":16434,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.23"],"text":"सम्प्रत्युपचितान् भूयः काव्यमाराध्य भक्तितः।"},{"b":16435,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.23"],"text":"आददीरन् निलयनं ममापि भृगुदेवताः॥ २३"},{"b":16436,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.24"],"text":"त्रिविष्टपं किं गणयन्त्यभेद्य-"},{"b":16437,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.24"],"text":"मन्त्रा भृगूणामनुशिक्षितार्थाः।"},{"b":16438,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.24"],"text":"न विप्रगोविन्दगवीश्‍वराणां"},{"b":16439,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.24"],"text":"भवन्त्यभद्राणि नरेश्‍वराणाम्॥ २४"},{"b":16440,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.25"],"text":"तद् विश्‍वरूपं भजताशु विप्रं"},{"b":16441,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.25"],"text":"तपस्विनं त्वाष्ट्रमथात्मवन्तम्।"},{"b":16442,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.25"],"text":"सभाजितोऽर्थान् स विधास्यते वो"},{"b":16443,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.25"],"text":"यदि क्षमिष्यध्वमुतास्य कर्म॥ २५"},{"b":16444,"kind":"hindi_commentary","page":736,"explains":["6.7.21","6.7.22","6.7.23","6.7.24","6.7.25"],"text":"ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! यह बड़े खेदकी बात है। सचमुच तुमलोगोंने बहुत बुरा काम किया। हरे, हरे! तुमलोगोंने ऐश्‍वर्यके मदसे अंधे होकर ब्रह्मज्ञानी, वेदज्ञ एवं संयमी ब्राह्मणका सत्कार नहीं किया॥ २१॥ देवताओ! तुम्हारी उसी अनीतिका यह फल है कि आज समृद्धिशाली होनेपर भी तुम्हें अपने निर्बल शत्रुओंके सामने नीचा देखना पड़ा॥ २२॥ देवराज! देखो, तुम्हारे शत्रु भी पहले अपने गुरुदेव शुक्राचार्यका तिरस्कार करनेके कारण अत्यन्त निर्बल हो गये थे, परन्तु अब भक्तिभावसे उनकी आराधना करके वे फिर धन-जनसे सम्पन्‍न हो गये हैं। देवताओ! मुझे तो ऐसा मालूम पड़ रहा है कि शुक्राचार्यको अपना आराध्यदेव माननेवाले ये दैत्यलोग कुछ दिनोंमें मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लेंगे॥ २३॥ भृगुवंशियोंने इन्हें अर्थशास्त्रकी पूरी-पूरी शिक्षा दे रखी है। ये जो कुछ करना चाहते हैं, उसका भेद तुमलोगोंको नहीं मिल पाता। उनकी सलाह बहुत गुप्त होती है। ऐसी स्थितिमें वे स्वर्गको तो समझते ही क्या हैं, वे चाहे जिस लोकको जीत सकते हैं। सच है, जो श्रेष्ठ मनुष्य ब्राह्मण, गोविन्द और गौओंको अपना सर्वस्व मानते हैं और जिनपर उनकी कृपा रहती है, उनका कभी अमंगल नहीं होता॥ २४॥ इसलिये अब तुमलोग शीघ्र ही त्वष्टाके पुत्र विश्‍वरूपके पास जाओ और उन्हींकी सेवा करो। वे सच्चे ब्राह्मण, तपस्वी और संयमी हैं। यदि तुमलोग उनके असुरोंके प्रति प्रेमको क्षमा कर सकोगे और उनका सम्मान करोगे, तो वे तुम्हारा काम बना देंगे॥ २५॥"},{"b":16445,"kind":"topic_heading","page":736,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":16446,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.26"],"text":"त एवमुदिता राजन् ब्रह्मणा विगतज्वराः।"},{"b":16447,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.26"],"text":"ऋषिं त्वाष्ट्रमुपव्रज्य परिष्वज्येदमब्रुवन्॥ २६"},{"b":16448,"kind":"hindi_commentary","page":736,"explains":["6.7.26"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब ब्रह्माजीने देवताओंसे इस प्रकार कहा, तब उनकी चिन्ता दूर हो गयी। वे त्वष्टाके पुत्र विश्‍वरूप ऋषिके पास गये और उन्हें हृदयसे लगाकर यों कहने लगे॥ २६॥"},{"b":16449,"kind":"topic_heading","page":736,"text":"देवा ऊचुः"},{"b":16450,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.27"],"text":"वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते।"},{"b":16451,"kind":"sanskrit_shloka","page":736,"verses":["6.7.27"],"text":"कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः॥ २७"},{"b":16452,"kind":"hindi_commentary","page":736,"explains":["6.7.27"],"text":"देवताओंने कहा—बेटा विश्‍वरूप! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं। हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित्त अभिलाषा पूर्ण करो॥ २७॥"},{"b":16453,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.28"],"text":"पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम्।"},{"b":16454,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.28"],"text":"अपि पुत्रवतां ब्रह्मन् किमुत ब्रह्मचारिणाम्॥ २८"},{"b":16455,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.29"],"text":"आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः।"},{"b":16456,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.29"],"text":"भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनुः॥ २९"},{"b":16457,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.30"],"text":"दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम्।"},{"b":16458,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.30"],"text":"अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः॥ ३०"},{"b":16459,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.31"],"text":"तस्मात् पितॄणामार्तानामार्तिं परपराभवम्।"},{"b":16460,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.31"],"text":"तपसापनयंस्तात सन्देशं कर्तुमर्हसि॥ ३१"},{"b":16461,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.32"],"text":"वृणीमहे त्वोपाध्यायं ब्रह्मिष्ठं ब्राह्मणं गुरुम्।"},{"b":16462,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.32"],"text":"यथाञ्जसा विजेष्यामः सपत्नांस्तव तेजसा॥ ३२"},{"b":16463,"kind":"hindi_commentary","page":737,"explains":["6.7.28","6.7.29","6.7.30","6.7.31","6.7.32"],"text":"जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है॥ २८॥ वत्स! आचार्य वेदकी, पिता ब्रह्माजीकी, भाई इन्द्रकी और माता साक्षात् पृथ्वीकी मूर्ति होती है॥ २९॥ (इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्‍निकी और जगत‍्के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं॥ ३०॥ पुत्र! हम तुम्हारे पितर हैं। इस समय शत्रुओंने हमें जीत लिया है। हम बड़े दुःखी हो रहे हैं। तुम अपने तपोबलसे हमारा यह दुःख, दारिद्र्य, पराजय टाल दो। पुत्र! तुम्हें हमलोगोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये॥ ३१॥ तुम ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण हो, अतः जन्मसे ही हमारे गुरु हो। हम तुम्हें आचार्यके रूपमें वरण करके तुम्हारी शक्तिसे अनायास ही शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर लेंगे॥ ३२॥"},{"b":16464,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.33"],"text":"न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्घ्र्यभिवादनम्।"},{"b":16465,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.33"],"text":"छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन् वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम्॥ ३३"},{"b":16466,"kind":"hindi_commentary","page":737,"explains":["6.7.33"],"text":"पुत्र! आवश्यकता पड़नेपर अपनेसे छोटोंका पैर छूना भी निन्दनीय नहीं है। वेदज्ञानको छोड़कर केवल अवस्था बड़प्पनका कारण भी नहीं है॥ ३३॥"},{"b":16467,"kind":"topic_heading","page":737,"text":"ऋषिरुवाच"},{"b":16468,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.34"],"text":"अभ्यर्थितः सुरगणैः पौरोहित्ये महातपाः।"},{"b":16469,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.34"],"text":"स विश्‍वरूपस्तानाह प्रसन्‍नः श्लक्ष्णया गिरा॥ ३४"},{"b":16470,"kind":"hindi_commentary","page":737,"explains":["6.7.34"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने इस प्रकार विश्‍वरूपसे पुरोहिती करनेकी प्रार्थना की, तब परम तपस्वी विश्‍वरूपने प्रसन्‍न होकर उनसे अत्यन्त प्रिय और मधुर शब्दोंमें कहा॥ ३४॥"},{"b":16471,"kind":"topic_heading","page":737,"text":"विश्‍वरूप उवाच"},{"b":16472,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.35"],"text":"विगर्हितं धर्मशीलैर्ब्रह्मवर्च उपव्ययम्।"},{"b":16473,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.35"],"text":"कथं नु मद्विधो नाथा लोकेशैरभियाचितम्।"},{"b":16474,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.35"],"text":"प्रत्याख्यास्यति तच्छिष्यः स एव स्वार्थ उच्यते॥ ३५"},{"b":16475,"kind":"hindi_commentary","page":737,"explains":["6.7.35"],"text":"विश्‍वरूपने कहा—पुरोहितीका काम ब्रह्मतेजको क्षीण करनेवाला है। इसलिये धर्मशील महात्माओंने उसकी निन्दा की है। किन्तु आप मेरे स्वामी हैं और लोकेश्‍वर होकर भी मुझसे उसके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे-जैसा व्यक्ति भला, आपलोगोंको कोरा जवाब कैसे दे सकता है? मैं तो आपलोगोंका सेवक हूँ। आपकी आज्ञाओंका पालन करना ही मेरा स्वार्थ है॥ ३५॥"},{"b":16476,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.36"],"text":"अकिञ्चनानां हि धनं शिलोञ्छनं"},{"b":16477,"kind":"sanskrit_shloka","page":737,"verses":["6.7.36"],"text":"तेनेह निर्वर्तितसाधुसत्क्रियः।"},{"b":16478,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.36"],"text":"कथं विगर्ह्यं नु करोम्यधीश्‍वराः"},{"b":16479,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.36"],"text":"पौरोधसं हृष्यति येन दुर्मतिः॥ ३६"},{"b":16480,"kind":"hindi_commentary","page":737,"explains":["6.7.36","6.7.37"],"text":"देवगण! हम अकिंचन हैं। खेती कट जानेपर अथवा अनाजकी हाट उठ जानेपर उसमेंसे गिरे हुए कुछ दाने चुन लाते हैं और उसीसे अपने देवकार्य तथा पितृकार्य सम्पन्‍न कर लेते हैं। लोकपालो! इस प्रकार जब मेरी जीविका चल ही रही है, तब मैं पुरोहितीकी निन्दनीय वृत्ति क्यों करूँ? उससे तो केवल वे ही लोग प्रसन्‍न होते हैं, जिनकी बुद्धि बिगड़ गयी है॥ ३६॥ जो काम आपलोग मुझसे कराना चाहते हैं वह निन्दनीय है—फिर भी मैं आपके कामसे मुँह नहीं मोड़ सकता; क्योंकि आपलोगोंकी माँग ही कितनी है। इसलिये आपलोगोंका मनोरथ मैं तन-मन-धनसे पूरा करूँगा॥ ३७॥"},{"b":16481,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.37"],"text":"तथापि न प्रतिब्रूयां गुरुभिः प्रार्थितं कियत्।"},{"b":16482,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.37"],"text":"भवतां प्रार्थितं सर्वं प्राणैरर्थैश्‍च साधये॥ ३७"},{"b":16483,"kind":"topic_heading","page":736,"text":"श्रीशुक उवाच"},{"b":16484,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.38"],"text":"तेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्‍वरूपो महातपाः।"},{"b":16485,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.38"],"text":"पौरोहित्यं वृतश्‍चक्रे परमेण समाधिना॥ ३८"},{"b":16486,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.39"],"text":"सुरद्विषां श्रियं गुप्तामौशनस्यापि विद्यया।"},{"b":16487,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.39"],"text":"आच्छिद्यादान्महेन्द्राय वैष्णव्या विद्यया विभुः॥ ३९"},{"b":16488,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.40"],"text":"यया गुप्तः सहस्राक्षो जिग्येऽसुरचमूर्विभुः।"},{"b":16489,"kind":"sanskrit_shloka","page":738,"verses":["6.7.40"],"text":"तां प्राह स महेन्द्राय विश्‍वरूप उदारधीः॥ ४०"},{"b":16490,"kind":"hindi_commentary","page":738,"explains":["6.7.38","6.7.39","6.7.40"],"text":"श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्‍वरूप बड़े तपस्वी थे। देवताओंसे ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगनके साथ उनकी पुरोहिती करने लगे॥ ३८॥ यद्यपि शुक्राचार्यने अपने नीतिबलसे असुरोंकी सम्पत्ति सुरक्षित कर दी थी, फिर भी समर्थ विश्‍वरूपने वैष्णवी विद्याके प्रभावसे उनसे वह सम्पत्ति छीनकर देवराज इन्द्रको दिला दी॥ ३९॥ राजन्! जिस विद्यासे सुरक्षित होकर इन्द्रने असुरोंकी सेनापर विजय प्राप्त की थी, उसका उदारबुद्धि विश्‍वरूपने ही उन्हें उपदेश किया था॥ ४०॥"},{"b":16491,"kind":"hindi_translation","page":738,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":4,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}