{"id":"4.12","title":"चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12","part":"चतुर्थ स्कन्ध","heading":"अथ द्वादशोऽध्यायः","topics":["ध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति"],"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/","edition":"Srimad-Bhagavatam Mahapurana, Gita Press Gorakhpur (codes 26, 27), corrected to Gita Press's own typeset pages","publisher":"गीताप्रेस, गोरखपुर","notice":"गीताप्रेस, गोरखपुरका प्रकाशन (दो खण्ड, कोड 26 और 27), गीताप्रेसके अपने मुद्रित पृष्ठोंसे अक्षरशः शुद्ध किया हुआ। प्रत्येक शुद्धि प्रमाणसहित शुद्धि-पत्रमें।","cite":"श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.<श्लोक> · गीताप्रेस, गोरखपुर · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/#shloka-<श्लोक>","printed":{"volume":1,"pages":[467,473]},"verses":[{"id":"4.12.1","number":1,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/1/","page":467,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसा-","दपेतमन्युं भगवान् धनेश्‍वरः।","तत्रागतश्चारणयक्षकिन्‍नरैः","संस्तूयमानोऽभ्यवदत्कृतांजलिम्॥ १"],"iast":["dhruvaṃ nivṛttaṃ pratibuddhya vaiśasā-","dapetamanyuṃ bhagavān dhaneśvaraḥ|","tatrāgataścāraṇayakṣakinnaraiḥ","saṃstūyamāno'bhyavadatkṛtāṃjalim|| 1"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ध्रुवका क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षोंके वधसे निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान् कुबेर वहाँ आये। उस समय यक्ष, चारण और किन्‍नरलोग उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुवजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब कुबेरने कहा॥ १॥"},{"id":"4.12.2","number":2,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/2/","page":467,"speaker":"धनद उवाच","sanskrit":["भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ।","यस्त्वं पितामहादेशाद्वैरं दुस्त्यजमत्यजः॥ २"],"iast":["bho bhoḥ kṣatriyadāyāda parituṣṭo'smi te'nagha|","yastvaṃ pitāmahādeśādvairaṃ dustyajamatyajaḥ|| 2"],"meaning":"श्रीकुबेरजी बोले—शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार! तुमने अपने दादाके उपदेशसे ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया; इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्‍न हूँ॥ २॥"},{"id":"4.12.3","number":3,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/3/","page":468,"speaker":"धनद उवाच","sanskrit":["न भवानवधीद्यक्षान्‍न यक्षा भ्रातरं तव।","काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयोः॥ ३"],"iast":["na bhavānavadhīdyakṣānna yakṣā bhrātaraṃ tava|","kāla eva hi bhūtānāṃ prabhurapyayabhāvayoḥ|| 3"],"meaning":"वास्तवमें न तुमने यक्षोंको मारा है और न यक्षोंने तुम्हारे भाईको। समस्त जीवोंकी उत्पत्ति और विनाशका कारण तो एकमात्र काल ही है॥ ३॥"},{"id":"4.12.4","number":4,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/4/","page":468,"speaker":"धनद उवाच","sanskrit":["अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात्पुरुषस्य हि।","स्वाप्नीवाभात्यतद्ध्यानाद्यया बन्धविपर्ययौ॥ ४"],"iast":["ahaṃ tvamityapārthā dhīrajñānātpuruṣasya hi|","svāpnīvābhātyataddhyānādyayā bandhaviparyayau|| 4"],"meaning":"यह मैं-तू आदि मिथ्याबुद्धि तो जीवको अज्ञानवश स्वप्नके समान शरीरादिको ही आत्मा माननेसे उत्पन्‍न होती है। इसीसे मनुष्यको बन्धन एवं दुःखादि विपरीत अवस्थाओंकी प्राप्ति होती है॥ ४॥"},{"id":"4.12.5","number":5,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/5/","page":468,"speaker":"धनद उवाच","sanskrit":["तद्गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तमधोक्षजम्।","सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम्॥ ५"],"iast":["tadgaccha dhruva bhadraṃ te bhagavantamadhokṣajam|","sarvabhūtātmabhāvena sarvabhūtātmavigraham|| 5"],"meaning":"ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपाशसे मुक्त होनेके लिये सब जीवोंमें समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरिका भजन करो। वे संसारपाशका छेदन करनेवाले हैं तथा संसारकी उत्पत्ति आदिके लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्तिसे युक्त होकर भी वास्तवमें उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करनेयोग्य हैं॥ ५-६॥","meaning_covers":[5,6]},{"id":"4.12.6","number":6,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/6/","page":468,"speaker":"धनद उवाच","sanskrit":["भजस्व भजनीयाङ्‌घ्रिमभवाय भवच्छिदम्।","युक्तं विरहितं शक्‍त्या गुणमय्याऽऽत्ममायया॥ ६"],"iast":["bhajasva bhajanīyāṅghrimabhavāya bhavacchidam|","yuktaṃ virahitaṃ śaktyā guṇamayyā''tmamāyayā|| 6"],"meaning":"ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपाशसे मुक्त होनेके लिये सब जीवोंमें समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरिका भजन करो। वे संसारपाशका छेदन करनेवाले हैं तथा संसारकी उत्पत्ति आदिके लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्तिसे युक्त होकर भी वास्तवमें उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करनेयोग्य हैं॥ ५-६॥","meaning_covers":[5,6]},{"id":"4.12.7","number":7,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/7/","page":468,"speaker":"धनद उवाच","sanskrit":["वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं","मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः ।","वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयो-","रनन्तरं त्वां वयमङ्ग शुश्रुम॥ ७"],"iast":["vṛṇīhi kāmaṃ nṛpa yanmanogataṃ","mattastvamauttānapade'viśaṅkitaḥ |","varaṃ varārho'mbujanābhapādayo-","ranantaraṃ tvāṃ vayamaṅga śuśruma|| 7"],"meaning":"प्रियवर! हमने सुना है, तुम सर्वदा भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंके समीप रहनेवाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पानेयोग्य हो। ध्रुव! तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच एवं निःशंक होकर माँग लो॥ ७॥"},{"id":"4.12.8","number":8,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/8/","page":468,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स राजराजेन वराय चोदितो","ध्रुवो महाभागवतो महामतिः।","हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया","तरत्ययत्नेन दुरत्ययं तमः॥ ८"],"iast":["sa rājarājena varāya codito","dhruvo mahābhāgavato mahāmatiḥ|","harau sa vavre'calitāṃ smṛtiṃ yayā","taratyayatnena duratyayaṃ tamaḥ|| 8"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! यक्षराज कुबेरने जब इस प्रकार वर माँगनेके लिये आग्रह किया, तब महाभागवत महामति ध्रुवजीने उनसे यही माँगा कि मुझे श्रीहरिकी अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसारसागरको पार कर जाता है॥ ८॥"},{"id":"4.12.9","number":9,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/9/","page":468,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः।","पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत॥ ९"],"iast":["tasya prītena manasā tāṃ dattvaiḍaviḍastataḥ|","paśyato'ntardadhe so'pi svapuraṃ pratyapadyata|| 9"],"meaning":"इडविडाके पुत्र कुबेरजीने बड़े प्रसन्‍न मनसे उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुवजी भी अपनी राजधानीको लौट आये॥ ९॥"},{"id":"4.12.10","number":10,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/10/","page":468,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः।","द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम्॥ १०"],"iast":["athāyajata yajñeśaṃ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ|","dravyakriyādevatānāṃ karma karmaphalapradam|| 10"],"meaning":"वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की; भगवान् ही द्रव्य, क्रिया और देवता-सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफलके दाता भी हैं॥ १०॥"},{"id":"4.12.11","number":11,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/11/","page":468,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन्।","ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम्॥ ११"],"iast":["sarvātmanyacyute'sarve tīvraughāṃ bhaktimudvahan|","dadarśātmani bhūteṣu tamevāvasthitaṃ vibhum|| 11"],"meaning":"सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युतमें प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुवजी अपनेमें और समस्त प्राणियोंमें सर्वव्यापक श्रीहरिको ही विराजमान देखने लगे॥ ११॥"},{"id":"4.12.12","number":12,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/12/","page":468,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तमेवं शीलसम्पन्‍नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम्।","गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजाः॥ १२"],"iast":["tamevaṃ śīlasampannaṃ brahmaṇyaṃ dīnavatsalam|","goptāraṃ dharmasetūnāṃ menire pitaraṃ prajāḥ|| 12"],"meaning":"ध्रुवजी बड़े ही शीलसम्पन्‍न, ब्राह्मणभक्त, दीनवत्सल और धर्ममर्यादाके रक्षक थे; उनकी प्रजा उन्हें साक्षात् पिताके समान मानती थी॥ १२॥"},{"id":"4.12.13","number":13,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/13/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["षट्त्रिंशद्वर्षसाहस्रं शशास क्षितिमण्डलम्।","भोगैः पुण्यक्षयं कुर्वन्‍नभोगैरशुभक्षयम्॥ १३"],"iast":["ṣaṭtriṃśadvarṣasāhasraṃ śaśāsa kṣitimaṇḍalam|","bhogaiḥ puṇyakṣayaṃ kurvannabhogairaśubhakṣayam|| 13"],"meaning":"इस प्रकार तरह-तरहके ऐश्‍वर्यभोगसे पुण्यका और भोगोंके त्यागपूर्वक यज्ञादि कर्मोंके अनुष्ठानसे पापका क्षय करते हुए उन्होंने छत्तीस हजार वर्षतक पृथ्वीका शासन किया॥ १३॥"},{"id":"4.12.14","number":14,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/14/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः।","त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान्‍नृपासनम्॥ १४"],"iast":["evaṃ bahusavaṃ kālaṃ mahātmāvicalendriyaḥ|","trivargaupayikaṃ nītvā putrāyādānnṛpāsanam|| 14"],"meaning":"जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुवने इसी तरह अर्थ, धर्म और कामके सम्पादनमें बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कलको राजसिंहासन सौंप दिया॥ १४॥"},{"id":"4.12.15","number":15,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/15/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["मन्यमान इदं विश्‍वं मायारचितमात्मनि।","अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५"],"iast":["manyamāna idaṃ viśvaṃ māyāracitamātmani|","avidyāracitasvapnagandharvanagaropamam || 15"],"meaning":"इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचको अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगरके समान मायासे अपनेमें ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहारभूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य—ये सभी कालके गालमें पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रमको चले गये॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"4.12.16","number":16,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/16/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोश-","मन्तःपुरं परिविहारभुवश्‍च रम्याः।","भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य","कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम्॥ १६"],"iast":["ātmastryapatyasuhṛdo balamṛddhakośa-","mantaḥpuraṃ parivihārabhuvaśca ramyāḥ|","bhūmaṇḍalaṃ jaladhimekhalamākalayya","kālopasṛṣṭamiti sa prayayau viśālām|| 16"],"meaning":"इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचको अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगरके समान मायासे अपनेमें ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहारभूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य—ये सभी कालके गालमें पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रमको चले गये॥ १५-१६॥","meaning_covers":[15,16]},{"id":"4.12.17","number":17,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/17/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य","बद‍्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः।","स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्","ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ॥ १७"],"iast":["tasyāṃ viśuddhakaraṇaḥ śivavārvigāhya","baddhvā''sanaṃ jitamarunmanasā''hṛtākṣaḥ|","sthūle dadhāra bhagavatpratirūpa etad","dhyāyaṃstadavyavahito vyasṛjatsamādhau|| 17"],"meaning":"वहाँ उन्होंने पवित्र जलमें स्नानकर इन्द्रियोंको विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसनसे बैठकर प्राणायामद्वारा वायुको वशमें किया। तदनन्तर मनके द्वारा इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनको भगवान्‌के स्थूल विराट्स्वरूपमें स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूपका चिन्तन करते-करते वे अन्तमें ध्याता और ध्येयके भेदसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें लीन हो गये और उस अवस्थामें विराट्रूपका भी परित्याग कर दिया॥ १७॥"},{"id":"4.12.18","number":18,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/18/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्‍नजस्र-","मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः।","विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो","नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिंगः॥ १८"],"iast":["bhaktiṃ harau bhagavati pravahannajasra-","mānandabāṣpakalayā muhurardyamānaḥ|","viklidyamānahṛdayaḥ pulakācitāṅgo","nātmānamasmaradasāviti muktaliṃgaḥ|| 18"],"meaning":"इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके प्रति निरन्तर भक्तिभावका प्रवाह चलते रहनेसे उनके नेत्रोंमें बार-बार आनन्दाश्रुओंकी बाढ़-सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीरमें रोमांच हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जानेसे उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही॥ १८॥"},{"id":"4.12.19","number":19,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/19/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद् ध्रुवः।","विभ्राजयद्दश दिशो राकापतिमिवोदितम्॥ १९"],"iast":["sa dadarśa vimānāgryaṃ nabhaso'vatarad dhruvaḥ|","vibhrājayaddaśa diśo rākāpatimivoditam|| 19"],"meaning":"इसी समय ध्रुवजीने आकाशसे एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाशसे दसों दिशाओंको आलोकित कर रहा था; मानो पूर्णिमाका चन्द्र ही उदय हुआ हो॥ १९॥"},{"id":"4.12.20","number":20,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/20/","page":469,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ","श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ।","स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ","किरीटहारांगदचारुकुण्डलौ ॥ २०"],"iast":["tatrānu devapravarau caturbhujau","śyāmau kiśorāvaruṇāmbujekṣaṇau|","sthitāvavaṣṭabhya gadāṃ suvāsasau","kirīṭahārāṃgadacārukuṇḍalau || 20"],"meaning":"उसमें दो श्रेष्ठ पार्षद गदाओंका सहारा लिये खड़े थे। उनके चार भुजाएँ थीं, सुन्दर श्याम शरीर था, किशोर अवस्था थी और अरुण कमलके समान नेत्र थे। वे सुन्दर वस्त्र, किरीट, हार, भुजबन्ध और अति मनोहर कुण्डल धारण किये हुए थे॥ २०॥"},{"id":"4.12.21","number":21,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/21/","page":470,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्करा-","वभ्युत्थितः साध्वसविस्मृतक्रमः।","ननाम नामानि गृणन्मधुद्विषः","पार्षत्प्रधानाविति संहतांजलिः॥ २१"],"iast":["vijñāya tāvuttamagāyakiṅkarā-","vabhyutthitaḥ sādhvasavismṛtakramaḥ|","nanāma nāmāni gṛṇanmadhudviṣaḥ","pārṣatpradhānāviti saṃhatāṃjaliḥ|| 21"],"meaning":"उन्हें पुण्यश्लोक श्रीहरिके सेवक जान ध्रुवजी हड़बड़ाहटमें पूजा आदिका क्रम भूलकर सहसा खड़े हो गये और ये भगवान्‌के पार्षदोंमें प्रधान हैं—ऐसा समझकर उन्होंने श्रीमधुसूदनके नामोंका कीर्तन करते हुए उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥ २१॥"},{"id":"4.12.22","number":22,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/22/","page":470,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तं कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसं","बद्धाञ्जलिं प्रश्रयनम्रकन्धरम्।","सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितं","प्रत्यूचतुः पुष्करनाभसम्मतौ॥ २२"],"iast":["taṃ kṛṣṇapādābhiniviṣṭacetasaṃ","baddhāñjaliṃ praśrayanamrakandharam|","sunandanandāvupasṛtya sasmitaṃ","pratyūcatuḥ puṣkaranābhasammatau|| 22"],"meaning":"ध्रुवजीका मन भगवान्‌के चरणकमलोंमें तल्लीन हो गया और वे हाथ जोड़कर बड़ी नम्रतासे सिर नीचा किये खड़े रह गये। तब श्रीहरिके प्रिय पार्षद सुनन्द और नन्दने उनके पास जाकर मुसकराते हुए कहा॥ २२॥"},{"id":"4.12.23","number":23,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/23/","page":470,"speaker":"सुनन्दनन्दावूचतुः","sanskrit":["भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः शृणु।","यः पंचवर्षस्तपसा भवान्देवमतीतृपत्॥ २३"],"iast":["bho bho rājan subhadraṃ te vācaṃ no'vahitaḥ śṛṇu|","yaḥ paṃcavarṣastapasā bhavāndevamatītṛpat|| 23"],"meaning":"सुनन्द और नन्द कहने लगे—राजन्! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्षकी अवस्थामें ही तपस्या करके सर्वेश्‍वर भगवान्‌को प्रसन्‍न कर लिया था॥ २३॥"},{"id":"4.12.24","number":24,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/24/","page":470,"speaker":"सुनन्दनन्दावूचतुः","sanskrit":["तस्याखिलजगद्धातुरावां देवस्य शार्ङ्गिणः।","पार्षदाविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम्॥ २४"],"iast":["tasyākhilajagaddhāturāvāṃ devasya śārṅgiṇaḥ|","pārṣadāviha samprāptau netuṃ tvāṃ bhagavatpadam|| 24"],"meaning":"हम उन्हीं निखिलजगन्‍नियन्ता शार्ङ्गपाणि भगवान् विष्णुके सेवक हैं और आपको भगवान्‌के धाममें ले जानेके लिये यहाँ आये हैं॥ २४॥"},{"id":"4.12.25","number":25,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/25/","page":470,"speaker":"सुनन्दनन्दावूचतुः","sanskrit":["सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया","यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम्।","आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो","ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम्॥ २५"],"iast":["sudurjayaṃ viṣṇupadaṃ jitaṃ tvayā","yatsūrayo'prāpya vicakṣate param|","ātiṣṭha taccandradivākarādayo","graharkṣatārāḥ pariyanti dakṣiṇam|| 25"],"meaning":"आपने अपनी भक्तिके प्रभावसे विष्णुलोकका अधिकार प्राप्त किया है, जो औरोंके लिये बड़ा दुर्लभ है। परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँतक नहीं पहुँच सके, वे नीचेसे केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाममें निवास कीजिये॥ २५॥"},{"id":"4.12.26","number":26,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/26/","page":470,"speaker":"सुनन्दनन्दावूचतुः","sanskrit":["अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यंग कर्हिचित्।","आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम्॥ २६"],"iast":["anāsthitaṃ te pitṛbhiranyairapyaṃga karhicit|","ātiṣṭha jagatāṃ vandyaṃ tadviṣṇoḥ paramaṃ padam|| 26"],"meaning":"प्रियवर! आजतक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पदपर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान् विष्णुका वह परमधाम सारे संसारका वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों॥ २६॥"},{"id":"4.12.27","number":27,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/27/","page":470,"speaker":"सुनन्दनन्दावूचतुः","sanskrit":["एतद्विमानप्रवरमुत्तमश्लोकमौलिना ।","उपस्थापितमायुष्मन्‍नधिरोढुं त्वमर्हसि॥ २७"],"iast":["etadvimānapravaramuttamaślokamaulinā |","upasthāpitamāyuṣmannadhiroḍhuṃ tvamarhasi|| 27"],"meaning":"आयुष्मन्! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोकशिखामणि श्रीहरिने आपके लिये ही भेजा है, आप इसपर चढ़नेयोग्य हैं॥ २७॥"},{"id":"4.12.28","number":28,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/28/","page":470,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो-","र्मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः।","कृताभिषेकः कृतनित्यमंगलो","मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत्॥ २८"],"iast":["niśamya vaikuṇṭhaniyojyamukhyayo-","rmadhucyutaṃ vācamurukramapriyaḥ|","kṛtābhiṣekaḥ kṛtanityamaṃgalo","munīn praṇamyāśiṣamabhyavādayat|| 28"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्‌के प्रमुख पार्षदोंके ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुवजीने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो मांगलिक अलंकारादि धारण किये। बदरिकाश्रममें रहनेवाले मुनियोंको प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया॥ २८॥"},{"id":"4.12.29","number":29,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/29/","page":470,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च।","इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम्॥ २९"],"iast":["parītyābhyarcya dhiṣṇyāgryaṃ pārṣadāvabhivandya ca|","iyeṣa tadadhiṣṭhātuṃ bibhradrūpaṃ hiraṇmayam|| 29"],"meaning":"इसके बाद उस श्रेष्ठ विमानकी पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदोंको प्रणाम कर सुवर्णके समान कान्तिमान् दिव्य रूप धारणकर उसपर चढ़नेको तैयार हुए॥ २९॥"},{"id":"4.12.30","number":30,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/30/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तदोत्तानपदः पुत्रो ददर्शान्तकमागतम्।","मृत्योर्मूर्ध्नि पदं दत्त्वा आरुरोहाद्भुतं गृहम्॥ ३०"],"iast":["tadottānapadaḥ putro dadarśāntakamāgatam|","mṛtyormūrdhni padaṃ dattvā ārurohādbhutaṃ gṛham|| 30"],"meaning":"इतनेमें ही ध्रुवजीने देखा कि काल मूर्तिमान् होकर उनके सामने खड़ा है। तब वे मृत्युके सिरपर पैर रखकर उस समय अद्भुत विमानपर चढ़ गये॥ ३०॥"},{"id":"4.12.31","number":31,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/31/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तदा दुन्दुभयो नेदुर्मृदंगपणवादयः।","गन्धर्वमुख्याः प्रजगुः पेतुः कुसुमवृष्टयः॥ ३१"],"iast":["tadā dundubhayo nedurmṛdaṃgapaṇavādayaḥ|","gandharvamukhyāḥ prajaguḥ petuḥ kusumavṛṣṭayaḥ|| 31"],"meaning":"उस समय आकाशमें दुन्दुभि, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे और फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ ३१॥"},{"id":"4.12.32","number":32,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/32/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुवः।","अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम्॥ ३२"],"iast":["sa ca svarlokamārokṣyan sunītiṃ jananīṃ dhruvaḥ|","anvasmaradagaṃ hitvā dīnāṃ yāsye triviṣṭapam|| 32"],"meaning":"विमानपर बैठकर ध्रुवजी ज्यों-ही भगवान्‌के धामको जानेके लिये तैयार हुए, त्यों-ही उन्हें अपनी माता सुनीतिका स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, ‘क्या मैं बेचारी माताको छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधामको जाऊँगा?’॥ ३२॥"},{"id":"4.12.33","number":33,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/33/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ।","दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम्॥ ३३"],"iast":["iti vyavasitaṃ tasya vyavasāya surottamau|","darśayāmāsaturdevīṃ puro yānena gacchatīm|| 33"],"meaning":"नन्द और सुनन्दने ध्रुवके हृदयकी बात जानकर उन्हें दिखलाया कि देवी सुनीति आगे-आगे दूसरे विमानपर जा रही हैं॥ ३३॥"},{"id":"4.12.34","number":34,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/34/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["तत्र तत्र प्रशंसद्भिः पथि वैमानिकैः सुरैः।","अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमैः क्रमशो ग्रहान्॥ ३४"],"iast":["tatra tatra praśaṃsadbhiḥ pathi vaimānikaiḥ suraiḥ|","avakīryamāṇo dadṛśe kusumaiḥ kramaśo grahān|| 34"],"meaning":"उन्होंने क्रमशः सूर्य आदि सभी ग्रह देखे। मार्गमें जहाँ-तहाँ विमानोंपर बैठे हुए देवता उनकी प्रशंसा करते हुए फूलोंकी वर्षा करते जाते थे॥ ३४॥"},{"id":"4.12.35","number":35,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/35/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि।","परस्ताद्यद् ध्रुवगतिर्विष्णोः पदमथाभ्यगात्॥ ३५"],"iast":["trilokīṃ devayānena so'tivrajya munīnapi|","parastādyad dhruvagatirviṣṇoḥ padamathābhyagāt|| 35"],"meaning":"उस दिव्य विमानपर बैठकर ध्रुवजी त्रिलोकीको पारकर सप्तर्षिमण्डलसे भी ऊपर भगवान् विष्णुके नित्यधाममें पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की॥ ३५॥"},{"id":"4.12.36","number":36,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/36/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["यद् भ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतो","लोकास्त्रयो ह्यनु विभ्राजन्त एते।","यन्‍नाव्रजंजन्तुषु येऽननुग्रहा","व्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येऽनिशम्॥ ३६"],"iast":["yad bhrājamānaṃ svarucaiva sarvato","lokāstrayo hyanu vibhrājanta ete|","yannāvrajaṃjantuṣu ye'nanugrahā","vrajanti bhadrāṇi caranti ye'niśam|| 36"],"meaning":"यह दिव्य धाम अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित है, इसीके प्रकाशसे तीनों लोक प्रकाशित हैं। इसमें जीवोंपर निर्दयता करनेवाले पुरुष नहीं जा सकते। यहाँ तो उन्हींकी पहुँच होती है, जो दिन-रात प्राणियोंके कल्याणके लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं॥ ३६॥"},{"id":"4.12.37","number":37,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/37/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरंजनाः।","यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः॥ ३७"],"iast":["śāntāḥ samadṛśaḥ śuddhāḥ sarvabhūtānuraṃjanāḥ|","yāntyañjasācyutapadamacyutapriyabāndhavāḥ|| 37"],"meaning":"जो शान्त, समदर्शी, शुद्ध और सब प्राणियोंको प्रसन्‍न रखनेवाले हैं तथा भगवद्भक्तोंको ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद‍् मानते हैं—ऐसे लोग सुगमतासे ही इस भगवद्धामको प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥"},{"id":"4.12.38","number":38,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/38/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इत्युत्तानपदः पुत्रो ध्रुवः कृष्णपरायणः।","अभूत्त्रयाणां लोकानां चूडामणिरिवामलः॥ ३८"],"iast":["ityuttānapadaḥ putro dhruvaḥ kṛṣṇaparāyaṇaḥ|","abhūttrayāṇāṃ lokānāṃ cūḍāmaṇirivāmalaḥ|| 38"],"meaning":"इस प्रकार उत्तानपादके पुत्र भगवत्परायण श्रीध्रुवजी तीनों लोकोंके ऊपर उसकी निर्मल चूडा-मणिके समान विराजमान हुए॥ ३८॥"},{"id":"4.12.39","number":39,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/39/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम्।","यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः॥ ३९"],"iast":["gambhīravego'nimiṣaṃ jyotiṣāṃ cakramāhitam|","yasmin bhramati kauravya meḍhyāmiva gavāṃ gaṇaḥ|| 39"],"meaning":"कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलानेके समय खम्भेके चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेगवाला ज्योतिश्‍चक्र उस अविनाशी लोकके आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है॥ ३९॥"},{"id":"4.12.40","number":40,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/40/","page":471,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["महिमानं विलोक्यास्य नारदो भगवानृषिः।","आतोद्यं वितुदन् श्लोकान् सत्रेऽगायत्प्रचेतसाम्॥ ४०"],"iast":["mahimānaṃ vilokyāsya nārado bhagavānṛṣiḥ|","ātodyaṃ vitudan ślokān satre'gāyatpracetasām|| 40"],"meaning":"उसकी महिमा देखकर देवर्षि नारदने प्रचेताओंकी यज्ञशालामें वीणा बजाकर ये तीन श्लोक गाये थे॥ ४०॥"},{"id":"4.12.41","number":41,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/41/","page":472,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["नूनं सुनीतेः पतिदेवताया-","स्तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम्।","दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो","नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपाः॥ ४१"],"iast":["nūnaṃ sunīteḥ patidevatāyā-","stapaḥprabhāvasya sutasya tāṃ gatim|","dṛṣṭvābhyupāyānapi vedavādino","naivādhigantuṃ prabhavanti kiṃ nṛpāḥ|| 41"],"meaning":"नारदजीने कहा था—इसमें सन्देह नहीं, पतिपरायणा सुनीतिके पुत्र ध्रुवने तपस्याद्वारा अद्भुत शक्ति संचित करके जो गति पायी है, उसे भागवतधर्मोंकी आलोचना करके वेदवादी मुनिगण भी नहीं पा सकते; फिर राजाओंकी तो बात ही क्या है॥ ४१॥"},{"id":"4.12.42","number":42,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/42/","page":472,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["यः पंचवर्षो गुरुदारवाक्शरै-","र्भिन्‍नेन यातो हृदयेन दूयता।","वनं मदादेशकरोऽजितं प्रभुं","जिगाय तद्भक्तगुणैः पराजितम्॥ ४२"],"iast":["yaḥ paṃcavarṣo gurudāravākśarai-","rbhinnena yāto hṛdayena dūyatā|","vanaṃ madādeśakaro'jitaṃ prabhuṃ","jigāya tadbhaktaguṇaiḥ parājitam|| 42"],"meaning":"अहो! वे पाँच वर्षकी अवस्थामें ही सौतेली माताके वाग्बाणोंसे मर्माहत होकर दुःखी हृदयसे वनमें चले गये और मेरे उपदेशके अनुसार आचरण करके ही उन अजेय प्रभुको जीत लिया, जो केवल अपने भक्तोंके गुणोंसे ही वशमें होते हैं॥ ४२॥"},{"id":"4.12.43","number":43,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/43/","page":472,"speaker":"नारद उवाच","sanskrit":["यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ-","मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः।","षट्पंचवर्षो यदहोभिरल्पैः","प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम्॥ ४३"],"iast":["yaḥ kṣatrabandhurbhuvi tasyādhirūḍha-","manvārurukṣedapi varṣapūgaiḥ|","ṣaṭpaṃcavarṣo yadahobhiralpaiḥ","prasādya vaikuṇṭhamavāpa tatpadam|| 43"],"meaning":"ध्रुवजीने तो पाँच-छः वर्षकी अवस्थामें कुछ दिनोंकी तपस्यासे ही भगवान्‌को प्रसन्‍न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पदको भूमण्डलमें कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षोंतक तपस्या करके भी पा सकता है?॥ ४३॥"},{"id":"4.12.44","number":44,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/44/","page":472,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।","ध्रुवस्योद्दामयशसश्‍चरितं सम्मतं सताम्॥ ४४"],"iast":["etatte'bhihitaṃ sarvaṃ yatpṛṣṭo'hamiha tvayā|","dhruvasyoddāmayaśasaścaritaṃ sammataṃ satām|| 44"],"meaning":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुवजीके चरित्रके विषयमें पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्रकी बड़ी प्रशंसा करते हैं॥ ४४॥"},{"id":"4.12.45","number":45,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/45/","page":472,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वस्त्ययनं महत्।","स्वर्ग्यं ध्रौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम्॥ ४५"],"iast":["dhanyaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ puṇyaṃ svastyayanaṃ mahat|","svargyaṃ dhrauvyaṃ saumanasyaṃ praśasyamaghamarṣaṇam|| 45"],"meaning":"यह धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त मंगलमय है। इससे स्वर्ग और अविनाशी पद भी प्राप्त हो सकता है। यह देवत्वकी प्राप्ति करानेवाला, बड़ा ही प्रशंसनीय और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४५॥"},{"id":"4.12.46","number":46,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/46/","page":472,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["श्रुत्वैतच्छ्रद्धयाभीक्ष्णमच्युतप्रियचेष्टितम्।","भवेद्भक्तिर्भगवति यया स्यात्क्लेशसंक्षयः॥ ४६"],"iast":["śrutvaitacchraddhayābhīkṣṇamacyutapriyaceṣṭitam|","bhavedbhaktirbhagavati yayā syātkleśasaṃkṣayaḥ|| 46"],"meaning":"भगवद्भक्त ध्रुवके इस पवित्र चरित्रको जो श्रद्धापूर्वक बार-बार सुनते हैं, उन्हें भगवान्‌की भक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके सभी दुःखोंका नाश हो जाता है॥ ४६॥"},{"id":"4.12.47","number":47,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/47/","page":472,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["महत्त्वमिच्छतां तीर्थं श्रोतुः शीलादयो गुणाः।","यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम्॥ ४७"],"iast":["mahattvamicchatāṃ tīrthaṃ śrotuḥ śīlādayo guṇāḥ|","yatra tejastadicchūnāṃ māno yatra manasvinām|| 47"],"meaning":"इसे श्रवण करनेवालेको शीलादि गुणोंकी प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं, उन्हें महत्त्वकी प्राप्ति करानेवाला स्थान मिलता है, जो तेज चाहते हैं, उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियोंका मान बढ़ता है॥ ४७॥"},{"id":"4.12.48","number":48,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/48/","page":472,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["प्रयतः कीर्तयेत्प्रातः समवाये द्विजन्मनाम्।","सायं च पुण्यश्लोकस्य ध्रुवस्य चरितं महत्॥ ४८"],"iast":["prayataḥ kīrtayetprātaḥ samavāye dvijanmanām|","sāyaṃ ca puṇyaślokasya dhruvasya caritaṃ mahat|| 48"],"meaning":"पवित्रकीर्ति ध्रुवजीके इस महान् चरित्रका प्रातः और सायंकाल ब्राह्मणादि द्विजातियोंके समाजमें एकाग्र चित्तसे कीर्तन करना चाहिये॥ ४८॥"},{"id":"4.12.49","number":49,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/49/","page":472,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेऽथवा।","दिनक्षये व्यतीपाते सङ्‌क्रमेऽर्कदिनेऽपि वा॥ ४९"],"iast":["paurṇamāsyāṃ sinīvālyāṃ dvādaśyāṃ śravaṇe'thavā|","dinakṣaye vyatīpāte saṅkrame'rkadine'pi vā|| 49"],"meaning":"भगवान्‌के परम पवित्र चरणोंकी शरणमें रहनेवाला जो पुरुष इसे निष्कामभावसे पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवारके दिन श्रद्धालु पुरुषोंको सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है॥ ४९-५०॥","meaning_covers":[49,50]},{"id":"4.12.50","number":50,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/50/","page":473,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः।","नेच्छंस्तत्रात्मनाऽऽत्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति॥ ५०"],"iast":["śrāvayecchraddadhānānāṃ tīrthapādapadāśrayaḥ|","necchaṃstatrātmanā''tmānaṃ santuṣṭa iti sidhyati|| 50"],"meaning":"भगवान्‌के परम पवित्र चरणोंकी शरणमें रहनेवाला जो पुरुष इसे निष्कामभावसे पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवारके दिन श्रद्धालु पुरुषोंको सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है॥ ४९-५०॥","meaning_covers":[49,50]},{"id":"4.12.51","number":51,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/51/","page":473,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम्।","कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते॥ ५१"],"iast":["jñānamajñātatattvāya yo dadyātsatpathe'mṛtam|","kṛpālordīnanāthasya devāstasyānugṛhṇate|| 51"],"meaning":"यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्गके मर्मसे अनभिज्ञ हैं—उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुषपर देवता अनुग्रह करते हैं॥ ५१॥"},{"id":"4.12.52","number":52,"url":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/52/","page":473,"speaker":"मैत्रेय उवाच","sanskrit":["इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वह ध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः।","हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातुर्गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम॥ ५२"],"iast":["idaṃ mayā te'bhihitaṃ kurūdvaha dhruvasya vikhyātaviśuddhakarmaṇaḥ|","hitvārbhakaḥ krīḍanakāni māturgṛhaṃ ca viṣṇuṃ śaraṇaṃ yo jagāma|| 52"],"meaning":"ध्रुवजीके कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्थामें ही माताके घर और खिलौनोंका मोह छोड़कर श्रीविष्णुभगवान्‌की शरणमें चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया॥ ५२॥"}],"text":[{"b":11339,"kind":"adhyaya_heading","page":467,"text":"अथ द्वादशोऽध्यायः"},{"b":11340,"kind":"topic_heading","page":467,"text":"ध्रुवजीको कुबेरका वरदान और विष्णुलोककी प्राप्ति"},{"b":11341,"kind":"topic_heading","page":467,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11342,"kind":"sanskrit_shloka","page":467,"verses":["4.12.1"],"text":"ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसा-"},{"b":11343,"kind":"sanskrit_shloka","page":467,"verses":["4.12.1"],"text":"दपेतमन्युं भगवान् धनेश्‍वरः।"},{"b":11344,"kind":"sanskrit_shloka","page":467,"verses":["4.12.1"],"text":"तत्रागतश्चारणयक्षकिन्‍नरैः"},{"b":11345,"kind":"sanskrit_shloka","page":467,"verses":["4.12.1"],"text":"संस्तूयमानोऽभ्यवदत्कृतांजलिम्॥ १"},{"b":11346,"kind":"hindi_commentary","page":467,"explains":["4.12.1"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! ध्रुवका क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षोंके वधसे निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान् कुबेर वहाँ आये। उस समय यक्ष, चारण और किन्‍नरलोग उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुवजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब कुबेरने कहा॥ १॥"},{"b":11347,"kind":"topic_heading","page":467,"text":"धनद उवाच"},{"b":11348,"kind":"sanskrit_shloka","page":467,"verses":["4.12.2"],"text":"भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ।"},{"b":11349,"kind":"sanskrit_shloka","page":467,"verses":["4.12.2"],"text":"यस्त्वं पितामहादेशाद्वैरं दुस्त्यजमत्यजः॥ २"},{"b":11350,"kind":"hindi_commentary","page":467,"explains":["4.12.2"],"text":"श्रीकुबेरजी बोले—शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार! तुमने अपने दादाके उपदेशसे ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग दिया; इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्‍न हूँ॥ २॥"},{"b":11351,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.3"],"text":"न भवानवधीद्यक्षान्‍न यक्षा भ्रातरं तव।"},{"b":11352,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.3"],"text":"काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयोः॥ ३"},{"b":11353,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.4"],"text":"अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात्पुरुषस्य हि।"},{"b":11354,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.4"],"text":"स्वाप्नीवाभात्यतद्ध्यानाद्यया बन्धविपर्ययौ॥ ४"},{"b":11355,"kind":"hindi_translation","page":468,"explains":["4.12.3","4.12.4"],"text":"वास्तवमें न तुमने यक्षोंको मारा है और न यक्षोंने तुम्हारे भाईको। समस्त जीवोंकी उत्पत्ति और विनाशका कारण तो एकमात्र काल ही है॥ ३॥ यह मैं-तू आदि मिथ्याबुद्धि तो जीवको अज्ञानवश स्वप्नके समान शरीरादिको ही आत्मा माननेसे उत्पन्‍न होती है। इसीसे मनुष्यको बन्धन एवं दुःखादि विपरीत अवस्थाओंकी प्राप्ति होती है॥ ४॥"},{"b":11356,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.5"],"text":"तद्गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तमधोक्षजम्।"},{"b":11357,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.5"],"text":"सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम्॥ ५"},{"b":11358,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.6"],"text":"भजस्व भजनीयाङ्‌घ्रिमभवाय भवच्छिदम्।"},{"b":11359,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.6"],"text":"युक्तं विरहितं शक्‍त्या गुणमय्याऽऽत्ममायया॥ ६"},{"b":11360,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.7"],"text":"वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं"},{"b":11361,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.7"],"text":"मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः ।"},{"b":11362,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.7"],"text":"वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयो-"},{"b":11363,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.7"],"text":"रनन्तरं त्वां वयमङ्ग शुश्रुम॥ ७"},{"b":11364,"kind":"hindi_commentary","page":468,"explains":["4.12.5","4.12.6","4.12.7"],"text":"ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपाशसे मुक्त होनेके लिये सब जीवोंमें समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरिका भजन करो। वे संसारपाशका छेदन करनेवाले हैं तथा संसारकी उत्पत्ति आदिके लिये अपनी त्रिगुणात्मिका मायाशक्तिसे युक्त होकर भी वास्तवमें उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करनेयोग्य हैं॥ ५-६॥ प्रियवर! हमने सुना है, तुम सर्वदा भगवान् कमलनाभके चरणकमलोंके समीप रहनेवाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पानेयोग्य हो। ध्रुव! तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच एवं निःशंक होकर माँग लो॥ ७॥"},{"b":11365,"kind":"topic_heading","page":467,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11366,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.8"],"text":"स राजराजेन वराय चोदितो"},{"b":11367,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.8"],"text":"ध्रुवो महाभागवतो महामतिः।"},{"b":11368,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.8"],"text":"हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया"},{"b":11369,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.8"],"text":"तरत्ययत्नेन दुरत्ययं तमः॥ ८"},{"b":11370,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.9"],"text":"तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः।"},{"b":11371,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.9"],"text":"पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत॥ ९"},{"b":11372,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.10"],"text":"अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः।"},{"b":11373,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.10"],"text":"द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम्॥ १०"},{"b":11374,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.11"],"text":"सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन्।"},{"b":11375,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.11"],"text":"ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम्॥ ११"},{"b":11376,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.12"],"text":"तमेवं शीलसम्पन्‍नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम्।"},{"b":11377,"kind":"sanskrit_shloka","page":468,"verses":["4.12.12"],"text":"गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजाः॥ १२"},{"b":11378,"kind":"hindi_commentary","page":468,"explains":["4.12.8","4.12.9","4.12.10","4.12.11","4.12.12"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! यक्षराज कुबेरने जब इस प्रकार वर माँगनेके लिये आग्रह किया, तब महाभागवत महामति ध्रुवजीने उनसे यही माँगा कि मुझे श्रीहरिकी अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसारसागरको पार कर जाता है॥ ८॥ इडविडाके पुत्र कुबेरजीने बड़े प्रसन्‍न मनसे उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुवजी भी अपनी राजधानीको लौट आये॥ ९॥ वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की; भगवान् ही द्रव्य, क्रिया और देवता-सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफलके दाता भी हैं॥ १०॥ सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युतमें प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुवजी अपनेमें और समस्त प्राणियोंमें सर्वव्यापक श्रीहरिको ही विराजमान देखने लगे॥ ११॥ ध्रुवजी बड़े ही शीलसम्पन्‍न, ब्राह्मणभक्त, दीनवत्सल और धर्ममर्यादाके रक्षक थे; उनकी प्रजा उन्हें साक्षात् पिताके समान मानती थी॥ १२॥"},{"b":11379,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.13"],"text":"षट्त्रिंशद्वर्षसाहस्रं शशास क्षितिमण्डलम्।"},{"b":11380,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.13"],"text":"भोगैः पुण्यक्षयं कुर्वन्‍नभोगैरशुभक्षयम्॥ १३"},{"b":11381,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.14"],"text":"एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः।"},{"b":11382,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.14"],"text":"त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान्‍नृपासनम्॥ १४"},{"b":11383,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.15"],"text":"मन्यमान इदं विश्‍वं मायारचितमात्मनि।"},{"b":11384,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.15"],"text":"अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५"},{"b":11385,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.16"],"text":"आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोश-"},{"b":11386,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.16"],"text":"मन्तःपुरं परिविहारभुवश्‍च रम्याः।"},{"b":11387,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.16"],"text":"भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य"},{"b":11388,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.16"],"text":"कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम्॥ १६"},{"b":11389,"kind":"hindi_commentary","page":469,"explains":["4.12.13","4.12.14","4.12.15","4.12.16"],"text":"इस प्रकार तरह-तरहके ऐश्‍वर्यभोगसे पुण्यका और भोगोंके त्यागपूर्वक यज्ञादि कर्मोंके अनुष्ठानसे पापका क्षय करते हुए उन्होंने छत्तीस हजार वर्षतक पृथ्वीका शासन किया॥ १३॥ जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुवने इसी तरह अर्थ, धर्म और कामके सम्पादनमें बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कलको राजसिंहासन सौंप दिया॥ १४॥ इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचको अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगरके समान मायासे अपनेमें ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहारभूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डलका राज्य—ये सभी कालके गालमें पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रमको चले गये॥ १५-१६॥"},{"b":11390,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.17"],"text":"तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य"},{"b":11391,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.17"],"text":"बद‍्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः।"},{"b":11392,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.17"],"text":"स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्"},{"b":11393,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.17"],"text":"ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ॥ १७"},{"b":11394,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.18"],"text":"भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्‍नजस्र-"},{"b":11395,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.18"],"text":"मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः।"},{"b":11396,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.18"],"text":"विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो"},{"b":11397,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.18"],"text":"नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिंगः॥ १८"},{"b":11398,"kind":"hindi_commentary","page":469,"explains":["4.12.17","4.12.18"],"text":"वहाँ उन्होंने पवित्र जलमें स्नानकर इन्द्रियोंको विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसनसे बैठकर प्राणायामद्वारा वायुको वशमें किया। तदनन्तर मनके द्वारा इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनको भगवान्‌के स्थूल विराट्स्वरूपमें स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूपका चिन्तन करते-करते वे अन्तमें ध्याता और ध्येयके भेदसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें लीन हो गये और उस अवस्थामें विराट्रूपका भी परित्याग कर दिया॥ १७॥ इस प्रकार भगवान् श्रीहरिके प्रति निरन्तर भक्तिभावका प्रवाह चलते रहनेसे उनके नेत्रोंमें बार-बार आनन्दाश्रुओंकी बाढ़-सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीरमें रोमांच हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जानेसे उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही॥ १८॥"},{"b":11399,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.19"],"text":"स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद् ध्रुवः।"},{"b":11400,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.19"],"text":"विभ्राजयद्दश दिशो राकापतिमिवोदितम्॥ १९"},{"b":11401,"kind":"hindi_commentary","page":469,"explains":["4.12.19"],"text":"इसी समय ध्रुवजीने आकाशसे एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाशसे दसों दिशाओंको आलोकित कर रहा था; मानो पूर्णिमाका चन्द्र ही उदय हुआ हो॥ १९॥"},{"b":11402,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.20"],"text":"तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ"},{"b":11403,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.20"],"text":"श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ।"},{"b":11404,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.20"],"text":"स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ"},{"b":11405,"kind":"sanskrit_shloka","page":469,"verses":["4.12.20"],"text":"किरीटहारांगदचारुकुण्डलौ ॥ २०"},{"b":11406,"kind":"hindi_commentary","page":469,"explains":["4.12.20"],"text":"उसमें दो श्रेष्ठ पार्षद गदाओंका सहारा लिये खड़े थे। उनके चार भुजाएँ थीं, सुन्दर श्याम शरीर था, किशोर अवस्था थी और अरुण कमलके समान नेत्र थे। वे सुन्दर वस्त्र, किरीट, हार, भुजबन्ध और अति मनोहर कुण्डल धारण किये हुए थे॥ २०॥"},{"b":11407,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.21"],"text":"विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्करा-"},{"b":11408,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.21"],"text":"वभ्युत्थितः साध्वसविस्मृतक्रमः।"},{"b":11409,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.21"],"text":"ननाम नामानि गृणन्मधुद्विषः"},{"b":11410,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.21"],"text":"पार्षत्प्रधानाविति संहतांजलिः॥ २१"},{"b":11411,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.22"],"text":"तं कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसं"},{"b":11412,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.22"],"text":"बद्धाञ्जलिं प्रश्रयनम्रकन्धरम्।"},{"b":11413,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.22"],"text":"सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितं"},{"b":11414,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.22"],"text":"प्रत्यूचतुः पुष्करनाभसम्मतौ॥ २२"},{"b":11415,"kind":"hindi_commentary","page":470,"explains":["4.12.21","4.12.22"],"text":"उन्हें पुण्यश्लोक श्रीहरिके सेवक जान ध्रुवजी हड़बड़ाहटमें पूजा आदिका क्रम भूलकर सहसा खड़े हो गये और ये भगवान्‌के पार्षदोंमें प्रधान हैं—ऐसा समझकर उन्होंने श्रीमधुसूदनके नामोंका कीर्तन करते हुए उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया॥ २१॥ ध्रुवजीका मन भगवान्‌के चरणकमलोंमें तल्लीन हो गया और वे हाथ जोड़कर बड़ी नम्रतासे सिर नीचा किये खड़े रह गये। तब श्रीहरिके प्रिय पार्षद सुनन्द और नन्दने उनके पास जाकर मुसकराते हुए कहा॥ २२॥"},{"b":11416,"kind":"topic_heading","page":470,"text":"सुनन्दनन्दावूचतुः"},{"b":11417,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.23"],"text":"भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः शृणु।"},{"b":11418,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.23"],"text":"यः पंचवर्षस्तपसा भवान्देवमतीतृपत्॥ २३"},{"b":11419,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.24"],"text":"तस्याखिलजगद्धातुरावां देवस्य शार्ङ्गिणः।"},{"b":11420,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.24"],"text":"पार्षदाविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम्॥ २४"},{"b":11421,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.25"],"text":"सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया"},{"b":11422,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.25"],"text":"यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम्।"},{"b":11423,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.25"],"text":"आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो"},{"b":11424,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.25"],"text":"ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम्॥ २५"},{"b":11425,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.26"],"text":"अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यंग कर्हिचित्।"},{"b":11426,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.26"],"text":"आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम्॥ २६"},{"b":11427,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.27"],"text":"एतद्विमानप्रवरमुत्तमश्लोकमौलिना ।"},{"b":11428,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.27"],"text":"उपस्थापितमायुष्मन्‍नधिरोढुं त्वमर्हसि॥ २७"},{"b":11429,"kind":"hindi_commentary","page":470,"explains":["4.12.23","4.12.24","4.12.25","4.12.26","4.12.27"],"text":"सुनन्द और नन्द कहने लगे—राजन्! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्षकी अवस्थामें ही तपस्या करके सर्वेश्‍वर भगवान्‌को प्रसन्‍न कर लिया था॥ २३॥ हम उन्हीं निखिलजगन्‍नियन्ता शार्ङ्गपाणि भगवान् विष्णुके सेवक हैं और आपको भगवान्‌के धाममें ले जानेके लिये यहाँ आये हैं॥ २४॥ आपने अपनी भक्तिके प्रभावसे विष्णुलोकका अधिकार प्राप्त किया है, जो औरोंके लिये बड़ा दुर्लभ है। परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँतक नहीं पहुँच सके, वे नीचेसे केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाममें निवास कीजिये॥ २५॥ प्रियवर! आजतक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पदपर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान् विष्णुका वह परमधाम सारे संसारका वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों॥ २६॥ आयुष्मन्! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोकशिखामणि श्रीहरिने आपके लिये ही भेजा है, आप इसपर चढ़नेयोग्य हैं॥ २७॥"},{"b":11430,"kind":"topic_heading","page":470,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11431,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.28"],"text":"निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो-"},{"b":11432,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.28"],"text":"र्मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः।"},{"b":11433,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.28"],"text":"कृताभिषेकः कृतनित्यमंगलो"},{"b":11434,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.28"],"text":"मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत्॥ २८"},{"b":11435,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.29"],"text":"परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च।"},{"b":11436,"kind":"sanskrit_shloka","page":470,"verses":["4.12.29"],"text":"इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम्॥ २९"},{"b":11437,"kind":"hindi_commentary","page":470,"explains":["4.12.28","4.12.29"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्‌के प्रमुख पार्षदोंके ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुवजीने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो मांगलिक अलंकारादि धारण किये। बदरिकाश्रममें रहनेवाले मुनियोंको प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया॥ २८॥ इसके बाद उस श्रेष्ठ विमानकी पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदोंको प्रणाम कर सुवर्णके समान कान्तिमान् दिव्य रूप धारणकर उसपर चढ़नेको तैयार हुए॥ २९॥"},{"b":11438,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.30"],"text":"तदोत्तानपदः पुत्रो ददर्शान्तकमागतम्।"},{"b":11439,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.30"],"text":"मृत्योर्मूर्ध्नि पदं दत्त्वा आरुरोहाद्भुतं गृहम्॥ ३०"},{"b":11440,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.31"],"text":"तदा दुन्दुभयो नेदुर्मृदंगपणवादयः।"},{"b":11441,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.31"],"text":"गन्धर्वमुख्याः प्रजगुः पेतुः कुसुमवृष्टयः॥ ३१"},{"b":11442,"kind":"hindi_translation","page":471,"explains":["4.12.30","4.12.31"],"text":"इतनेमें ही ध्रुवजीने देखा कि काल मूर्तिमान् होकर उनके सामने खड़ा है। तब वे मृत्युके सिरपर पैर रखकर उस समय अद्भुत विमानपर चढ़ गये॥ ३०॥ उस समय आकाशमें दुन्दुभि, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे और फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ ३१॥"},{"b":11443,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.32"],"text":"स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुवः।"},{"b":11444,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.32"],"text":"अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम्॥ ३२"},{"b":11445,"kind":"hindi_commentary","page":471,"explains":["4.12.32"],"text":"विमानपर बैठकर ध्रुवजी ज्यों-ही भगवान्‌के धामको जानेके लिये तैयार हुए, त्यों-ही उन्हें अपनी माता सुनीतिका स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, ‘क्या मैं बेचारी माताको छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधामको जाऊँगा?’॥ ३२॥"},{"b":11446,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.33"],"text":"इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ।"},{"b":11447,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.33"],"text":"दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम्॥ ३३"},{"b":11448,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.34"],"text":"तत्र तत्र प्रशंसद्भिः पथि वैमानिकैः सुरैः।"},{"b":11449,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.34"],"text":"अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमैः क्रमशो ग्रहान्॥ ३४"},{"b":11450,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.35"],"text":"त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि।"},{"b":11451,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.35"],"text":"परस्ताद्यद् ध्रुवगतिर्विष्णोः पदमथाभ्यगात्॥ ३५"},{"b":11452,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.36"],"text":"यद् भ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतो"},{"b":11453,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.36"],"text":"लोकास्त्रयो ह्यनु विभ्राजन्त एते।"},{"b":11454,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.36"],"text":"यन्‍नाव्रजंजन्तुषु येऽननुग्रहा"},{"b":11455,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.36"],"text":"व्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येऽनिशम्॥ ३६"},{"b":11456,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.37"],"text":"शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरंजनाः।"},{"b":11457,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.37"],"text":"यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः॥ ३७"},{"b":11458,"kind":"hindi_translation","page":471,"explains":["4.12.33","4.12.34","4.12.35","4.12.36","4.12.37"],"text":"नन्द और सुनन्दने ध्रुवके हृदयकी बात जानकर उन्हें दिखलाया कि देवी सुनीति आगे-आगे दूसरे विमानपर जा रही हैं॥ ३३॥ उन्होंने क्रमशः सूर्य आदि सभी ग्रह देखे। मार्गमें जहाँ-तहाँ विमानोंपर बैठे हुए देवता उनकी प्रशंसा करते हुए फूलोंकी वर्षा करते जाते थे॥ ३४॥ उस दिव्य विमानपर बैठकर ध्रुवजी त्रिलोकीको पारकर सप्तर्षिमण्डलसे भी ऊपर भगवान् विष्णुके नित्यधाममें पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की॥ ३५॥ यह दिव्य धाम अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित है, इसीके प्रकाशसे तीनों लोक प्रकाशित हैं। इसमें जीवोंपर निर्दयता करनेवाले पुरुष नहीं जा सकते। यहाँ तो उन्हींकी पहुँच होती है, जो दिन-रात प्राणियोंके कल्याणके लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं॥ ३६॥ जो शान्त, समदर्शी, शुद्ध और सब प्राणियोंको प्रसन्‍न रखनेवाले हैं तथा भगवद्भक्तोंको ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद‍् मानते हैं—ऐसे लोग सुगमतासे ही इस भगवद्धामको प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥"},{"b":11459,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.38"],"text":"इत्युत्तानपदः पुत्रो ध्रुवः कृष्णपरायणः।"},{"b":11460,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.38"],"text":"अभूत्त्रयाणां लोकानां चूडामणिरिवामलः॥ ३८"},{"b":11461,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.39"],"text":"गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम्।"},{"b":11462,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.39"],"text":"यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः॥ ३९"},{"b":11463,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.40"],"text":"महिमानं विलोक्यास्य नारदो भगवानृषिः।"},{"b":11464,"kind":"sanskrit_shloka","page":471,"verses":["4.12.40"],"text":"आतोद्यं वितुदन् श्लोकान् सत्रेऽगायत्प्रचेतसाम्॥ ४०"},{"b":11465,"kind":"hindi_translation","page":471,"explains":["4.12.38","4.12.39","4.12.40"],"text":"इस प्रकार उत्तानपादके पुत्र भगवत्परायण श्रीध्रुवजी तीनों लोकोंके ऊपर उसकी निर्मल चूडा-मणिके समान विराजमान हुए॥ ३८॥ कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलानेके समय खम्भेके चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेगवाला ज्योतिश्‍चक्र उस अविनाशी लोकके आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है॥ ३९॥ उसकी महिमा देखकर देवर्षि नारदने प्रचेताओंकी यज्ञशालामें वीणा बजाकर ये तीन श्लोक गाये थे॥ ४०॥"},{"b":11466,"kind":"topic_heading","page":472,"text":"नारद उवाच"},{"b":11467,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.41"],"text":"नूनं सुनीतेः पतिदेवताया-"},{"b":11468,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.41"],"text":"स्तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम्।"},{"b":11469,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.41"],"text":"दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो"},{"b":11470,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.41"],"text":"नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपाः॥ ४१"},{"b":11471,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.42"],"text":"यः पंचवर्षो गुरुदारवाक्शरै-"},{"b":11472,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.42"],"text":"र्भिन्‍नेन यातो हृदयेन दूयता।"},{"b":11473,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.42"],"text":"वनं मदादेशकरोऽजितं प्रभुं"},{"b":11474,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.42"],"text":"जिगाय तद्भक्तगुणैः पराजितम्॥ ४२"},{"b":11475,"kind":"hindi_commentary","page":472,"explains":["4.12.41","4.12.42"],"text":"नारदजीने कहा था—इसमें सन्देह नहीं, पतिपरायणा सुनीतिके पुत्र ध्रुवने तपस्याद्वारा अद्भुत शक्ति संचित करके जो गति पायी है, उसे भागवतधर्मोंकी आलोचना करके वेदवादी मुनिगण भी नहीं पा सकते; फिर राजाओंकी तो बात ही क्या है॥ ४१॥ अहो! वे पाँच वर्षकी अवस्थामें ही सौतेली माताके वाग्बाणोंसे मर्माहत होकर दुःखी हृदयसे वनमें चले गये और मेरे उपदेशके अनुसार आचरण करके ही उन अजेय प्रभुको जीत लिया, जो केवल अपने भक्तोंके गुणोंसे ही वशमें होते हैं॥ ४२॥"},{"b":11476,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.43"],"text":"यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ-"},{"b":11477,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.43"],"text":"मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः।"},{"b":11478,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.43"],"text":"षट्पंचवर्षो यदहोभिरल्पैः"},{"b":11479,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.43"],"text":"प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम्॥ ४३"},{"b":11480,"kind":"hindi_commentary","page":472,"explains":["4.12.43"],"text":"ध्रुवजीने तो पाँच-छः वर्षकी अवस्थामें कुछ दिनोंकी तपस्यासे ही भगवान्‌को प्रसन्‍न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पदको भूमण्डलमें कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षोंतक तपस्या करके भी पा सकता है?॥ ४३॥"},{"b":11481,"kind":"topic_heading","page":472,"text":"मैत्रेय उवाच"},{"b":11482,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.44"],"text":"एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया।"},{"b":11483,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.44"],"text":"ध्रुवस्योद्दामयशसश्‍चरितं सम्मतं सताम्॥ ४४"},{"b":11484,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.45"],"text":"धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वस्त्ययनं महत्।"},{"b":11485,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.45"],"text":"स्वर्ग्यं ध्रौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम्॥ ४५"},{"b":11486,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.46"],"text":"श्रुत्वैतच्छ्रद्धयाभीक्ष्णमच्युतप्रियचेष्टितम्।"},{"b":11487,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.46"],"text":"भवेद्भक्तिर्भगवति यया स्यात्क्लेशसंक्षयः॥ ४६"},{"b":11488,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.47"],"text":"महत्त्वमिच्छतां तीर्थं श्रोतुः शीलादयो गुणाः।"},{"b":11489,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.47"],"text":"यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम्॥ ४७"},{"b":11490,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.48"],"text":"प्रयतः कीर्तयेत्प्रातः समवाये द्विजन्मनाम्।"},{"b":11491,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.48"],"text":"सायं च पुण्यश्लोकस्य ध्रुवस्य चरितं महत्॥ ४८"},{"b":11492,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.49"],"text":"पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेऽथवा।"},{"b":11493,"kind":"sanskrit_shloka","page":472,"verses":["4.12.49"],"text":"दिनक्षये व्यतीपाते सङ्‌क्रमेऽर्कदिनेऽपि वा॥ ४९"},{"b":11494,"kind":"sanskrit_shloka","page":473,"verses":["4.12.50"],"text":"श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः।"},{"b":11495,"kind":"sanskrit_shloka","page":473,"verses":["4.12.50"],"text":"नेच्छंस्तत्रात्मनाऽऽत्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति॥ ५०"},{"b":11496,"kind":"hindi_commentary","page":472,"explains":["4.12.44","4.12.45","4.12.46","4.12.47","4.12.48","4.12.49","4.12.50"],"text":"श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुवजीके चरित्रके विषयमें पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्रकी बड़ी प्रशंसा करते हैं॥ ४४॥ यह धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त मंगलमय है। इससे स्वर्ग और अविनाशी पद भी प्राप्त हो सकता है। यह देवत्वकी प्राप्ति करानेवाला, बड़ा ही प्रशंसनीय और समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ ४५॥ भगवद्भक्त ध्रुवके इस पवित्र चरित्रको जो श्रद्धापूर्वक बार-बार सुनते हैं, उन्हें भगवान्‌की भक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके सभी दुःखोंका नाश हो जाता है॥ ४६॥ इसे श्रवण करनेवालेको शीलादि गुणोंकी प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं, उन्हें महत्त्वकी प्राप्ति करानेवाला स्थान मिलता है, जो तेज चाहते हैं, उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियोंका मान बढ़ता है॥ ४७॥ पवित्रकीर्ति ध्रुवजीके इस महान् चरित्रका प्रातः और सायंकाल ब्राह्मणादि द्विजातियोंके समाजमें एकाग्र चित्तसे कीर्तन करना चाहिये॥ ४८॥ भगवान्‌के परम पवित्र चरणोंकी शरणमें रहनेवाला जो पुरुष इसे निष्कामभावसे पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवारके दिन श्रद्धालु पुरुषोंको सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है॥ ४९-५०॥"},{"b":11497,"kind":"sanskrit_shloka","page":473,"verses":["4.12.51"],"text":"ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम्।"},{"b":11498,"kind":"sanskrit_shloka","page":473,"verses":["4.12.51"],"text":"कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते॥ ५१"},{"b":11499,"kind":"hindi_commentary","page":473,"explains":["4.12.51"],"text":"यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्गके मर्मसे अनभिज्ञ हैं—उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुषपर देवता अनुग्रह करते हैं॥ ५१॥"},{"b":11500,"kind":"sanskrit_shloka","page":473,"verses":["4.12.52"],"text":"इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वह ध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः।"},{"b":11501,"kind":"sanskrit_shloka","page":473,"verses":["4.12.52"],"text":"हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातुर्गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम॥ ५२"},{"b":11502,"kind":"hindi_commentary","page":473,"explains":["4.12.52"],"text":"ध्रुवजीके कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्थामें ही माताके घर और खिलौनोंका मोह छोड़कर श्रीविष्णुभगवान्‌की शरणमें चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया॥ ५२॥"},{"b":11503,"kind":"topic_heading","page":473,"text":"इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे"},{"b":11504,"kind":"hindi_translation","page":473,"text":"ध्रुवचरितं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥"}],"notes":[],"corrections":{"count":9,"list":"https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/shuddhi/"}}