{"id":"4.15","title":"चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15","part":"चतुर्थ स्कन्ध","heading":"अथ पञ्चदशोऽध्यायः","topics":["महाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 4.15.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[482,485]},"verses":[{"id":"4.15.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/1/","page":482,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अथ तस्य पुनर्विप्रैरपुत्रस्य महीपतेः।","बाहुभ्यां मथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत॥ १"],"iast":["atha tasya punarviprairaputrasya mahīpateḥ|","bāhubhyāṃ mathyamānābhyāṃ mithunaṃ samapadyata|| 1"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इसके बाद ब्राह्मणोंने पुत्रहीन राजा वेनकी भुजाओंका मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री-पुरुषका जोड़ा प्रकट हुआ॥ १॥"},{"id":"4.15.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/2/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिनः।","ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम्॥ २"],"iast":["tad dṛṣṭvā mithunaṃ jātamṛṣayo brahmavādinaḥ|","ūcuḥ paramasantuṣṭā viditvā bhagavatkalām|| 2"],"meaning":"ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़ेको उत्पन्‍न हुआ देख और उसे भगवान्‌का अंश जान बहुत प्रसन्‍न हुए और बोले॥ २॥"},{"id":"4.15.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/3/","page":483,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी।","इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी॥ ३"],"iast":["eṣa viṣṇorbhagavataḥ kalā bhuvanapālinī|","iyaṃ ca lakṣmyāḥ sambhūtiḥ puruṣasyānapāyinī|| 3"],"meaning":"ऋषियोंने कहा—यह पुरुष भगवान् विष्णुकी विश्‍वपालिनी कलासे प्रकट हुआ है और यह स्त्री उन परम पुरुषकी अनपायिनी (कभी अलग न होनेवाली) शक्ति लक्ष्मीजीका अवतार है॥ ३॥"},{"id":"4.15.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/4/","page":483,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["अयं तु प्रथमो राज्ञां पुमान् प्रथयिता यशः।","पृथुर्नाम महाराजो भविष्यति पृथुश्रवाः॥ ४"],"iast":["ayaṃ tu prathamo rājñāṃ pumān prathayitā yaśaḥ|","pṛthurnāma mahārājo bhaviṣyati pṛthuśravāḥ|| 4"],"meaning":"इनमेंसे जो पुरुष है वह अपने सुयशका प्रथन—विस्तार करनेके कारण परम यशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट् होगा। राजाओंमें यही सबसे पहला होगा॥ ४॥"},{"id":"4.15.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/5/","page":483,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["इयं च सुदती देवी गुणभूषणभूषणा।","अर्चिर्नाम वरारोहा पृथुमेवावरुन्धती॥ ५"],"iast":["iyaṃ ca sudatī devī guṇabhūṣaṇabhūṣaṇā|","arcirnāma varārohā pṛthumevāvarundhatī|| 5"],"meaning":"यह सुन्दर दाँतोंवाली एवं गुण और आभूषणोंको भी विभूषित करनेवाली सुन्दरी इन पृथुको ही अपना पति बनायेगी। इसका नाम अर्चि होगा॥ ५॥"},{"id":"4.15.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/6/","page":483,"speaker":"ऋषय ऊचुः","sanskrit":["एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया।","इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी॥ ६"],"iast":["eṣa sākṣāddhareraṃśo jāto lokarirakṣayā|","iyaṃ ca tatparā hi śrīranujajñe'napāyinī|| 6"],"meaning":"पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें, निरन्तर भगवान्‌की सेवामें रहनेवाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं॥ ६॥"},{"id":"4.15.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/7/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रशंसन्ति स्म तं विप्रा गन्धर्वप्रवरा जगुः।","मुमुचुः सुमनोधाराः सिद्धा नृत्यन्ति स्वः स्त्रियः॥ ७"],"iast":["praśaṃsanti sma taṃ viprā gandharvapravarā jaguḥ|","mumucuḥ sumanodhārāḥ siddhā nṛtyanti svaḥ striyaḥ|| 7"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! उस समय ब्राह्मणलोग पृथुकी स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वोंने गुणगान किया, सिद्धोंने पुष्पोंकी वर्षा की, अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ७॥"},{"id":"4.15.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/8/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शङ्खतूर्यमृदंगाद्या नेदुर्दुन्दुभयो दिवि।","तत्र सर्व उपाजग्मुर्देवर्षिपितृणां गणाः॥ ८"],"iast":["śaṅkhatūryamṛdaṃgādyā nedurdundubhayo divi|","tatra sarva upājagmurdevarṣipitṛṇāṃ gaṇāḥ|| 8"],"meaning":"आकाशमें शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने-अपने लोकोंसे वहाँ आये॥ ८॥"},{"id":"4.15.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/9/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ब्रह्मा जगद‍्गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्‍वरैः।","वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः॥ ९"],"iast":["brahmā jagadgururdevaiḥ sahāsṛtya sureśvaraiḥ|","vainyasya dakṣiṇe haste dṛṣṭvā cihnaṃ gadābhṛtaḥ|| 9"],"meaning":"जगद‍्गुरु ब्रह्माजी देवता और देवेश्‍वरोंके साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथुके दाहिने हाथमें भगवान् विष्णुकी हस्तरेखाएँ और चरणोंमें कमलका चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरिका ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथमें दूसरी रेखाओंसे बिना कटा हुआ चक्रका चिह्न होता है, वह भगवान्‌का ही अंश होता है॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"4.15.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/10/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["पादयोररविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम्।","यस्याप्रतिहतं चक्रमंशः स परमेष्ठिनः॥ १०"],"iast":["pādayoraravindaṃ ca taṃ vai mene hareḥ kalām|","yasyāpratihataṃ cakramaṃśaḥ sa parameṣṭhinaḥ|| 10"],"meaning":"जगद‍्गुरु ब्रह्माजी देवता और देवेश्‍वरोंके साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथुके दाहिने हाथमें भगवान् विष्णुकी हस्तरेखाएँ और चरणोंमें कमलका चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरिका ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथमें दूसरी रेखाओंसे बिना कटा हुआ चक्रका चिह्न होता है, वह भगवान्‌का ही अंश होता है॥ ९-१०॥","meaning_covers":[9,10]},{"id":"4.15.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/11/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्याभिषेक आरब्धो ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः।","आभिषेचनिकान्यस्मै आजह्रुः सर्वतो जनाः॥ ११"],"iast":["tasyābhiṣeka ārabdho brāhmaṇairbrahmavādibhiḥ|","ābhiṣecanikānyasmai ājahruḥ sarvato janāḥ|| 11"],"meaning":"वेदवादी ब्राह्मणोंने महाराज पृथुके अभिषेकका आयोजन किया। सब लोग उसकी सामग्री जुटानेमें लग गये॥ ११॥"},{"id":"4.15.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/12/","page":483,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः।","द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजह्रुरुपायनम्॥ १२"],"iast":["saritsamudrā girayo nāgā gāvaḥ khagā mṛgāḥ|","dyauḥ kṣitiḥ sarvabhūtāni samājahrurupāyanam|| 12"],"meaning":"उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग, पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियोंने भी उन्हें तरह-तरहके उपहार भेंट किये॥ १२॥"},{"id":"4.15.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/13/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सोऽभिषिक्तो महाराजः सुवासाः साध्वलङ्कृतः।","पत्न्यार्चिषालङ्कृतया विरेजेऽग्‍निरिवापरः॥ १३"],"iast":["so'bhiṣikto mahārājaḥ suvāsāḥ sādhvalaṅkṛtaḥ|","patnyārciṣālaṅkṛtayā vireje'gnirivāparaḥ|| 13"],"meaning":"सुन्दर वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत महाराज पृथुका विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेकों अलंकारोंसे सजी हुई महारानी अर्चिके साथ वे दूसरे अग्‍निदेवके सदृश जान पड़ते थे॥ १३॥"},{"id":"4.15.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/14/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्मै जहार धनदो हैमं वीर वरासनम्।","वरुणः सलिलस्रावमातपत्रं शशिप्रभम्॥ १४"],"iast":["tasmai jahāra dhanado haimaṃ vīra varāsanam|","varuṇaḥ salilasrāvamātapatraṃ śaśiprabham|| 14"],"meaning":"वीर विदुरजी! उन्हें कुबेरने बड़ा ही सुन्दर सोनेका सिंहासन दिया तथा वरुणने चन्द्रमाके समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, जिससे निरन्तर जलकी फुहियाँ झरती रहती थीं॥ १४॥"},{"id":"4.15.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/15/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["वायुश्‍च वालव्यजने धर्मः कीर्तिमयीं स्रजम्।","इन्द्रः किरीटमुत्कृष्टं दण्डं संयमनं यमः॥ १५"],"iast":["vāyuśca vālavyajane dharmaḥ kīrtimayīṃ srajam|","indraḥ kirīṭamutkṛṣṭaṃ daṇḍaṃ saṃyamanaṃ yamaḥ|| 15"],"meaning":"वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥","meaning_covers":[15,20]},{"id":"4.15.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/16/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म भारती हारमुत्तमम्।","हरिः सुदर्शनं चक्रं तत्पत्न्यव्याहतां श्रियम्॥ १६"],"iast":["brahmā brahmamayaṃ varma bhāratī hāramuttamam|","hariḥ sudarśanaṃ cakraṃ tatpatnyavyāhatāṃ śriyam|| 16"],"meaning":"वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥","meaning_covers":[15,20]},{"id":"4.15.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/17/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रं तथाम्बिका।","सोमोऽमृतमयानश्वांस्त्वष्टा रूपाश्रयं रथम्॥ १७"],"iast":["daśacandramasiṃ rudraḥ śatacandraṃ tathāmbikā|","somo'mṛtamayānaśvāṃstvaṣṭā rūpāśrayaṃ ratham|| 17"],"meaning":"वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥","meaning_covers":[15,20]},{"id":"4.15.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/18/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अग्‍निराजगवं चापं सूर्यो रश्मिमयानिषून्।","भूः पादुके योगमय्यौ द्यौः पुष्पावलिमन्वहम्॥ १८"],"iast":["agnirājagavaṃ cāpaṃ sūryo raśmimayāniṣūn|","bhūḥ pāduke yogamayyau dyauḥ puṣpāvalimanvaham|| 18"],"meaning":"वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥","meaning_covers":[15,20]},{"id":"4.15.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/19/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["नाट्यं सुगीतं वादित्रमन्तर्धानं च खेचराः।","ऋषयश्चाशिषः सत्याः समुद्रः शङ्खमात्मजम्॥ १९"],"iast":["nāṭyaṃ sugītaṃ vāditramantardhānaṃ ca khecarāḥ|","ṛṣayaścāśiṣaḥ satyāḥ samudraḥ śaṅkhamātmajam|| 19"],"meaning":"वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥","meaning_covers":[15,20]},{"id":"4.15.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/20/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सिन्धवः पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मनः।","सूतोऽथ मागधो वन्दी तं स्तोतुमुपतस्थिरे॥ २०"],"iast":["sindhavaḥ parvatā nadyo rathavīthīrmahātmanaḥ|","sūto'tha māgadho vandī taṃ stotumupatasthire|| 20"],"meaning":"वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥","meaning_covers":[15,20]},{"id":"4.15.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/21/","page":484,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स्तावकांस्तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।","मेघनिर्ह्रादया वाचा प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ २१"],"iast":["stāvakāṃstānabhipretya pṛthurvainyaḥ pratāpavān|","meghanirhrādayā vācā prahasannidamabravīt|| 21"],"meaning":"तब उन स्तुति करनेवालोंका अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परम प्रतापी महाराज पृथुने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ २१॥"},{"id":"4.15.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/22/","page":484,"speaker":"पृथुरुवाच","sanskrit":["भोः सूत हे मागध सौम्य वन्दिँ-","ल्लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात्।","किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां","मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः॥ २२"],"iast":["bhoḥ sūta he māgadha saumya vandim̐-","lloke'dhunāspaṣṭaguṇasya me syāt|","kimāśrayo me stava eṣa yojyatāṃ","mā mayyabhūvan vitathā giro vaḥ|| 22"],"meaning":"पृथुने कहा—सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोकमें मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणोंको लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषयमें तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्‍न किसी औरकी स्तुति करो॥ २२॥"},{"id":"4.15.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/23/","page":485,"speaker":"पृथुरुवाच","sanskrit":["तस्मात्परोक्षेऽस्मदुपश्रुतान्यलं","करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाचः।","सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादे","जुगुप्सितं न स्तवयन्ति सभ्याः॥ २३"],"iast":["tasmātparokṣe'smadupaśrutānyalaṃ","kariṣyatha stotramapīcyavācaḥ|","satyuttamaślokaguṇānuvāde","jugupsitaṃ na stavayanti sabhyāḥ|| 23"],"meaning":"मृदुभाषियो! कालान्तरमें जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायँ, तब भरपेट अपनी मधुर वाणीसे मेरी स्तुति कर लेना। देखो, शिष्ट पुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरिके गुणानुवादके रहते हुए तुच्छ मनुष्योंकी स्तुति नहीं किया करते॥ २३॥"},{"id":"4.15.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/24/","page":485,"speaker":"पृथुरुवाच","sanskrit":["महद‍्गुणानात्मनि कर्तुमीशः","कः स्तावकैः स्तावयतेऽसतोऽपि।","तेऽस्याभविष्यन्‍निति विप्रलब्धो","जनावहासं कुमतिर्न वेद॥ २४"],"iast":["mahadguṇānātmani kartumīśaḥ","kaḥ stāvakaiḥ stāvayate'sato'pi|","te'syābhaviṣyanniti vipralabdho","janāvahāsaṃ kumatirna veda|| 24"],"meaning":"महान् गुणोंको धारण करनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उनके न रहनेपर भी केवल सम्भावनामात्रसे स्तुति करनेवालोंद्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक-अमुक गुण हो जाते—इस प्रकारकी स्तुतिसे तो मनुष्यकी वंचना की जाती है। वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं॥ २४॥"},{"id":"4.15.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/25/","page":485,"speaker":"पृथुरुवाच","sanskrit":["प्रभवो ह्यात्मनः स्तोत्रं जुगुप्सन्त्यपि विश्रुताः।","ह्रीमन्तः परमोदाराः पौरुषं वा विगर्हितम्॥ २५"],"iast":["prabhavo hyātmanaḥ stotraṃ jugupsantyapi viśrutāḥ|","hrīmantaḥ paramodārāḥ pauruṣaṃ vā vigarhitam|| 25"],"meaning":"जिस प्रकार लज्जाशील उदार पुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रमकी चर्चा होनी बुरी समझते हैं, उसी प्रकार लोकविख्यात समर्थ पुरुष अपनी स्तुतिको भी निन्दित मानते हैं॥ २५॥"},{"id":"4.15.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/26/","page":485,"speaker":"पृथुरुवाच","sanskrit":["वयं त्वविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभिः।","कर्मभिः कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत्॥ २६"],"iast":["vayaṃ tvaviditā loke sūtādyāpi varīmabhiḥ|","karmabhiḥ kathamātmānaṃ gāpayiṣyāma bālavat|| 26"],"meaning":"सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मोंके द्वारा लोकमें अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अबतक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुमलोगोंसे बच्चोंके समान अपनी कीर्तिका किस प्रकार गान करावें?॥ २६॥"}],"text":[{"b":11750,"kind":"adhyaya_heading","page":482,"text":"अथ पञ्चदशोऽध्यायः"},{"b":11751,"kind":"topic_heading","page":482,"text":"महाराज पृथुका आविर्भाव और राज्याभिषेक"},{"b":11752,"kind":"topic_heading","page":482,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11753,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.15.1"],"text":"अथ तस्य पुनर्विप्रैरपुत्रस्य महीपतेः।"},{"b":11754,"kind":"sanskrit_shloka","page":482,"verses":["4.15.1"],"text":"बाहुभ्यां मथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत॥ १"},{"b":11755,"kind":"hindi_commentary","page":482,"explains":["4.15.1"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इसके बाद ब्राह्मणोंने पुत्रहीन राजा वेनकी भुजाओंका मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री-पुरुषका जोड़ा प्रकट हुआ॥ १॥"},{"b":11756,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.2"],"text":"तद् दृष्ट्वा मिथुनं जातमृषयो ब्रह्मवादिनः।"},{"b":11757,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.2"],"text":"ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम्॥ २"},{"b":11758,"kind":"hindi_translation","page":483,"explains":["4.15.2"],"text":"ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़ेको उत्पन्‍न हुआ देख और उसे भगवान्‌का अंश जान बहुत प्रसन्‍न हुए और बोले॥ २॥"},{"b":11759,"kind":"topic_heading","page":483,"text":"ऋषय ऊचुः"},{"b":11760,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.3"],"text":"एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी।"},{"b":11761,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.3"],"text":"इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी॥ ३"},{"b":11762,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.4"],"text":"अयं तु प्रथमो राज्ञां पुमान् प्रथयिता यशः।"},{"b":11763,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.4"],"text":"पृथुर्नाम महाराजो भविष्यति पृथुश्रवाः॥ ४"},{"b":11764,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.5"],"text":"इयं च सुदती देवी गुणभूषणभूषणा।"},{"b":11765,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.5"],"text":"अर्चिर्नाम वरारोहा पृथुमेवावरुन्धती॥ ५"},{"b":11766,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.6"],"text":"एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया।"},{"b":11767,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.6"],"text":"इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी॥ ६"},{"b":11768,"kind":"hindi_commentary","page":483,"explains":["4.15.3","4.15.4","4.15.5","4.15.6"],"text":"ऋषियोंने कहा—यह पुरुष भगवान् विष्णुकी विश्‍वपालिनी कलासे प्रकट हुआ है और यह स्त्री उन परम पुरुषकी अनपायिनी (कभी अलग न होनेवाली) शक्ति लक्ष्मीजीका अवतार है॥ ३॥ इनमेंसे जो पुरुष है वह अपने सुयशका प्रथन—विस्तार करनेके कारण परम यशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट् होगा। राजाओंमें यही सबसे पहला होगा॥ ४॥ यह सुन्दर दाँतोंवाली एवं गुण और आभूषणोंको भी विभूषित करनेवाली सुन्दरी इन पृथुको ही अपना पति बनायेगी। इसका नाम अर्चि होगा॥ ५॥ पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें, निरन्तर भगवान्‌की सेवामें रहनेवाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं॥ ६॥"},{"b":11769,"kind":"topic_heading","page":482,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11770,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.7"],"text":"प्रशंसन्ति स्म तं विप्रा गन्धर्वप्रवरा जगुः।"},{"b":11771,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.7"],"text":"मुमुचुः सुमनोधाराः सिद्धा नृत्यन्ति स्वः स्त्रियः॥ ७"},{"b":11772,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.8"],"text":"शङ्खतूर्यमृदंगाद्या नेदुर्दुन्दुभयो दिवि।"},{"b":11773,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.8"],"text":"तत्र सर्व उपाजग्मुर्देवर्षिपितृणां गणाः॥ ८"},{"b":11774,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.9"],"text":"ब्रह्मा जगद‍्गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्‍वरैः।"},{"b":11775,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.9"],"text":"वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः॥ ९"},{"b":11776,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.10"],"text":"पादयोररविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम्।"},{"b":11777,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.10"],"text":"यस्याप्रतिहतं चक्रमंशः स परमेष्ठिनः॥ १०"},{"b":11778,"kind":"hindi_commentary","page":483,"explains":["4.15.7","4.15.8","4.15.9","4.15.10"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! उस समय ब्राह्मणलोग पृथुकी स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वोंने गुणगान किया, सिद्धोंने पुष्पोंकी वर्षा की, अप्सराएँ नाचने लगीं॥ ७॥ आकाशमें शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने-अपने लोकोंसे वहाँ आये॥ ८॥ जगद‍्गुरु ब्रह्माजी देवता और देवेश्‍वरोंके साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथुके दाहिने हाथमें भगवान् विष्णुकी हस्तरेखाएँ और चरणोंमें कमलका चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरिका ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथमें दूसरी रेखाओंसे बिना कटा हुआ चक्रका चिह्न होता है, वह भगवान्‌का ही अंश होता है॥ ९-१०॥"},{"b":11779,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.11"],"text":"तस्याभिषेक आरब्धो ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः।"},{"b":11780,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.11"],"text":"आभिषेचनिकान्यस्मै आजह्रुः सर्वतो जनाः॥ ११"},{"b":11781,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.12"],"text":"सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः।"},{"b":11782,"kind":"sanskrit_shloka","page":483,"verses":["4.15.12"],"text":"द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजह्रुरुपायनम्॥ १२"},{"b":11783,"kind":"hindi_translation","page":483,"explains":["4.15.11","4.15.12"],"text":"वेदवादी ब्राह्मणोंने महाराज पृथुके अभिषेकका आयोजन किया। सब लोग उसकी सामग्री जुटानेमें लग गये॥ ११॥ उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग, पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियोंने भी उन्हें तरह-तरहके उपहार भेंट किये॥ १२॥"},{"b":11784,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.13"],"text":"सोऽभिषिक्तो महाराजः सुवासाः साध्वलङ्कृतः।"},{"b":11785,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.13"],"text":"पत्न्यार्चिषालङ्कृतया विरेजेऽग्‍निरिवापरः॥ १३"},{"b":11786,"kind":"hindi_translation","page":484,"explains":["4.15.13"],"text":"सुन्दर वस्त्र और आभूषणोंसे अलंकृत महाराज पृथुका विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेकों अलंकारोंसे सजी हुई महारानी अर्चिके साथ वे दूसरे अग्‍निदेवके सदृश जान पड़ते थे॥ १३॥"},{"b":11787,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.14"],"text":"तस्मै जहार धनदो हैमं वीर वरासनम्।"},{"b":11788,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.14"],"text":"वरुणः सलिलस्रावमातपत्रं शशिप्रभम्॥ १४"},{"b":11789,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.15"],"text":"वायुश्‍च वालव्यजने धर्मः कीर्तिमयीं स्रजम्।"},{"b":11790,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.15"],"text":"इन्द्रः किरीटमुत्कृष्टं दण्डं संयमनं यमः॥ १५"},{"b":11791,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.16"],"text":"ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म भारती हारमुत्तमम्।"},{"b":11792,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.16"],"text":"हरिः सुदर्शनं चक्रं तत्पत्न्यव्याहतां श्रियम्॥ १६"},{"b":11793,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.17"],"text":"दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रं तथाम्बिका।"},{"b":11794,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.17"],"text":"सोमोऽमृतमयानश्वांस्त्वष्टा रूपाश्रयं रथम्॥ १७"},{"b":11795,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.18"],"text":"अग्‍निराजगवं चापं सूर्यो रश्मिमयानिषून्।"},{"b":11796,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.18"],"text":"भूः पादुके योगमय्यौ द्यौः पुष्पावलिमन्वहम्॥ १८"},{"b":11797,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.19"],"text":"नाट्यं सुगीतं वादित्रमन्तर्धानं च खेचराः।"},{"b":11798,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.19"],"text":"ऋषयश्चाशिषः सत्याः समुद्रः शङ्खमात्मजम्॥ १९"},{"b":11799,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.20"],"text":"सिन्धवः पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मनः।"},{"b":11800,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.20"],"text":"सूतोऽथ मागधो वन्दी तं स्तोतुमुपतस्थिरे॥ २०"},{"b":11801,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.21"],"text":"स्तावकांस्तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्यः प्रतापवान्।"},{"b":11802,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.21"],"text":"मेघनिर्ह्रादया वाचा प्रहसन्‍निदमब्रवीत्॥ २१"},{"b":11803,"kind":"hindi_translation","page":484,"explains":["4.15.14","4.15.15","4.15.16","4.15.17","4.15.18","4.15.19","4.15.20","4.15.21"],"text":"वीर विदुरजी! उन्हें कुबेरने बड़ा ही सुन्दर सोनेका सिंहासन दिया तथा वरुणने चन्द्रमाके समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, जिससे निरन्तर जलकी फुहियाँ झरती रहती थीं॥ १४॥ वायुने दो चँवर, धर्मने कीर्तिमयी माला, इन्द्रने मनोहर मुकुट, यमने दमन करनेवाला दण्ड, ब्रह्माने वेदमय कवच, सरस्वतीने सुन्दर हार, विष्णुभगवान्‌ने सुदर्शनचक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मीजीने अविचल सम्पत्ति, रुद्रने दस चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिकाजीने सौ चन्द्राकार चिह्नोंवाली ढाल, चन्द्रमाने अमृतमय अश्‍व, त्वष्टा (विश्‍वकर्मा)-ने सुन्दर रथ, अग्‍निने बकरे और गौके सींगोंका बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्यने तेजोमय बाण, पृथ्वीने चरणस्पर्श-मात्रसे अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देनेवाली योगमयी पादुकाएँ, आकाशके अभिमानी द्यौ देवताने नित्य नूतन पुष्पोंकी माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादिने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जानेकी शक्तियाँ, ऋषियोंने अमोघ आशीर्वाद, समुद्रने अपनेसे उत्पन्‍न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियोंने उनके रथके लिये बेरोक-टोक मार्ग उपहारमें दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करनेके लिये उपस्थित हुए॥ १५—२०॥ तब उन स्तुति करनेवालोंका अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परम प्रतापी महाराज पृथुने हँसते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ २१॥"},{"b":11804,"kind":"topic_heading","page":484,"text":"पृथुरुवाच"},{"b":11805,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.22"],"text":"भोः सूत हे मागध सौम्य वन्दिँ- ल्लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात्।"},{"b":11806,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.22"],"text":"किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां"},{"b":11807,"kind":"sanskrit_shloka","page":484,"verses":["4.15.22"],"text":"मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः॥ २२"},{"b":11808,"kind":"hindi_commentary","page":484,"explains":["4.15.22"],"text":"पृथुने कहा—सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोकमें मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणोंको लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषयमें तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्‍न किसी औरकी स्तुति करो॥ २२॥"},{"b":11809,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.23"],"text":"तस्मात्परोक्षेऽस्मदुपश्रुतान्यलं"},{"b":11810,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.23"],"text":"करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाचः।"},{"b":11811,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.23"],"text":"सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादे"},{"b":11812,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.23"],"text":"जुगुप्सितं न स्तवयन्ति सभ्याः॥ २३"},{"b":11813,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.24"],"text":"महद‍्गुणानात्मनि कर्तुमीशः"},{"b":11814,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.24"],"text":"कः स्तावकैः स्तावयतेऽसतोऽपि।"},{"b":11815,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.24"],"text":"तेऽस्याभविष्यन्‍निति विप्रलब्धो"},{"b":11816,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.24"],"text":"जनावहासं कुमतिर्न वेद॥ २४"},{"b":11817,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.25"],"text":"प्रभवो ह्यात्मनः स्तोत्रं जुगुप्सन्त्यपि विश्रुताः।"},{"b":11818,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.25"],"text":"ह्रीमन्तः परमोदाराः पौरुषं वा विगर्हितम्॥ २५"},{"b":11819,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.26"],"text":"वयं त्वविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभिः।"},{"b":11820,"kind":"sanskrit_shloka","page":485,"verses":["4.15.26"],"text":"कर्मभिः कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत्॥ २६"},{"b":11821,"kind":"hindi_commentary","page":485,"explains":["4.15.23","4.15.24","4.15.25","4.15.26"],"text":"मृदुभाषियो! कालान्तरमें जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायँ, तब भरपेट अपनी मधुर वाणीसे मेरी स्तुति कर लेना। देखो, शिष्ट पुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरिके गुणानुवादके रहते हुए तुच्छ मनुष्योंकी स्तुति नहीं किया करते॥ २३॥ महान् गुणोंको धारण करनेमें समर्थ होनेपर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उनके न रहनेपर भी केवल सम्भावनामात्रसे स्तुति करनेवालोंद्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक-अमुक गुण हो जाते—इस प्रकारकी स्तुतिसे तो मनुष्यकी वंचना की जाती है। वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं॥ २४॥ जिस प्रकार लज्जाशील उदार पुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रमकी चर्चा होनी बुरी समझते हैं, उसी प्रकार लोकविख्यात समर्थ पुरुष अपनी स्तुतिको भी निन्दित मानते हैं॥ २५॥ सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मोंके द्वारा लोकमें अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अबतक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुमलोगोंसे बच्चोंके समान अपनी कीर्तिका किस प्रकार गान करावें?॥ २६॥"},{"b":11822,"kind":"hindi_translation","page":485,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे पृथुचरिते पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥"}],"notes":[{"id":"v1:511","mark":"१","page":484,"after_verse":"4.15.15","text":"प्रा० पा०—जनं।"},{"id":"v1:512","mark":"२","page":484,"after_verse":"4.15.15","text":"प्रा० पा०—मिव।"},{"id":"v1:513","mark":"३","page":484,"after_verse":"4.15.16","text":"प्रा० पा०—धर्मं।"},{"id":"v1:514","mark":"४","page":484,"after_verse":"4.15.18","text":"प्रा० पा०—माया।"},{"id":"v1:515","mark":"५","page":484,"after_verse":"4.15.22","text":"प्रा० पा०—भो।"}],"corrections":{"count":3,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}